
नागरिकता के लिए लंबा संघर्ष: असम के काशेम अली ने आखिरकार जीती कानूनी लड़ाई बोंगाईगांव के एक हाथगाड़ी खींचने वाले, काशेम अली को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि उनके पास ऐसे पुख्ता दस्तावेजी सबूत मौजूद थे जो उनके परिवार को असम से जोड़ते हैं।
02, Nov 2026 | CJP Team
सालों तक, काशेम अली एक ऐसे सवाल के साये में जीते रहे, जो असम में पैदा हुए किसी भी इंसान के सामने कभी नहीं आना चाहिए था: क्या वह सच में उसी देश के नागरिक हैं, जिसे वह हमेशा से अपना घर मानते आए हैं?
पेशे से ठेला चलाने वाले काशेम अली, धूप और बारिश में ठेला खींचकर अपनी आजीविका कमाते हैं। वे अपनी पत्नी, सुरातों खातून और अपने दो बेटों, शाहजहां अली और शाहजमाल अली की परवरिश के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। वे न तो कोई राजनेता हैं और न ही कोई प्रभावशाली व्यक्ति। वे बस एक मेहनतकश इंसान हैं, जिनकी जिंदगी अपनी नागरिकता को लेकर लड़ी गई एक कानूनी लड़ाई में उलझकर रह गई-जबकि उनके पास ऐसे दस्तावेजी सबूत मौजूद थे, जो उनके परिवार को 25 मार्च, 1971 की ‘कट-ऑफ’ तारीख से कई दशक पहले से असम से जोड़ते हैं।
CJP की समर्पित असम टीम, कम्यूनिटी वॉलंटियर्स, डिस्ट्रिक्ट वॉलंटियर मोटिवेटर्स और वकीलों की टीम असम के क़रीब 24 ज़िलों में नागरिकता संकट से जूझ रहे लोगों को क़ानूनी सहयोग, काउंसलिंग और मनोवैज्ञानिक मदद के लिए लगातार काम कर रही है. 2017 से 19 के बीच हमारी अगुवाई में अभी तक क़रीब 12,00,000 लोगों ने सफलतापूर्वक NRC फ़ार्म भरे हैं. हम ज़िला स्तर पर भी प्रति माह फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के केस लड़ते हैं और हर साल क़रीब 20 ऐसे मामलों में कामयाबी हासिल करते हैं. हमारे अनवरत प्रयासों की बदौलत अनेकों लोगों की भारतीय नागरिकता बहाल हुई है. ज़मीनी स्तर के ये आंकड़े CJP द्वारा संवैधानिक अदालतों में सशक्त कार्रवाई और मज़बूत पैरवी सुनिश्चित करते हैं. आपका सहयोग हमें इस महत्वपूर्ण काम को जारी रखने में मदद करता है. समान अधिकारों के लिए हमारे साथ खड़े हों. #HelpCJPHelpAssam. हमें अपना सहियोग दें।
25 अक्टूबर, 2026 को काशेम को आखिरकार कुछ राहत मिली। बोंगाईगांव के ‘फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल नंबर 1’ ने माना कि काशेम ने यह साबित करने की अपनी कानूनी जिम्मेदारी सफलतापूर्वक पूरी कर ली है कि वे कोई विदेशी नहीं, बल्कि भारत के नागरिक हैं। यह फैसला एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया, जिसमें ‘सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (CJP) ने उनकी मदद की।
लेकिन काशेम की मुश्किलों के खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि उनके परिवार की तकलीफें भी खत्म हो गई हैं। उनकी पत्नी, सुरातों को 2019 में ‘डी-वोटर’ (D-voter) घोषित कर दिया गया था। इस वजह से वह 2029 तक, यानी दस सालों के लिए अपने वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। उनके पति को अब भारतीय नागरिक मान लिया गया है, जबकि उनकी पत्नी को नागरिकता से जुड़े उस फैसले का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, जिसने उन्हें उनके एक बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित कर दिया है।

असम में अपने घर के बाहर कासिम अली, अपने मामले से जुड़े सभी दस्तावेज़ों को देखते हुए।
2004 में मामला दर्ज हुआ, लेकिन नोटिस 2022 में मिला
‘स्टेट ऑफ असम बनाम मो. काशेम अली’ मामले की सुनवाई बोंगाईगांव के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल नंबर 1 में हुई। यह मामला BNGN/IM(D)T केस नंबर 1944/2003 से निकला था, जिसे बाद में BNGN/FT केस नंबर 1205/2010 के रूप में दर्ज किया गया। केस के रिकॉर्ड के अनुसार, पुलिस अधीक्षक (बॉर्डर) के एक आदेश के आधार पर 2004 में ही कार्यवाही शुरू हो गई थी। फिर भी, काशेम को मार्च 2022 तक कोई नोटिस नहीं मिला। मामला दर्ज होने और नोटिस मिलने के बीच पूरे 18 साल बीत गए।
जो व्यक्ति अपने परिवार का पेट पालने के लिए रोज की कमाई पर निर्भर हो, उसके लिए इतनी लंबी अनिश्चितता का असर सिर्फ कोर्टरूम तक ही सीमित नहीं रहता। मामला दर्ज होने से लेकर नोटिस मिलने तक के सालों और उसके बाद चली कानूनी कार्यवाही के दौरान, काशेम को एक तरफ तो विदेशी होने के आरोप का सामना करना पड़ा, और दूसरी तरफ अपनी रोजी-रोटी के लिए शारीरिक मेहनत (मज़दूरी) भी करनी पड़ी। जब पहले उनकी पत्नी का मामला सामने आया था, तब काशेम को CJP के बारे में जानकारी नहीं थी और उन्हें काफी खर्च उठाना पड़ा था। इस बार, जब उन्हें पता चला कि कानूनी मदद मिल सकती है, तो उन्होंने इस संगठन से संपर्क किया।
CJP की कानूनी टीम ने, जिसका नेतृत्व कानूनी सदस्य देवान अब्दुर रहीम और उनके दो जूनियर सहयोगी कर रहे थे, ट्रिब्यूनल के सामने उनका पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने न केवल आरोप के आधार को चुनौती दी, बल्कि उस तरीके पर भी सवाल उठाए जिससे कथित तौर पर जांच की गई थी। 10 दिसंबर 2025 को दाखिल अपने लिखित बयान में, काशेम ने बहुत स्पष्ट शब्दों में अपना पक्ष रखा: यह मामला न तो कानून की नज़र में और न ही तथ्यों के आधार पर टिक सकता है; वह कोई विदेशी नहीं हैं, और उनका जन्म असम में ही हुआ था।
असम में जन्म, 1971 से पहले के पारिवारिक रिकॉर्ड
काशेम अली का जन्म 1968 में असम के बोंगाईगांव जिले के मानिकपुर पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले गांव नंबर 1 धूपुरी में हुआ था। वह नोजमुद्दीन शेख (जिन्हें ‘नाजू शेख’ के नाम से भी जाना जाता है) और पानफुल नेसा (जिन्हें ‘पानफुल’ भी कहा जाता है) के बेटे थे। उनके पिता का निधन 1974 में और माता का निधन 2018 में हुआ था। उनके दादा, नजीरुल्ला (जिन्हें ‘नजीब’ के नाम से भी दर्ज किया गया है), के चार बच्चे थे: नाजू शेख, यूनुस अली, खालिक मिया और खातिम बीबी। काशेम की एक बहन, तोशिरन बीबी हैं, जिनके खिलाफ ट्रिब्यूनल के सामने रखी गई जानकारी के अनुसार, कोई ‘विदेशी’ (foreigners) मामला लंबित नहीं है।
काशेम ने 1988 में गांव नंबर 2 धूपुरी के स्वर्गीय तोयाब अली की बेटी, सुरातों खातून से शादी की। उनके दो बेटे हुए। ये केवल पारिवारिक विवरण नहीं थे, बल्कि ये उन रिश्तों और दस्तावेजी सबूतों की एक कड़ी थे, जिनके जरिए काशेम ने अपनी पहचान और असम के साथ अपने जुड़ाव को साबित करने की कोशिश की।
बचाव पक्ष ने उन रिकॉर्ड्स पर विशेष जोर दिया, जिनसे पता चलता है कि काशेम के माता-पिता 1966 में ही असम में मतदाता के रूप में पंजीकृत थे। यह तारीख 25 मार्च 1971 की उस ‘कट-ऑफ’ तारीख से पांच साल पहले की है, जो असम में नागरिकता तय करने के लिए महत्वपूर्ण है। इसके बाद के चुनावी रिकॉर्ड्स में भी कई दशकों तक काशेम और उनकी पत्नी का नाम मतदाता के रूप में दर्ज रहा। इन दस्तावेजी सबूतों के बावजूद, काशेम को ट्रिब्यूनल के सामने यह साबित करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि वह विदेशी नहीं हैं।
18 दस्तावेज, जिन्हें साबित करने की कभी जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी
‘फॉरेनर्स एक्ट, 1946’ (विदेशी अधिनियम, 1946) की धारा 9 के तहत खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी (burden of proof) को पूरा करने के लिए, काशेम ने ट्रिब्यूनल के सामने 18 दस्तावेज पेश किए। इन्हें ‘एग्जिबिट A से Q’ (Exhibits A to Q) के रूप में दर्ज किया गया, और ‘एग्जिबिट A-1’ को एक अतिरिक्त दस्तावेज के तौर पर शामिल किया गया। उन्होंने एक पंचायत प्रमाण पत्र भी हासिल किया। इन सबूतों में जमीन और राजस्व रिकॉर्ड, पुराने चुनावी रोल, स्कूल के दस्तावेज, पहचान पत्र और मृत्यु प्रमाण पत्र शामिल थे। इन दस्तावेजों के आधार पर उनके पारिवारिक संबंधों, जन्म स्थान और असम में लंबे समय से रहने की पुष्टि की गई।
सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में बिजननी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत धुपरी भाग-1 की 1966 की मतदाता सूची की प्रमाणित प्रति शामिल थी। इसमें नोजिर उल्लाह के बेटे नोजमुद्दीन और नोजमुद्दीन की पत्नी पानफुल का नाम मतदाता के रूप में दर्ज था। धुपरी भाग-1 की 1971 की मतदाता सूची में भी नोजिब के बेटे नोजमुद्दीन शेख और नोजमुद्दीन की पत्नी पानफुल नेसा के साथ-साथ उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम दर्ज थे।
काशेम का मतदाता सूचियों से संबंध 1997 की धुपरी भाग-2 की सूची से शुरू होता है, जिसमें स्वर्गीय नसीमउद्दीन शेख के बेटे काशेम अली और काशेम की पत्नी सुरातों खातून के नाम दर्ज थे। 2008 की सूची में भी पति-पत्नी दोनों के नाम शामिल थे। काशेम 2010, 2014, 2017, 2018, 2019 और 2020 की मतदाता सूचियों में भी दिखाई दिए, हालाँकि अलग-अलग दस्तावेज़ों में उनके और उनके पिता के नाम की स्पेलिंग में थोड़ा अंतर था।
दस्तावेज़ी सबूतों में एक ज़मीन का रिकॉर्ड भी शामिल था, जिसमें काशेम के पिता को गांव नंबर 1 धुपरी में ‘एनुअल पट्टा’ संख्या 27 के तहत 4 बीघा, 1 कथा और 17 लेसा जमीन का मालिक और कब्ज़ेदार बताया गया है (इसमें दाग नंबर 155, 156 और 200 शामिल हैं)। इस रिकॉर्ड के साथ काशेम के नाम पर राजस्व भुगतान की एक रसीद भी थी।
480 नंबर डबागुरी लोअर प्राइमरी स्कूल के प्रधानाध्यापक द्वारा जारी एक स्कूल प्रमाण पत्र में दर्ज है कि नोजु शेख के बेटे काशेम अली ने 1975 में कक्षा 1 में पढ़ाई की थी। इसके अलावा, 6 मार्च 2024 को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी उनका ‘इलेक्टर फोटो आइडेंटिटी कार्ड’ (EPIC) भी पेश किया गया। अन्य दस्तावेजों में खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा सुरातों खातून के नाम पर जारी किया गया एक राशन कार्ड शामिल था, जिसमें उन्हें काशेम की पत्नी के रूप में पहचाना गया था; इसके अलावा काशेम का पैन कार्ड और आधार कार्ड; और मानिकपुर के संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा जारी पानफुल बेवा का मृत्यु प्रमाण पत्र भी शामिल था।
ये सभी दस्तावेज एक ही तरह के सबूत के तौर पर काम नहीं आते थे। बल्कि, बचाव पक्ष ने इन सबका एक साथ इस्तेमाल करते हुए काशेम, उनके माता-पिता, उनकी पत्नी, उनके निवास स्थान और उनके परिवार के पुराने रिकॉर्ड के बीच संबंध स्थापित करने की कोशिश की। अपनी नागरिकता को साबित करने के लिए जिस भारी मात्रा में दस्तावेजों की जरूरत पड़ी, वह उन आम लोगों पर पड़ने वाले बोझ को दिखाती है, जिन पर विदेशी होने का आरोप लगाया जाता है। काशेम के मामले में, उन्हें अपने परिवार के कई वर्षों के इतिहास को इकट्ठा करना पड़ा, उसे प्रमाणित करवाना पड़ा, उसका अनुवाद कराना पड़ा और फिर उसे ट्रिब्यूनल के सामने पेश करना पड़ा। तब जाकर उन्हें इस बात की कानूनी मान्यता मिल सकी, जिसे वे शुरू से ही कहते आ रहे थे: कि वे कोई विदेशी नहीं हैं।
बचाव पक्ष ने जांच पर सवाल उठाए

असम में कासिम अली के घर के बाहर उनके साथ सीजेपी (CJP) की असम टीम।
बचाव पक्ष का मुख्य तर्क उस जांच को चुनौती देना था, जिसके आधार पर काशेम के खिलाफ मामला (रेफरेंस) दर्ज किया गया था। CJP की कानूनी टीम ने दलील दी कि जांच अधिकारी ने बिना किसी उचित जांच-पड़ताल के ही रिपोर्ट सौंप दी थी। बचाव पक्ष के अनुसार, अधिकारी न तो काशेम के घर गए, न ही उनका बयान दर्ज किया, न कोई दस्तावेज जब्त किया और न ही किसी गवाह से पूछताछ की। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने इस मामले से जुड़े गवाहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।
वकील ने बताया कि यह आरोप इस दावे पर टिका था कि काशेम 25 मार्च 1971 के बाद किसी खास इलाके से असम में दाखिल हुए थे। काशेम ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वे कभी भी पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से असम नहीं आए, बल्कि उनका जन्म 1968 में इसी राज्य में हुआ था।
बचाव पक्ष ने सरकारी रिकॉर्ड में नामों की स्पेलिंग में मौजूद अंतरों का मुद्दा भी उठाया। कहीं उनका नाम ‘कासेम अली’ तो कहीं ‘काशेम अली’ लिखा था। वहीं, उनके पिता का नाम अलग-अलग जगहों पर ‘नोजुमउद्दीन’, ‘नसीमउद्दीन’, ‘नजीम उद्दीन शेख’ और ‘नोजिम उद्दीन शेख’ के रूप में दर्ज था। कानूनी टीम ने तर्क दिया कि ये केवल क्लेरिकल (clerical) गलतियां हैं, और इनसे यह साबित नहीं होता कि ये रिकॉर्ड अलग-अलग व्यक्तियों के हैं।
इस तरह की विसंगतियां उन लोगों के लिए गंभीर मुश्किलें पैदा कर सकती हैं, जिनके नाम अलग-अलग सरकारी विभागों में दर्ज हैं। खासकर तब, जब ये रिकॉर्ड दशकों तक हाथ से लिखे गए हों, उनका अनुवाद किया गया हो, या अधिकारियों द्वारा दर्ज किए गए हों। गरीब परिवारों के पास सरकारी दस्तावेजों की जांच करने या उन्हें ठीक कराने के सीमित साधन होते हैं। ऐसे में, स्पेलिंग में थोड़ा सा अंतर भी उनकी पहचान और पारिवारिक संबंधों को साबित करने में एक बड़ी बाधा बन सकता है। बचाव पक्ष का कहना था कि काशेम के रिकॉर्ड में मौजूद इन अंतरों को उनकी नागरिकता पर शक करने का आधार नहीं माना जाना चाहिए। इसके बजाय, इन्हें व्यापक दस्तावेजों और संदर्भों के साथ रखकर देखा जाना चाहिए।
राजस्व अधिकारी ने भूमि रिकॉर्ड की पुष्टि की
काशेम और बचाव पक्ष के दो अन्य गवाहों ने ट्रिब्यूनल के सामने गवाही दी। इनमें से एक, बचाव पक्ष के दूसरे गवाह (Witness No. 2) सुभाष मेधी- जो माणिकपुर राजस्व सर्कल में एस.के. (राजस्व अधिकारी) हैं- ने ‘जमाबंदी’ को ‘एग्जिबिट A’ (साक्ष्य A) के रूप में पेश किया। उन्होंने इसे जारी करने से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। राजस्व अधिकारी की इस गवाही ने उस भूमि रिकॉर्ड को एक आधिकारिक आधार प्रदान किया, जिस पर बचाव पक्ष ने अपना पक्ष रखा था। यह उस व्यापक साक्ष्य-आधारित मामले का हिस्सा था, जिसके जरिए काशेम ने उस ज़मीन और इलाके से अपने परिवार के जुड़ाव को साबित करने की कोशिश की।
सबूतों और दलीलों पर विचार करने के बाद, ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि काशेम ने ‘विदेशी अधिनियम, 1946’ (Foreigners Act, 1946) की धारा 9 के तहत अपनी कानूनी जिम्मेदारी सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। ट्रिब्यूनल ने माना कि संबंधित व्यक्ति विदेशी नहीं, बल्कि भारत का नागरिक है। सालों की अनिश्चितता और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आए इस फैसले से उन्हें राहत मिली। इसका मतलब यह भी था कि ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार किए गए सबूतों के सामने, विदेशी मूल का होने का आरोप टिक नहीं सका।
पति को भारतीय माना गया, लेकिन पत्नी को अभी भी वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया है।
फिर भी, काशेम को मिली राहत एक बहुत ही दुखद पहलू के साथ अधूरी है: उनकी पत्नी को नागरिकता से जुड़ी एक अलग कानूनी कार्यवाही के नतीजों को अभी भी भुगतना पड़ रहा है। सुरातों खातून का मामला 2019 में एक ‘विदेशी ट्रिब्यूनल’ (Foreigners Tribunal) के सामने आया था, जब उन्हें ‘डी-वोटर’ (D-voter) की श्रेणी में डाल दिया गया था। नतीजतन, वह 2019 से 2029 तक, यानी दस सालों तक वोट देने में असमर्थ हैं।
1997 की मतदाता सूची में काशेम के साथ उनका नाम भी शामिल था, और 2008 की सूची में भी उन्हें मतदाता के रूप में दर्ज किया गया था। परिवार के राशन कार्ड में भी उन्हें काशेम की पत्नी के रूप में पहचाना गया है। वह उनके दो बेटों की मां हैं और उन्होंने उन सभी सालों में एक ही घर और परिवार में जीवन बिताया है, जब उनके पति को अपनी नागरिकता बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था।
इसके बावजूद, उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही के नतीजे अभी भी लागू हैं। काशेम का अपनी नागरिकता साबित कर देना, अपने आप में सुरातों के वोटिंग अधिकारों को बहाल नहीं करता और न ही उनके अलग मामले को सुलझाता है। यह विरोधाभास बहुत गहरा है। 2026 में, दस्तावेजी सबूतों की जांच के बाद एक ट्रिब्यूनल ने काशेम को भारतीय नागरिक माना। वहीं उनकी पत्नी, जिनका नाम दशकों पहले ही मतदाता रिकॉर्ड में आ चुका था, ‘डी-वोटर’ का दर्जा होने के कारण 2029 तक चुनावों में हिस्सा नहीं ले सकतीं।
इस परिवार के लिए, नागरिकता से जुड़ी इन कानूनी कार्यवाहियों की कीमत केवल कानूनी खर्चों या आरोपों का जवाब देने में बीते सालों से नहीं मापी जा सकती। इसे उन लोकतांत्रिक अधिकारों के नुकसान के रूप में भी मापा जाता है, जो इन कानूनी प्रक्रियाओं के चलते लोगों के जीवन पर छाए साये के कारण छिन जाते हैं।
CJP की मदद से राहत मिली, लेकिन बड़े सवाल अभी भी बाकी हैं
25 अक्टूबर को, CJP टीम की ओर से वकील देवान अब्दुर रहीम और CJP के राज्य प्रभारी नंदा घोष ने काशेम के घर जाकर उन्हें ट्रिब्यूनल के फैसले की एक प्रति सौंपी। सालों की अनिश्चितता के बाद, उन्हें आखिरकार राहत मिली। उन्होंने चाय पिलाकर टीम का स्वागत किया और कानूनी लड़ाई में मदद करने के लिए CJP का आभार जताया।
काशेम के लिए, यह फैसला एक बड़ी जीत है। CJP के लिए, यह इस बात की याद दिलाता है कि नागरिकता से जुड़ी कानूनी कार्यवाही का सामना कर रहे लोगों के लिए कानूनी मदद कितनी जरूरी है, खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए आर्थिक साधन नहीं हैं।
लेकिन उनका मामला ऐसे सवाल भी खड़े करता है जो सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं हैं। 2004 में दर्ज किए गए मामले में मार्च 2022 में ही नोटिस क्यों भेजा गया? ऐसी क्या सुरक्षा व्यवस्था है जो यह सुनिश्चित करे कि अधूरी जांच के आधार पर लगाए गए आरोपों की वजह से लोगों को सालों तक अनिश्चितता में न रहना पड़े? दशकों पुराने सरकारी रिकॉर्ड में नामों में होने वाले अंतर को अधिकारी कैसे समझें, खासकर तब जब पुराने दस्तावेजों में जानकारी एक जैसी न हो? और उन लोगों का क्या होगा जो 18 दस्तावेज नहीं जुटा सकते, गवाह नहीं ला सकते, कानूनी खर्च नहीं उठा सकते या जिन्हें मदद करने वाली कोई संस्था नहीं मिलती?

असम में अपने घर के बाहर पत्नी के साथ काशेम अली
काशेम अली सिर्फ एक ‘केस नंबर’ नहीं हैं। वह एक ऐसे इंसान हैं जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए हाथगाड़ी खींचते हैं। वह सुरातों के पति हैं, दो बेटों के पिता हैं, तोशिरन के भाई हैं, और ऐसे माता-पिता के बेटे हैं जिनके नाम असम के पुराने रिकॉर्ड में दर्ज हैं। उनका मामला दिखाता है कि कैसे आम लोगों पर अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ आ सकता है, भले ही उनके पास ऐसे दस्तावेज हों जो साबित करते हों कि उनका परिवार 1971 की कट-ऑफ तारीख से पहले से असम में रह रहा है। इससे यह भी पता चलता है कि कानूनी मदद कितना बड़ा फर्क ला सकती है-एक तरफ वह स्थिति है जहाँ इंसान अकेले ही कानूनी मामले का सामना करता है, और दूसरी तरफ वह स्थिति है जहां उसे ट्रिब्यूनल के सामने अपने सबूत पेश करने का मौका मिलता है।
CJP की मदद से काशेम को राहत मिली। लेकिन ऐसे कितने और लोग होंगे जिन पर इसी तरह के आरोप लगे हैं, जिनके पास न तो कानूनी मदद है, न दस्तावेज जुटाने के साधन हैं, और न ही सालों तक चलने वाली कानूनी कार्यवाही का खर्च उठाने की क्षमता है? और जहां काशेम आखिरकार इस अध्याय को पीछे छोड़ सकते हैं, वहीं सुरातों को अभी भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली का इंतजार करना होगा। उनकी कहानी सिर्फ एक ऐसे व्यक्ति की नहीं है जिसे लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भारतीय घोषित किया गया हो। यह असम में नागरिकता से जुड़ी प्रक्रियाओं की मानवीय कीमत की याद दिलाती है, जहां उन लोगों के लिए अपनी पहचान साबित करना एक लंबा संघर्ष बन सकता है, जिनका जीवन, परिवार और दस्तावेज़ पहले से ही इसी राज्य से जुड़े हुए हैं।
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