
30 साल बाद, ओडिशा हाई कोर्ट ने SBI को दो बैंक सफाईकर्मियों को 40 लाख रुपये देने का आदेश दिया अनुसूचित जाति के दो दिहाड़ी मजदूरों ने अपनी नौकरी पक्की करवाने के लिए तीन दशकों तक SBI से लड़ाई लड़ी।
11, Jul 2026 | CJP Team
ओडिशा हाई कोर्ट ने 23 जून को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के दो दिहाड़ी मजदूर सफाईकर्मियों को एकमुश्त 20-20 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। नौकरी पक्की (रेगुलराइजेशन) कराने की लगभग तीन दशक लंबी लड़ाई को खत्म करते हुए, जस्टिस कृष्णा एस. दीक्षित और जस्टिस चित्तरंजन डैश की बेंच ने फैसला सुनाया कि भले ही इन कर्मचारियों ने लगभग 30 साल तक “बेदाग़ सेवा” दी हो, लेकिन वे अब नौकरी पक्की करने की मांग नहीं कर सकते क्योंकि पहले हुई कानूनी लड़ाइयों में उन्हें ऐसा कोई अधिकार नहीं मिला था।
केस की पृष्ठभूमि और कानूनी कार्यवाही का इतिहास
अपीलकर्ता, मायाधर नायक और बैना नायक, अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले दिहाड़ी मजदूर थे। उन्होंने भुवनेश्वर में SBI की सरकारी ट्रेज़री ब्रांच में सफाईकर्मी के तौर पर लगभग तीन दशक तक काम किया; मायाधर ने 1994 में और बैना ने 1995 में काम शुरू किया था।
अपीलकर्ताओं ने पहले 1999 में कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी शिकायत थी कि उनकी नौकरी पक्की नहीं की जा रही थी और उन्हें अस्थायी कर्मचारियों के बराबर वेतन नहीं दिया जा रहा था। इसके बाद 28 अक्टूबर 1999 को कोर्ट ने एक अंतरिम सुरक्षा आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया, “अगर याचिकाकर्ताओं के लिए काम है, तो उन्हें नौकरी से नहीं निकाला जा सकता।” कोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि उन्हें ‘न्यूनतम वेतन अधिनियम’ के तहत वेतन दिया जाए और जब तक काम उपलब्ध हो, उन्हें काम करने दिया जाए; उनकी जगह किसी और को न रखा जाए। कोर्ट ने बैंक से यह भी कहा कि अगर कोई पद खाली होता है, तो उनकी नौकरी पक्की करने के बारे में विचार किया जाए।
2007 में, अपीलकर्ताओं ने फिर से कोर्ट का रुख किया। उन्होंने दावा किया कि बैंक उनकी नियुक्ति के दावे पर विचार किए बिना सफ़ाईकर्मियों और अन्य छोटे-मोटे काम करने वाले कर्मचारियों के पद भरने की कोशिश कर रहा था। इस बार भी, कोर्ट ने बैंक से कहा कि अगर कोई पद खाली होता है, तो उनके काम की अवधि और सेवाओं को ध्यान में रखते हुए उनकी नौकरी पक्की करने के बारे में विचार किया जाए। ऊपर दिए गए आदेश के अनुसार, अपील करने वालों को 17 सितंबर, 2021 को अप्रैल 2017 और जून 2021 के बीच की अवधि के लिए न्यूनतम वेतन का बकाया भुगतान किया गया, जो प्रति व्यक्ति 1,61,619/- रुपये था।
लगभग पाच साल बाद, 2012 में, अपील करने वालों ने एक और याचिका दायर की। इसमें उन्होंने अस्थायी कर्मचारी के तौर पर मान्यता, ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत के तहत वेतन में समानता, वित्तीय वर्ष 2011-12 के लिए बोनस और बैंक के उसी तरह के दूसरे कर्मचारियों को मिलने वाले सभी अस्थायी सेवा लाभ को पाने की मांग की।
2020 में, अपील करने वालों ने अपनी सेवाओं को रेगुलर करने के लिए एक और याचिका दायर की। उनका तर्क था कि बैंक ने उसी तरह के एक कर्मचारी की सेवाओं को रेगुलर किया था जो उस समय ‘लिफ्टमैन’ के तौर पर काम कर रहा था। अपील करने वालों को 16,406/- रुपये का एकमुश्त मासिक वेतन मिल रहा था, जबकि बैंक के दूसरे अस्थायी कर्मचारियों को 27,443/- रुपये मिल रहे थे।
20 जून, 2025 को, जस्टिस एस.के. पाणिग्रही की सिंगल जज बेंच ने, जो दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही थी, अपील करने वालों की रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि उनके सभी दावे टिकने लायक नहीं थे। फैसले में कहा गया:
“हालांकि यह कोर्ट याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई लंबी और बिना रुकावट वाली सेवा को नजरअंदाज नहीं करता है, लेकिन यह अच्छी तरह स्थापित है कि केवल सेवा की अवधि ही रेगुलर होने का अधिकार नहीं देती है। कानून में लगातार यही स्थिति रही है कि दैनिक वेतन या कैज़ुअल आधार पर काम पर रखने से, चाहे वह कितना भी लंबा क्यों न हो, रेगुलर नियुक्ति का दावा नहीं बन सकता, जब तक कि मंजूर पद न हों और कानूनी चयन प्रक्रिया का पालन न किया गया हो।” (पैरा 18)।
2022 में, बैंक ने अपील करने वालों को अतिरिक्त कर्मचारी मानकर नौकरी से हटाने (retrench) की अनुमति मांगी थी।
19 जुलाई, 2025 को, बैंक ने इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 25F के तहत अपील करने वालों को अतिरिक्त कर्मचारी मानकर नौकरी से हटा दिया। उन्हें कानूनी मुआवजे के तौर पर प्रति व्यक्ति लगभग 3.31 लाख रुपये का भुगतान किया गया। यह भुगतान बैंकिंग में IT के विकास के कारण आउटसोर्सिंग की ओर नीति में बदलाव के चलते किया गया था।
अभी इस मामले की सुनवाई कर रही डिवीजन बेंच को यह तय करना था
- अपील करने वाले, लगभग 30 साल की सेवा के बाद, रेगुलराइज़ेशन (स्थायी नौकरी) और उससे जुड़े आर्थिक लाभ पाने के हकदार थे,
- पिछले अदालत के आदेशों में केवल न्यूनतम वेतन देने और रिक्त पदों पर नियमानुसार विचार करने का निर्देश दिया गया था। इसलिए वे आदेश अपीलकर्ताओं के वर्तमान नियमितीकरण (Regularisation) के दावे का आधार नहीं बन सकते थे, और
- आउटसोर्सिंग और AI के दौर में, जब रेगुलराइज़ेशन से नियोक्ता पर बहुत ज्यादा आर्थिक बोझ पड़ सकता है, तब शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों के लिए ‘सुधारात्मक और क्षतिपूर्ति वाला न्याय’ क्या होगा।
हाई कोर्ट का दखल
डिविजन बेंच ने अपीलों को आंशिक रूप से मंजूरी दी और 18 मई, 2026 के आदेश के जरिए सिंगल जज के आदेश को रद्द कर दिया। इसमें कहा गया:
“यहां अपील करने वालों को राहत देने का प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जिन्होंने स्वीपर के तौर पर सेवा दी है – पहले अपीलकर्ता ने 1994 से और दूसरे ने 1995 से सेवा दी है। मौजूदा कानून अपील करने वालों के पक्ष में है, क्योंकि कहा जा सकता है कि सिंगल जज का का आदेश कानून के बाद के विकास और बदलती न्यायिक व्याख्या के अनुरूप नहीं था।”
रेगुलराइजेशन से इनकार
अदालत ने रेगुलराइजेशन का आदेश देने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम भारत संघ (2024) और श्रीपाल बनाम नगर निगम (2025) के फैसलों का हवाला दिया गया, लेकिन अदालत ने कहा कि इससे बैंक को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा और अपील करने वालों के पिछले मामलों में सिर्फ न्यूनतम वेतन देने का निर्देश दिया गया था। साथ ही, अदालत ने देखा कि अपील करने वालों की पिछली कानूनी लड़ाइयों से उन्हें कोई खास वास्तविक लाभ नहीं मिला, क्योंकि उन आदेशों में सिर्फ न्यूनतम वेतन देने का निर्देश था, जिसका भुगतान SBI पहले ही कर चुका था। इस वजह से, बेंच ने माना कि मौजूदा अपीलों में रेगुलराइजेशन का दावा, कुछ हद तक, रेस ज्यूडिकाटा के सिद्धांत से बाधित था।
इसके बाद अदालत ने सेक्रेटरी, बरहमपुर कोऑपरेटिव सेंट्रल बैंक लिमिटेड बनाम भाबा सुंदर दलाई (2026) मामले में ऐसे ही एक बेंच के आदेश का जिक्र किया, जिसमें रेगुलराइजेशन के बदले 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था। हालांकि, बेंच ने उस मामले को अलग माना क्योंकि उसमें रेस ज्यूडिकाटा की कोई बाधा नहीं थी और कर्मचारियों की सेवा अवधि तुलनात्मक रूप से कम थी। कोर्ट ने मौजूदा अपीलकर्ताओं से जुड़ी दो खास बातों पर ध्यान दिया, जो अंतिम राहत तय करने में अहम थीं: पहली, रिटायरमेंट में लगभग दस साल बचे थे और दूसरी, वे दोनों अनुसूचित जाति (SC) से थे।
मुआवजे की रकम का आधार
मई के आदेश में, कोर्ट ने दोनों पक्षों को निष्पक्षता और न्याय के साथ समझौता करने का सुझाव दिया था। SBI ने विवाद सुलझाने के लिए हर अपीलकर्ता को एकमुश्त 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, अपीलकर्ताओं ने बैंक का प्रस्ताव ठुकरा दिया और कोर्ट के साथ बातचीत के दौरान कहा कि वे हर एक के लिए 25 लाख रुपये पर समझौता करेंगे।
कोर्ट ने दोनों प्रस्तावों पर विचार किया और बैंक के 5 लाख रुपये के प्रस्ताव को अपर्याप्त बताया। कोर्ट ने कहा:
“बैंक द्वारा मुआवजे के तौर पर दिया गया 5 लाख रुपये का प्रस्ताव इतना कम है कि उसका जिक्र करना भी ठीक नहीं लगता; आज के दौर में जब रोटी कमाना इतना मुश्किल हो गया है कि उसकी कीमत इंसान की जान से भी ज़्यादा लगती है और रुपये की कीमत लगातार गिर रही है। जिन अपीलकर्ताओं ने अपना खून-पसीना बहाया है, वे अपनी ढलती उम्र में कहीं और अच्छी नौकरी नहीं पा सकते। वे सिर्फ सफाई कर्मचारी के तौर पर काम कर रहे थे, न तो उनकी ज्यादा शिक्षा थी और न ही उन्हें उचित सामाजिक दर्जा मिला था।” (पैरा 7.3.2)
इसके बजाय, कोर्ट ने रेगुलर नौकरी और सेवा जारी रखने के बदले हर अपीलकर्ता को एकमुश्त 20,00,000 (बीस लाख) रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
मुआवजे की रकम तय करते समय कोर्ट ने टिप्पणी की:
“AI के दौर में, हमें पक्का नहीं पता कि वे अपनी आजीविका कैसे चला पाएंगे, क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा समय छोटे-मोटे कामों में बिता दिया है। यहां तक कि एक कोऑपरेटिव बैंक के कर्मचारियों को कोऑर्डिनेट बेंच द्वारा दिया गया 10 लाख रुपये का मुआवजा भी इन गरीब लोगों को कितना भुगतान किया जाए, यह तय करने का सही पैमाना नहीं हो सकता। अगर अपीलकर्ताओं को सेवा में रेगुलर किया जाता, तो इसमें ज्यादा खर्च आता।” (पैरा 7.3.2)
बैंक को कुल 40 लाख रुपये आठ हफ्तों के भीतर देने का आदेश दिया गया। किसी भी देरी पर ब्याज के रूप में जुर्माना (पहले महीने के लिए 1% और उसके बाद 2%) लगेगा, जिसे कोर्ट ने दोषी बैंक अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से वसूलने का निर्देश दिया।
पूरा आदेश यहां पढ़ा जा सकता है:
स्थायी नौकरी क्यों नहीं मिला
इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की पांचवीं अनुसूची, जो कुछ तौर-तरीकों को ‘अनुचित श्रम व्यवहार’ (unfair labour practices) मानती है, उसमें ये शामिल हैं:
“10. कर्मचारियों को ‘बदली’ (badlis), कैजुअल या अस्थायी तौर पर रखना और उन्हें सालों तक इसी तरह बनाए रखना, ताकि उन्हें स्थायी कर्मचारियों का दर्जा और सुविधाएं न मिल सकें।”
अपील करने वालों ने तीस सालों तक और हर साल 240 दिनों से ज्यादा समय तक लगातार अपनी ड्यूटी निभाई। जानकारी के लिए बता दें कि बैंक की सरकारी खजाना शाखा (Government Treasury Branch) 11,000 वर्ग फुट से ज्यादा जगह में फैली है, जो तीन स्तरों- ऊपरी बेसमेंट, ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल- पर बनी है। इस जगह में आठ टॉयलेट और छह यूरिनल हैं। अपील करने वाले, आउटसोर्स किए गए कर्मचारियों के साथ मिलकर इस जगह पर सफाई का काम करते थे।
अनुबंध (contractual) या अस्थायी कर्मचारियों को रेगुलराइजेशन और लंबे समय के फायदे न देना भारत में कानूनी विवाद का एक बड़ा मुद्दा रहा है, और यह मामला कोई अकेला मामला नहीं है। सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमादेवी (2006) मामले में कोर्ट ने साफ किया कि अस्थायी, दिहाड़ी या अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारियों को स्थायी होने का कोई कानूनी या मौलिक अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को स्थायी बनाने के लिए ‘रिट ऑफ मैंडमस’ (writ of mandamus) जारी नहीं किया जा सकता, क्योंकि कर्मचारी के पास ऐसा दर्जा पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है जिसे लागू कराया जा सके और तय नियमों के अलावा राज्य की ऐसी कोई कानूनी जिम्मेदारी भी नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने उन कर्मचारियों के लिए एक बार के उपाय के तौर पर एक सीमित अपवाद भी बताया जिन्होंने कम से कम 10 साल की सेवा पूरी कर ली है। कोर्ट ने कहा कि रेगुलराइजेशन की अनुमति तब दी जा सकती है जब नियुक्ति ‘अनियमित’ (यानी प्रक्रिया में कोई कमी हो) रही हो, लेकिन ‘गैर-कानूनी’ न हो।
जग्गो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2024) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपील करने वालों की लंबी और बिना रुकावट वाली सेवा- जो दस साल से कहीं ज्यादा समय तक चली- को सिर्फ उनकी शुरुआती नियुक्तियों को पार्ट-टाइम या अनुबंध-आधारित बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके रोजगार के असल स्वरूप पर उनके लगातार योगदान, उनके काम की अहमियत और इस बात को ध्यान में रखकर विचार किया जाना चाहिए कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उनकी नियुक्ति किसी गैर-कानूनी या गुप्त तरीके से हुई थी। फैसले में कहा गया:
“प्रतिवादियों का यह दावा कि ये रेगुलर पद नहीं थे, सही नहीं है, क्योंकि अपील करने वालों का काम लगातार चलने वाला और दफ्तरों के कामकाज के लिए जरूरी था। इन कामों के बार-बार होने की वजह से इन्हें रेगुलर पद माना जाना चाहिए, भले ही शुरू में इन्हें कुछ भी नाम दिया गया हो। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अपील करने वालों को हटाने के बाद इन्हीं कामों को प्राइवेट एजेंसियों को सौंपने से पता चलता है कि इन सेवाओं की कितनी जरूरत थी। आउटसोर्सिंग का यह काम, जिसमें असल में एक ग्रुप के कर्मचारियों की जगह दूसरे ग्रुप के कर्मचारियों को लाया गया, यह भी दिखाता है कि वह काम न तो अस्थायी था और न ही कभी-कभार होने वाला।” (पैरा 13)
महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड बनाम ब्रजराजनगर कोल माइन्स वर्कर्स यूनियन (2024) मामले में, कोर्ट ने कहा कि रेगुलर और लगातार चलने वाले काम के लिए रखे गए कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट लेबर नहीं माना जा सकता।
इसी तरह, पिछले साल श्रीपाल बनाम नगर निगम (2025) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने उमादेवी मामले के पुराने फैसले को मानते हुए इस बात पर जोर दिया कि जो कर्मचारी किसी संस्थान के कामकाज के लिए जरूरी और लगातार चलने वाले काम करते हैं, उन्हें हमेशा दिहाड़ी मजदूर (डेली-वेज) के तौर पर नहीं रखा जाना चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ के लिखे फैसले में कहा गया:
“हालांकि उमादेवी मामले (ऊपर जिक्र किया गया) के फैसले का मकसद गलत तरीके से (बैकडोर एंट्री) नौकरी पाने के चलन को रोकना और यह पक्का करना था कि नियुक्तियां संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार हों, लेकिन अफसोस की बात है कि लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों के सही दावों को खारिज करने के लिए अक्सर इसके सिद्धांतों का गलत मतलब निकाला जाता है या गलत तरीके से लागू किया जाता है। इस फैसले का मकसद ‘गैर-कानूनी’ और ‘अनियमित’ (irregular) नियुक्तियों के बीच फर्क करना था। इसमें साफ तौर पर कहा गया कि अनियमित नियुक्तियों वाले कर्मचारी, जिन्हें मंजूरी प्राप्त पदों पर रखा गया था और जिन्होंने लगातार दस साल से ज्यादा समय तक काम किया था, उन्हें एक बार के उपाय के तौर पर रेगुलर करने पर विचार किया जाना चाहिए। हालांकि, फैसले का अच्छा मकसद तब बेकार हो जाता है जब संस्थान इसके निर्देशों का सहारा लेकर बिना सोचे-समझे कर्मचारियों के दावों को खारिज कर देते हैं, खासकर उन मामलों में भी जहां उनकी नियुक्तियां गैर-कानूनी नहीं होतीं, बल्कि उनमें सिर्फ प्रक्रिया से जुड़ी औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया होता है।” (पैरा 26)।
“भारतीय श्रम कानून उन हालात में हमेशा के लिए दिहाड़ी या कॉन्ट्रैक्ट पर काम पर रखने के खिलाफ है, जहां काम स्थायी प्रकृति का हो। नैतिक और कानूनी तौर पर, जो कर्मचारी साल-दर-साल नगर पालिका की लगातार जरूरतों को पूरा करते हैं, उन्हें आसानी से हटाया नहीं जा सकता, खासकर तब जब कोई असली कॉन्ट्रैक्टर एग्रीमेंट न हो।” (पैरा 15)।
मंजूरशुदा पदों की कमी का बहाना बनाकर दशकों तक नियमित काम लेते रहना, एक ऐसा रुख है जिसे कोर्ट ने धर्म सिंह बनाम यूपी राज्य (2025) मामले में कानूनी और नैतिक रूप से गलत माना।
इस साल जनवरी में, भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य (2026) मामले में, कोर्ट ने पाया कि एक दशक से ज्यादा समय तक काम करने वाले कर्मचारियों को नियमित करने से राज्य का इनकार समानता के सिद्धांतों का साफ उल्लंघन है। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि वे अपील करने वालों को उन मंजूरशुदा पदों पर तुरंत नियमित करें जिन पर उन्हें शुरू में नियुक्त किया गया था, और उन्हें सेवा से जुड़े सभी लाभ दें।
इसलिए, हालांकि सिर्फ लंबी सेवा ही अपने-आप नियमित होने की गारंटी नहीं देती, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है कि कर्मचारियों को एक ही तरह के स्थायी कामों में अस्थायी वेतन पर रखना और उन्हें लाभ न देना मनमाना और भेदभावपूर्ण माना जा सकता है।
मुकदमे के दौरान, इस मामले में अपील करने वाले मायाधर नायक अपनी पत्नी, दो बच्चों और लगभग 80 साल के पिता का भरण-पोषण कर रहे थे। दूसरी ओर, बैना नायक मानसिक और शारीरिक रूप से अक्षम बच्चे और एक अन्य बेटे की एकमात्र देखभाल करने वाले थे, वे सभी उनकी लगभग 16,000 रुपये की मामूली आय पर निर्भर थे।
कागजों पर, नायक परिवार को बेहतर नतीजे की उम्मीद थी। वे 1999 में ही हाई कोर्ट गए थे, जहां एक बेंच ने उन्हें 1999 में नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ सुरक्षा भी दिलाई थी और 2007 में कोर्ट ने SBI को निर्देश दिया था कि अगर स्वीपर की जगहें भरी जाएं तो उन पर विचार किया जाए। फिर भी, इनमें से कोई भी पहल कभी नियमित होने में नहीं बदली।
जब 2007/2008 के आदेशों के बाद दो जगहें खाली हुईं, तो SBI ने विभागीय तौर पर पद भरने के बजाय सफाई का काम आउटसोर्स करने का फैसला किया। इसके लिए बैंकिंग कामकाज में बदलाव के कारण नीति में बदलाव का हवाला दिया गया। चूंकि आउटसोर्सिंग के इस फैसले को कभी अलग से चुनौती नहीं दी गई, इसलिए यह लागू रहा और इसने उस स्थिति को ही खत्म कर दिया जिस पर अपील करने वालों का काम पर बने रहना निर्भर था। लंबे समय से काम कर रहे कैज़ुअल कर्मचारियों को सीधे नौकरी से निकालने के बजाय, काम के ढांचे में बदलाव के कारण कर्मचारी और उनका पद, दोनों ही खत्म हो गए। जब डिवीज़न बेंच ने 2025 की अपीलों पर सुनवाई की, तो उसने माना कि 2007/2008 के आदेशों में इस मामले का निपटारा पहले ही हो चुका था।
मुआवजा और देरी से मिला न्याय
रेगुलर होने से अपील करने वालों को पेंशन, मेडिकल सुविधाएं, प्रमोशन के मौके और सबसे जरूरी बात, रिटायरमेंट तक लगातार आय मिलती। एक बार मिलने वाला पेमेंट, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, नौकरी खत्म होने पर मिलने वाला एक विकल्प मात्र है।
इसका मतलब यह नहीं है कि मुआवजा बेकार है। हर व्यक्ति को 20 लाख रुपये मिलना एक बड़ी और जिंदगी बदलने वाली रकम है। साथ ही, देरी के लिए ब्याज और उस ब्याज के लिए दोषी अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने पर कोर्ट का जोर देना, वास्तव में एक उपयोगी तरीका है। लेकिन दशकों से चले आ रहे संस्थागत कैजुअल काम के सिस्टम के समाधान के तौर पर, हर मामले के खास हालात के आधार पर तय किया गया मुआवजा- जिसका कोई नजीर (precedent) नहीं माना जाएगा- शायद किसी पक्की रेगुलर स्कीम या कानूनी सुधार की जगह नहीं ले सकता। ऐसा सुधार जो जरूरी और हमेशा चलने वाले काम को हमेशा के लिए ‘टेम्परेरी’ बनाए रखने के मालिकों के लालच को खत्म करे! हालांकि सैलरी या एकमुश्त मुआवजा गरीबी से तो बचाता है, लेकिन यह सिस्टम के तहत होने वाले शोषण को खत्म नहीं करता। मुआवजा ज्यादा से ज्यादा एक सांत्वना है, मजदूरों को सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि न्याय चाहिए। खोए हुए करियर के मौकों, सम्मान और सुरक्षा को वापस लाने में मुआवजे की भूमिका बहुत कम होती है।
ओडिशा हाई कोर्ट ने इस मामले में माना कि “अपील करने वाले लगभग तीन दशकों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन किसी न किसी वजह से उन्हें पूरा न्याय नहीं मिल पाया है।”
यह कोई नई बात नहीं है। देरी हमारे ज्यूडिशियल सिस्टम की एक आम बात है। भारत में श्रम विवाद में आखिरी फैसला आने में आम तौर पर सात से दस साल लग जाते हैं। आम तौर पर श्रम विवादों के लंबे समय तक पेंडिंग रहने से कर्मचारियों में हताशा होती है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में इस देरी पर सीधे तौर पर ध्यान दिलाया, और कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट्स में पेंडिंग श्रम मामलों के बैकलॉग को कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट्स की “खराब हालत” बताया, जहां “गरीब मजदूरों को अपने लिए इंसाफ पाने के लिए जी-जान से लड़ना पड़ता है”। इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया।
AI के दौर में लेबर लॉ
फैसले के कम्पनसेशन कैलकुलेशन में बेंच को शक था कि अपील करने वाले “AI के दौर में… अपनी रोजी-रोटी चला पाएंगे,” क्योंकि उन्होंने अपनी कामकाजी जिंदगी मामूली काम और कम पढ़ाई-लिखाई में बिताई है। यह, एक तरह से, यह मानना था कि लंबे समय की नौकरी से निकाले गए वृद्ध, कम-स्किल्ड वर्कर्स के लेबर मार्केट में दोबारा आने की उम्मीदें सच में कम हो गई हैं। लेकिन यह एक बड़ी, नई न्यायिक जागरूकता के हिस्से के तौर पर पढ़ने लायक है कि ऑटोमेशन और टेक्नोलॉजी में बदलाव कम स्किल वाले, मैनुअल रोल के लिए असुरक्षित रोजगार के नुकसान को और बढ़ा देंगे।
जब कोई सरकारी संस्थान किसी काम को आउटसोर्स कर देता है या ऑटोमेशन के जरिए उसे मशीनों से करवाने लगता है, तो उसे केवल एक बार बदलाव की लागत उठानी पड़ती है। लेकिन जिस कर्मचारी की नौकरी चली जाती है, उसे इसकी कीमत पूरी जिंदगी चुकानी पड़ सकती है। अक्सर उसके पास न तो नई नौकरी के लिए जरूरी शिक्षा या कौशल होता है और न ही इतना पैसा (capital) कि वह किसी दूसरे काम की ओर बढ़ सके। कोर्ट की टिप्पणी इस अंतर को साफ तौर पर पहचानती है, भले ही वह इसे कानूनी स्टैंडर्ड में न बदले।
कानूनी जांच के तौर पर “काम का हमेशा रहने वाला नेचर” खुद ही कमजोर हो रहा है। रेगुलराइजेशन और कॉन्ट्रैक्ट लेबर पर ज्यादातर कानून यह मानते हैं कि अगर काम सच में स्थायी है, तो उसे स्थायी श्रम सुरक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन तीस साल से चले आ रहे काम को आउटसोर्सिंग और टेक्नोलॉजी के सहारे समय-बद्ध या खत्म किया जा सकता है, और इसके लिए कभी भी किसी विवादित प्रक्रिया में ‘स्थायी प्रकृति’ के मानक पर परखा नहीं जाएगा।
भारतीय अदालतों ने लंबे समय से रोजी-रोटी के अधिकार और उससे भी बढ़कर सम्मान को अनुच्छेद 21 से जोड़ा है। इसे AI के जमाने का उभरता हुआ कानून कहना शायद ज्यादा जल्दबाजी होगा। लेकिन बैंकिंग, टोल कलेक्शन, म्युनिसिपल सफाई जैसे ऑटोमेटिंग सेक्टर में बेघर कैजुअल वर्कर को रिप्रेजेंट करने वाले भविष्य के केस करने वाले इस बात को एक शुरुआती ज्यूडिशियल एक्नॉलेजमेंट के तौर पर बता सकते हैं कि टेक्नोलॉजी से होने वाले विस्थापन को अलग कानूनी भार मिलना चाहिए। हालांकि, जजों ने यह साफ कर दिया है कि यह ऑर्डर इस केस के फैक्ट्स पर आधारित है और उनका इरादा इसे एक जरूरी उदाहरण या बराबरी का नियम बनाने का नहीं है।
(CJP की लीगल रिसर्च टीम में वकील और इंटर्न हैं; इसे तैयार करने में तनिष्का शाह ने काम किया है)
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