टांगिया, उत्तर प्रदेश के वनग्रामों को मिला राजस्व दर्जा देश के उन 20 लाख वनगांव परिवारों के संघर्ष की कहानी, जिनकी गिनती जनगणना में भी नहीं होती

07, Jul 2018 | Roma (AIUFWP)

मघ्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, गुजरात, तमिलनाडुकेरलकर्नाटक आदि राज्यों को मिलाकर पूरे देश में लगभग 7000 ऐसे वनगांव मौज़ूद हैं जिनमें टांगिया वनमजदूरों के 20 लाख से भी ज़्यादा परिवार रहते हैं। टांगिया काश्तकारों को एक ऐसा व्यवसायिक जंगल उगाने की ज़िम्मेदारी दी गई जिसे बाद में काट लिया जाएगा। अब, जब ये काश्तकार प्रशासन को अनुपयोगी लग रहे हैं वो इन्हें भी जंगलों की ही तरह काटे दे रहा है।

 

ऑल इंडिया यूनियन ऑफ़ फ़ॉरेस्ट वर्किंग पीपल (AIUFWP) की सेक्रेट्री रोमा, टांगिया वनमजदूरों के इस पूरे संघर्ष की दास्तान की शुरुआत एक खुशखबरी के साथ करती हैं, रोमा कहती हैं…

 

सम्मानित साथियो,

               आपको बड़े हर्ष के साथ यह सूचना प्रेषित की जा रही है कि जनपद सहारनपुर के घाड़ क्षेत्र में बसे चार टांगिया गांव कालूवाला , सोधीनगर, भगवतपुर, और बुड्ढाबन के काश्तकारों को लम्बे समय से चले आ रहे यूनियन के आदोंलन के परिणामस्वरुप आखिरकार वन अधिकार कानून के तहत अधिकारपत्र दे दिये गये हैं। इसी क्रम में शिवालिक वन प्रभाग सहारनपुर के वन क्षेत्र में बसे कालूवाला टांगिया के काश्तकारों को सबसे बाद में दिनांक 06/06/2018 को जिला समाज कल्याण अधिकारी, सहारनपुर, प्रभागीय वन अधिकारी सहारनपुर व उप जिला अधिकारी बेहट की उपस्थिति में अधिकार पत्र दिये गये हैं परन्तु उपरोक्त चारों टांगिया गांव के कुछ दावेदारों के दावों का निराकरण नहीं किया गया है जबकि दावों के उपर खुली बैठक में चर्चा कर दस्तावेजीकरण के लिये सभी दावे उपखण्डिय समिति में प्रस्तुत किये जा चुके हैं। इन दावों के उपर वन अधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु कार्यक्रम किये जा रहे है।

गौरतलब है कि टंगिया गावों को राजस्व दर्जा दिए जाने का संघर्ष लम्बे समय लगभग 40 वर्षो से सहारनपुर के घाड़ क्षेत्र में चल रहा है। सहारनपुर और हरिद्वार  दोनों को मिलकर10 टांगिया गांव इस क्षेत्र में हैं, हरद्वार जिला भी पहले सहारनपुर में था। उत्तराखंड बन जाने के बाद सहारनपुर में अब केवल 4 टांगिया गांव रह गए हैं। यह संघर्ष वनाधिकार कानून के बनने से पहले का है व वनाधिकार कानून बनने की प्रक्रिआ में टांगिया गांव को राजस्व गांव में तब्दील करने के लिए राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच जो अब अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी मंच में तब्दील हो गया है ने संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष मुख्य तौर पर रखा था. उसी का परिणाम है कि कानून में देश में जितने भी वनग्राम हैं उन्हें राजस्व ग्राम में बदलने के लिए वनाधिकार कानून 2006 में प्रावधान किये गए हैं। इस कानून का पूरा नाम अनूसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वनसमुदाय वनाधिकारों को मान्यता कानून2006 है।

इस कानून को पारित हुए लगभग 12 वर्ष होने जा रहे हैं लेकिन अभी तक यह कानून पूरी तरह से धरातल पर लागू नहीं हो पाया है जिसका कारण मुख्य रूप से सरकारों के अन्दर इच्छा शक्ति की कमी का होना है। लेकिन उत्तरप्रदेश में टांगीयां गांवों को राजस्व गांवों का दर्जा देने की इच्छा शक्ति सरकार ने दिखाई है व योगी सरकार ने उत्तरप्रदेश के गोरखपुर, महराजगंज, गोंड़ा व अब सहारनपुर में इन वनग्रामों को अधिकार पत्र सौंप दिए हैं व राजस्व ग्राम में बदलने की प्रक्रिया की शुरूआत हो चुकी है। इससे पूर्व भी बसपा सरकार द्वारा सन् 2010 में  जिला लखीमपुर खीरी के दुधवा नेशनल पार्क में स्थित वनग्राम सूरमा, गोलबोझी और देवीपुर को राजस्व ग्राम का दर्जा इसी कानून के तहत प्रदान किया गया। यह हमारे संघर्षो की जीत है चूंकि वनाधिकार कानून पारित होने के बाद भी इन वनग्रामों को वनविभाग द्वारा तरह तरह का लालच देकर बेदख़ल कर खदेड़ने की कोशिश की जा रही थी व उनका उत्पीड़न किया जा रहा था। लेकिन संगठन के लगातार प्रयासों व सहारनपुर के नेता संजय गर्ग के अथक प्रयासों के चलते आज उत्तरप्रदेश के लगभग 50 टांगीयां वनग्राम बस्तियों को राजस्व का दर्जा प्राप्त होने जा रहा है जो कि अपने आप में एक मिसाल कायम करेगा अन्य राज्यों के लिए भी जहां अभी तक यह प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई है।

क्या हैं टांगिया वनग्राम बस्तियां

आज़ादी के बाद भी देश के जंगलक्षेत्रों में लगभग 5000 ऐसे टांगिया वनग्राम, गोठ व खत्ते मौज़ूद हैं,जो न सिर्फ़ विकास से पूरी तरह से महरूम हैं, बल्कि उनमें से अधिकांश देश के संविधान व चुनावी प्रक्रिया से भी बाहर हैं। सरकारी अभिलेखों में कहीं दर्ज न होने के कारण उनके पास अपने ही देश के नागरिक होने का कोई सबूत नहीं है। अंग्रेजी काल से ही उन पर निरंकुश हुक़़ूमत करने वाला वनविभाग व उसके आला अफ़सर आज भी जंगल बढ़ाने में अहम् किरदार निभाने वाले इस समुदाय के संवैधानिक अधिकारों को कुचलने की किसी कार्यवाही को अपराध नहीं समझते। वनसमुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्यायों की बात को स्वीकार करते हुये भारत सरकार ने भले ही ’’अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वननिवासी वनाधिकारों को मान्यता कानून’’पास करके देश भर में कागज़़ी तौर पर लागू भी कर दिया लेकिन इन वनग्राम बस्तियों के ऐतिहासिक अन्याय तो कानून के लागू होने के लगभग 12 वर्ष बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाए हैं।

यह कदम ऐसे ही नहीं उठाया गया बल्कि कई अफसरों ने भी इन वनग्राम बस्तियों के दर्द को पहचाना और इस पर वनाधिकार कानून आने के बाद काम करना शुरू किया। सन्2008 में उ.प्र. सरकार की पहल पर प्रदेश के एक प्रमुख अधिकारी श्री आर.के. मित्तल, समाज कल्याण आयुक्त का उ.प्र. के जनपद गोरखपुर व महाराजगंज के जंगलों में बसे टांगिया गॉवों के दौरे ने व प्रदेश के ऐसे सभी गॉवों को राजस्व का दर्जा देने व स्वतंत्र रूप से वनाधिकार समितियां गठित कराने के आदेश ने निश्चित रूप से इनमें बसे समुदायों को ऐतिहासिक अन्यायों से मुक्ति दिलाने की दिशा में बुनियाद रखने का काम किया।

हालांकि आज़ादी के बाद उ.प्र. के ख़ीरी, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में बहुत से वनग्रामों को  राजस्व ग्राम घोषित किया जा चुका है, लेकिन इनमें टांगिया वनग्राम, गोठ, खत्ते व फिक्स्ड डिमांड होलिंडंग गॉवों को व असंख्य वनग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं दिया गया है। वनटांगिया विकास समिति, विकल्प, व राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच के प्रयास से टांगिया वनग्रामों को राजस्व ग्राम में बदलने की बात मुख्य सचिव उ.प्र. द्वारा 19 जून 2008 को जारी किये गये प्रदेश में वनाधिकार कानून लागू कराने सम्बंधी आदेश में भी शामिल की गयी।

टांगिया गांवों के इतिहास पर एक नज़र

विदित हो कि टांगिया गॉवों की उत्पत्ति बर्मा में उन्नीसवीं सदी  के मध्य में हुई। टांगिया शब्द बर्मीइस शब्द है और वनों को पुनः उगाने के तरीके के लिए व पहाड़ों पर अल्पकालिक खेती के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बर्मा की भाषा के अनुसार ऑग का तात्पर्य पहाड़ है और या का तात्पर्य है खेती करना, इसलिए इस पद्धति का नाम टांगिया पड़ा। बर्मा में टांगिया पद्धति से जंगलों को पुनः आबाद करने के लिए स्थानीय कृषि की परम्परागत झूम पद्धति के साथ अनुकूल किया गया था। इस पद्धति ने वनों को लगाने के नये तरीकों को जन्म दिया, जिसमें वृक्षों में लिए क्यारियॉ बनाकर, क्यारियों के बीच में फसल उगायी जाती थी।

कुल मिलाकर टांगिया पद्धति बड़े भूपतियों वो चाहे राज्य हो, जमींदार हो या वन विभाग तथा भूमिहीन खेतमज़दूर के बीच बंधुआ बनाने का समझौता ही साबित हुई,जिसमें बेगारी निहित थी। इस पद्धति को वहां-वहां लागू किया गया जहां-जहां सामंती व्यवस्था से पीड़ित दलित, आदिवासियों एवं अन्य गरीब तबकों के पास या तो कृषि हेतु कोई भूमि नहीं थी या उनके पास अपनी बेरोजगारी व गरीबी से लड़ने का कोई और रास्ता नहीं था। टांगिया मज़दूरों को इससे कृषि भूमि तक पहुंच तो उपलब्ध हुई, लेकिन वह उसका अधिकारी कभी नहीं बना। पेड़ों की परवरिश व  वृक्षों के रखरखाव का सारा फायदा आगामी प्रोजेक्टों में वनविभाग को ही होता था। लेकिन तब तक टांगिया मज़दूर को दूसरी जगह पर भूमि दे दी जाती थी, जिस पर उसे फिर से कड़ी मेहनत कर के जंगल उगाना होता था। कुल मिलाकर उसकी स्थिति सुधरने का कोई रास्ता वनविभाग व उसे पालने वाली सरकारें नहीं छोड़ती थीं।

भारत में टांगियां पद्धति की शुरुआत

भारत में टांगियां पद्धति की शुरुआत सन् 1920 के आसपास हुई। योरोप के जंगलों का सफाया करने के बाद बरतानिया हुकूमत को जब उस समय उद्योग, कारखानों को  लगाने के लिये व कच्चे माल की पूर्ति करने के लिए व्यवसायिक लकड़ी की भारी ज़रूरत पड़ी और उन्हें हिन्दुस्तान के भी ख़त्म होते जा रहे जंगलों को देख कर चिन्ता हुई। इसका उल्लेख नैनीताल में हुई पहली टांगियां कान्फ्रेंस के दस्तावेजों में भी मिलता है। जिनमें स्पष्ट तौर पर लिखा है, कि टांगिया पद्धति से जंगल उगाने के लिये मज़दूरों को वनों के आस-पास बसने वाले गॉवां से लाया जाए। इसके लिये ज्यादहतर मज़दूर जिन गॉवों से लाए गए वहां वे मुख्यतः या तो भूमिहीन थे या फिर जमींदारों व बड़े काश्तकारों की ज़मीनों पर बेगारी करते थे और इनमें अधिकांश लोग निम्न जातियों से थे।

वृक्षारोपण की मज़दूरी की एवज़़ में उन्हें प्रति परिवार एक एकड़ भूमि दी जाती, ताकि वह उस ज़मीन से अपने परिवार का ठीक से पालन-पोषण करने का सपना देखते हुये ज़िन्दा रह कर, स्थायी रूप से वृक्षारोपण के कार्य को ही करते रहें। जिससे उन्हें साल, शीशम, खैर, सागौन, यूकोलिप्टस आदि जैसे भारी मुनाफा देने वाले पेड़ लगातार मिलते रहें।

उत्तर प्रदेश में टांगिया पद्धति की शुरुआत के लिये केन्द्रीय संयुक्त प्रांत की पहली वन टांगिया कान्फ्रेंस नैनीताल में ब्रिटिश शासन द्वारा 31 अगस्त से 2 सितम्बर 1920  को बुलाई गई, तत्पश्चात विभिन्न जिलों में इस पद्धति को विधिवत लागू किया गया। उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, महराजगंज, गौंडा, बहराईच, लखीमपुर ख़ीरी, पीलीभीत, सहारनपुर, आदि में इस पद्धति को लागू किया गया तथा हरिद्वार, देहरादून, ऋषिकेश, चम्पावत, खटीमा, रामनगर एवं नैनीताल में टांगिया के अलावा विभिन्न नामों से वनग्रामों को बसाया गया जो कि अब उत्तराखंड में आते हैं।

वन जो उगाए ही इसलिए गए के काटे जा सकें

टांगियां पद्धति न केवल साल प्लांटेशन के लिये थी, बल्कि इसका मकसद था छोटे-छोटे व्यवसायिक प्रजातियों का भी पौधारोपण करना ताकि मिश्रित वन तैयार हो सकें, जिसे अंग्रेजों ने सिलवीकल्चर तकनीक कहा जो कि केवल व्यवसायिक प्रयोग के लिए उगाये जाते थे। इसके साथ-साथ चारे के लिये भी पेड़ों को उगाना था, जिससे कि गांवों में तथा जंगलों में रहने वाले व पशुपालन पर निर्भर रहने वाले  वनगुजरों आदि से चराई लगान की मोटी रकम वसूल की जा सके। इस पद्धति का पूरा चक्र 60 साल का होता था, जिसे वर्किंग प्लान कहा जाता था। यानि 60 साल के बाद ही इन वनों की कटाई की जा सकती थी, और ये वन काटने के लिये ही लगाये जाते थे। इस पद्धति को वैज्ञानिक वानिकी भी कहा गया, जब कि देखा जाये तो यह केवल व्यापार के लिये वृक्षारोपण का कार्यक्रम था, न कि जंगल पनपाने का। ऐसा लगता है कि टांगिया वनग्रामों में रह रहे सनुदयों को भी इन व्यवसायिक वनों की ही तरह शायद बसाया ही इसलिए गया के एक दिन उजड़ा जा सके।

उत्तराखंड में इन वन बस्तियों को गोठ और खत्ते भी कहा जाता है। गुमानीवाला, मन्सादेवी, भोटियाप्लाट, रोजाफार्म, महोवाली तथा बीबीवाला, चम्पावत तहसील में दीनीगोठ,थोलखेड़ा, फालपुर, बेरीगोठ, भैलागोठ, हैलागोठ, रजनागोठ, उद्यम सिंह नगर, तहसील खटीमा में पंथागोठ, बूढ़ाबाग, पचौरा नई बस्ती, टेलीकाल, नगला, बग्गाचमन, पचपोखरा,तथा टनकपुर तहसील में रानीगोठ, भैसाझाला और देवीपुरा को वनविभाग ने स्थापित किया। इनमें इतना फर्क था कि विभागीय प्लांटेशन के असफल हो जाने पर जर्मन तकनीक से वैज्ञानिक वानिकीकरण की योजना वनों को लगाने के लिये बनाई गई। देहरादून के पहाड़ों की तलहटी (शिवालिक) पर वन विभाग द्वारा ‘सिल्वीकल्चर’  तकनीक से सागौन एवं साल के जंगल लगाने की बहुत कोशिशें की गई लेकिन प्रतिकूल जलवायु न होने के कारण यह प्लांटेशन असफल रहे। उस सूरत में आसपास के गॉवां से गरीब तबके के दलित,पिछडो व गरीब मुस्लिमों को जनपद हरिद्वार, सहारनपुर से लाकर कई गांव बसाये गये। ग्राम हरिपुर टांगिया, कालूवाला, सोढी नगर, रसूलपुर, हजारा, टीहरा, कमला नगर,पुरुषोतम नगर, भगवतपुर आदि ऐसे ही बसाये गये गॉव हैं।

विभागीय प्लांटेशन की असफलता की पुष्टि के सबूत हमें वन विभाग के वर्किंग प्लान से भी मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर सन् 1923-1931 के बीच वन विभाग द्वारा हरिद्वार रेंज के पथरी जंगल में 925 एकड़ ज़मीन पर वनविभाग द्वारा 30,000 रु. लगा कर प्लांटेशन किया गया, परन्तु वह पूरी तरह से असफल हो गया। मोबस वर्किंग प्लान के तहत फिर यही जंगल टांगिया काश्तकारों से लगवाने के लिये पत्र संख्या 24 मार्च 1935, 317-106/12-35 के तहत  लखनऊ में पंजीकृत किया गया तथा 2000 एकड़ भूमि पर टांगिया पद्धति से  जंगल लगाया गया, जो पूरी तरह से सफल हुआ वो भी बिना किसी लागत के। इसका मुख्य कारण था कि जिस भूमि पर जंगल लगाया जाना होता था, उसे पहले जला कर हल चलाया जाता था व फसलों के साथ-साथ पौधों की भी परवरिश की जाती थी। लेकिन वनविभाग द्वारा इससे पहले बग़ैर ज़मीन तैयार किये ही जंगल लगाये जाते थे, जिसकी वजह से प्लांटेशन असफल रहते थे। उदाहरण के तौर पर जनपद हरिद्वार में पथरी क्षेत्र का जंगल दलदल से भरा था। यहां जंगल लगाने के लिये कोई भी आसानी से तैयार नहीं होता था। कमलानगर और पुरूषोत्तम नगर टांगिया गॉवों में पथरी से 35 किमी दूर भारूवाला आदि गॉवों से दलितों और कश्यपों को लाकर बसाया गया। इसके अलावा 80 किमी दूर मुजफ्फरनगर तथा 40 किमी दूर लंढ़ौरा से लोगां को लाकर यहां बसाया गया। पुरुषोत्तम नगर के 65 लोगों एवं कमलानगर के 26 लोगों को ढाई-ढाई एकड़ रियायती भूमि दी गई। यहां पर आकर लोगों ने स्वतंत्रता जरूर महसूस की चूंकि यहां जमीनें बहुत थीं। पहले वर्ष तो दिये गये प्लाट पर लोग केवल फसल लिया करते थे। ऐसा करने के पीछे दो वजहें थीं, एक इससे यहां लाये गये मज़दूरों के खाने के लिये कुछ मात्रा में अनाज जुट जाता था दूसरे सौंपी गयीं खराब ज़मीनें वृक्षारोपण के लिये तैयार हो जाती थीं। इस लिये पेड़ों की बुआई अगले वर्ष ही की जाती थी। हालांकि वनविभाग के लिये दूसरा कारण ही ज़्यादा महत्वपूर्ण था।

इसी तरह देहरादून क्षेत्र में सतीवाला एवं दिलीप नगर टांगिया को 1932 में बसाया गया, जो कि डोईवाला क्षेत्र में आते हैं। ये सभी लोग सहारनपुर क्षेत्र से नदियों के कारण विस्थापित हुये थे। इसी तरह चांडी एवं बालकुमारी जैसे टांगिया को आजादी के बाद सन् 1970 में वन विभाग द्वारा बसाया गया था। बालकुमारी में 70 तथा चांडी में 60 काश्तकारों को बसाया गया जिसमें 50 फीसदी लोग दलित थे।

इन सभी जगहों पर टांगिया पद्धति लगभग एक ही समय में लागू हुई व उसका स्वरूप भी बिल्कुल एक जैसा ही था। खेती की भूमि के अलावा टांगिया गॉवों को वनविभाग द्वारा स्वास्थ्य एवं शिक्षा की सुविधा बरायनाम इनके तथाकथित विकास के लिये उपलब्ध करायी जाती थी। चॅूकि ये गॉव राजस्व ग्राम के अन्तर्गत नहीं आते थे, इसलिए इनके विकास की जिम्मेदारी वन विभाग को सौंपी गयी थी। वनीकरण के साथ-साथ टांगिया काश्तकारों की अन्य जिम्मेदारियां भी थीं। उन्हें जंगल के अंदर व्यवसायिक पेड़ों को काटना, सड़क बनाना, फायर लाइनों की सफाई करना, बरसातों के बाद सड़क बनाना इत्यादि के काम भी करने पड़ते थे, जिसका उन्हें कोई मेहनताना नहीं दिया जाता था।

टांगिया वनग्रामों में ठेकेदारी प्रथा की शुरुआत व नुकसान

साठ के दशक तक आते-आते वनों पर काफ़ी दबाव बना और वनों के अंदर ठेकेदारी प्रथा की शुरूआत की गई। इसके बाद जंगल के तमाम व्यवसायिक काम स्थानीय ठेकेदारों को सौंप दिये गए। ये ठेकेदार वनों से सम्बन्धित पूरी व्यवस्था में नये तरीके की शोषण शक्तियां बनकर सामने आए। इन ठेकेदारों ने टांगिया काश्तकारों को इस्तेमाल करना बन्द कर दिया। ठेकेदार अन्य क्षेत्रों से मज़दूरों को लाकर जंगलों में न सिर्फ पेड़ लगवाने का बल्कि अन्य लघुवनोपज एकत्रित कराने आदि का काम भी करवाने लगे। इन ठेकेदारों ने वास्तव में वनविभाग के साथ मिल कर जंगलो का विनाश करने के काम को और तेज़ी दे दी, जिसमें इमारती लकड़़ी, दुर्लभ जड़ी बूटियां व वन्य जन्तुओं की तस्करी के काम बड़े पैमाने पर शामिल थे। इस तरह से  टांगिया काश्तकार रोज़़गार के अभाव में भयंकर रूप से दिक्कतों का सामना करने को मजबूर कर दिये गये। उसी दौर में वनविभाग ने यह दर्शाना शुरु किया, कि अब उन्हें टांगिया काश्तकारों की ज़रूरत नहीं है। जबकि यही वो दौर था जब वनों के मूल्य में बेइन्तहा वृद्धि हुई व वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों को ठेकेदारों के साथ मिलकर और ज़्यादा मोटी कमाई होने लगी। इस प्रक्रिया के तहत ठेकेदारों ने बडे पैमाने पर कीमती वन सम्पदा को वन विभाग के कर्मचारियों एवं अधिकारियों से मिलकर अवैध रूप से चोरी करना भी शुरू कर दिया।

ये वो गांव हैं जिन्हें देश के नक़्शे में भी कभी शामिल नहीं किया गया

टांगिया गावों की तक़लीफ़ अपने चरम पर तब पहुंची, जब सन् 1980 में इन्हें नाम मात्र को दी जाने वाली  स्वास्थ एवं शिक्षा की सुविधाएँ भी वन विभाग ने पूर्ण रूप से बन्द कर दीं। टांगिया गॉवों में प्राइमरी स्कूल चलाने की जिम्मेदारी वन विभाग की थी, जो कि अंग्रेजी हुक़ूमत के दौरान पहली टांगिया कान्फ्रेस की प्रस्तावना में निहित थी। नयी तरह की इस व्यवसायिक वन व्यवस्था ने टांगिया काश्तकारों की जंगल के बारे में परम्परागत जानकारी को पूर्ण रूप से नकार दिया और वन विभाग को ये काश्तकार अन्ततः बोझ लगने लगे। अब इन गॉवों को वनों में बसाए रखने में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं रही। यहॉ तक कि 70 के दशक की शुरूआत से ही वन विभाग ने इन लोगों का शोषण और तेजी से करना शुरू कर दिया। 60-70 साल उस भूमि पर रहने के बावजूद भी टांगिया के लोगों को पक्के मकान बनाने का कोई अधिकार नहीं था और न ही इन्हें वोट देने का अधिकार मिला था। सरकारी अभिलेखों में देखें तो टांगिया गॉवों का अस्तित्व कहीं भी नहीं है और न ही ये देश के किसी नक्शे में मौजू़द हैं। देश के नागरिक होने का दर्जा देना तो दूर ये देश की जनगणना में ही शामिल नहीं हैं। कहीं-कहीं टांगिया ग्रामों को पंचायत के चुनाव के लिए पास के राजस्व गांव से जोड़ा गया है, लेकिन राजस्व गॉव के विकास व सभी तरह की सरकारी योजनाओं से टांगिया गॉव हमेशा वंचित रहते हैं। यही कारण है कि टांगिया निवासियों की दिलचस्पी उन राजस्व गॉवों की पंचायती गतिविधियों में भी नहीं रहती, जिनसे उन्हें जोड़ा गया है। ये अलग बात है कि ऐसे गॉवों को वोट देने का अधिकार दिया गया है, जिसमें सरकारों का केवल अपना राजनैतिक लाभ ही अंतर्निहित है।

भारत में वनग्राम

भारत में वनग्राम सबसे पहले 1890 में  असम, बंगाल एवं मध्यप्रदेश केन्द्रीय प्रांत में एक साथ अस्तित्व में  आए। उस उमय ब्रिटिश शासकों द्वारा तैयार किये गए वर्किंग प्लान में इन मज़दूर बस्तियों का हल्का फुल्का उल्लेख है। लेकिन इस संदर्भ में वार्षिक तौर पर कोई सही आंकड़ा उपनब्ध नहीं है व यह साफ नहीं हैं कि ये बस्तियां कब-कब बसाई गईं। सन् 1920 के दस्तावेज़ों को देखने से यह तो पता चलता है कि ये वनग्राम मशहूर ब्रांडिस प्लान के तहत जंगल को आग से बचाने के लिए बसाये गये थे।

गौरतलब है कि अंग्रेजों के पास जंगल लगाने की अपनी कोई तकनीक नहीं थी क्योकि वे अपना जंगल तो पहले ही नष्ट कर चुके थे। इसलिये अंग्रेजों ने र्जमन वैज्ञानिक वानिकी के विषेशज्ञ डाइट्रिच ब्रांडिस को वनों पर भारत का पहला इंस्पेक्टर जनरल नियुक्त कर, जर्मन तकनीक से जंगलों की सबसे बड़ी दुश्मन आग से लड़ने की योजना बनाई। हाल ही में अध्ययनकर्ताओं ने यह खोज की है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजों ने जंगल में आग पर नियंत्रण करने की बात को नीतिगत रूप से वास्तव में जंगल पर अपना नियंत्रण क़ायम के लिए मजबूत हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। वन में या वनों के आसपास पनपने वाले घास की प्रजातियों को आग लगा कर झूम पद्धति से नियंत्रित खेती करने वाले समुदाय जंगल की आग को नियंत्रित करने की ख़ास तकनीक परंपरागत रूप से जानते थे, तथा यही समुदाय चराई के लिये बड़े-बडे़ घास के क्षे़त्रों को जलाने का काम भी जानते थे,जहां बाद में मवेशियों के लिये बढ़िया चारा उगाया जाता था। सबसे पहले इन्हीं आदिवासी सामुदायिक बस्तियों को वनग्राम घोषित किया गया था।

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में वनग्रामों  की समस्या पर काम करले वाले अनिल गर्ग प्रमाण सहित बताते हैं कि अंग्रेजों ने मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में ऐसे कई राजस्वग्रामों को जो पहले से ही वहां पर मौजूद थे, को वनग्राम घोषित कर उनके तमाम संवैधानिक अधिकारों को समाप्त कर दिया था। आदिवासियों को वनविभाग के लिये ज़बरी मशक्कत यानि बेग़़ारी करने पर मजबूर किया जाता था, जिसके लिये उन्हें कोई मेहनताना नहीं मिलता था। केवल भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा अपने परिवार का पेट भरने के लिये दिया जाता था,जिस पर उन्हें अत्याचार एवं शोषण के चरम को सहते हुए खेती करते हुए जीने भर का सामान जुटाना होता था। वनविभाग के इस आतंक के चलते कई परिवार गॉव छोड़कर भाग भी जाते थे।

जंगल की आग पर काबू पाने के माहिर होते हैं टांगिया

सन 1910 के आते-आते टांगिया पद्धति को एक बड़ी पर्यावरणीय घटना के रूप में देखा जाने लगा। चूंकि यह तकनीक आग के नियंत्रण के इर्दगिर्द थी तथा टांगिया मज़़दूरों को आग की इकोलोजी के बारे में बहुत अच्छी जानकारी थी। उत्तरी बंगाल में सन् 1875 से अंग्रजों ने वहां के साल जंगलो का व्यवसायिक इस्तेमाल शुरू किया, जिससे इन सवाना घास क्षेत्रों का पूरा पर्यावरण बदल गया। सन 1929 में बक्सा जंगल का चौथा वर्किंग प्लान बनाया गया, जिसमें बड़े पैमाने पर सवाना जंगलों के बीच में साल जंगल व मिश्रित नये जंगल तैयार किये गए तथा धीरे-धीरे सवाना घास क्षेत्रों को आग नियंत्रण तकनीक से कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रखा गया। इस तरह से बेशुमार कुदरती जंगल को काट कर, जंगल प्लांटेशन  द्वारा उगाये गये, जो कि ज़्यादातर एक प्रजाती के जंगल थे। इस प्रक्रिया के चलते बक्सा के सवाना जंगल से दुर्लभ वन्य जन्तु लुप्त हो गए। यह पूरा क्षेत्र भूटान के राजा के अधीन था और यहां रावा, गारो, मेंच, लिम्बु आदि झूम पद्धति से खेती करने वाली प्राचीन आदिवासी जनजातियां बसी हुयीं थीं, जो कि अब भी निवास करती हैं। सन् 1865 में अंग्रेजों ने इस पूरे इलाके को अपने औपनिवेशिक फायदों के लिये कब्ज़े में लिया।  बड़े-बडे़ वन क्षेत्रों को समाप्त कर चाय बागानों को लगाया गया, तथा भूमि का बन्दोबस्त वहां पर रहने वाले जोतदारों तथा बाहर से लाए गए जोतदारों के साथ किया गया। इस पूरे इलाके का राजस्व ढांचा पूरी तरह से बदल दिया गया, क्योंकि बड़े पैमाने पर यहां पर बाहर से ला कर लोगों को बसाया गया। चाय बागानों के लिये छोटानागपुर से सस्ते मज़दूरो के रूप में सांथाल आदिवासियों को लाकर बसाया गया, खेती करने के लिये अन्य मज़दूरो को भी ला कर यहां बसाया गया। इस तरह से वनों में रहने वाले तमाम समुदाय अपने आप जंगल से बेदखल हो गये तथा बाकी बचे जंगलो को अंग्रेजों ने आरक्षित वन घोषित कर वनविभाग के अधीन कर दिया। इस प्रक्रिया में यहां के मूल निवासियों व यहां रहने वाले समुदायों के सभी अधिकार पूरी तरह समाप्त कर दिए गए।

वो गांव जिनका आज भी कोई नाम नहीं सिर्फ़ नंबर है

पशिम बंगाल में एक अन्य तरह के गॉव फिक्स्ड होलडिंग को भी बसाया गया था, ये गॉव ब्रिटिश काल में लकड़़ी व्यापारियों एवं वनविभाग के बीच हुये एक समझौते के तहत बसाये गये थे। वनों के कटान एवं लकड़ी के व्यापार हेतु बाहर से लाये गए इन मज़दूरो एवं कर्मचारियां के लिये वनों की सीमा के बाहर की ज़मीनों पर इन कालोनियों को स्थापित किया गया, जिन्हें  वनविभाग को राजस्व देना होता था।

इस तरह से कुल मिला कर उत्तर बंगाल के जिला जलपाईगुडी  एवं कूच बिहार में 97 फिक्स्ड डिमांड गॉव हैं, जिनके पास न तो भूमि है न पक्के घर और न ही कोई रोजगार। पश्चिम बंगाल में कुल मिला कर 230 ऐसे वनगांव हैं। इन टांगिया गॉवों का आज तक कोई नाम नहीं है, आज भी ये कम्पार्टमेंट के नम्बरों से ही जाने जाते हैं।

इसी  तरह मध्यप्रदेष एवं छत्तीसगढ़ के वनग्रामों की भी यही पीड़ा है। वहां उन्हें टांगियां नहीं वनग्राम कहा जाता है। जैसा कि ऊपर भी उल्लेख किया जा चुका है कि औपनिवेशिक काल में प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़े को इनके दोहन के लिये आवश्यक माना गया था। ब्रिटिश सरकार द्वारा इस नीति के तहत पहला स्टीक वार 1872 में वन कानून बना कर किया । इस कानून से वनों पर सरकार का अधिपत्य पूरी तरह से स्थापित हो गया। इसके लिये अब वनक्षेत्रों में बसी बस्तियों को वनभूमि के रूप में वनखण्ड बनाकर अधिसूचित कर दिया गया। वनों पर आश्रित समाज की पहुंच से सुनवाई की सारी प्रक्रियायें बहुत दूर कर दी गयीं। यही कारण रहा कि, अनेक बस्तियों को जो 1872 के पहले से ही वनों में या वनों के आसपास बसी हुई थीं, बस्ती मानने के बजाय वन मानकर कब्ज़े में ले लिया व वहां निवास करने वाले आदिवासियों को वनविभाग का श्रमिक बना लिया गया। बैतूल ज़िले में भूमि बंदोबस्त के रूप में 1868 में धार ग्राम जो कि बैतूल एवं हौशंगाबाद की सीमा पर बसा हुआ है, का राजस्व रिकार्ड तैयार किया गया था, लेकिन 1879 में इस गॉव को वनभूमि के रूप में अधिसूचित कर दिया गया।

अंग्रेजों के गुलामपसंद कानून अब भी जस के तस हैं

मघ्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में 1346 ऐसे वनगॉव  हैं, असम मे 524 व गुजरात मे 500 वनगॉव हैं। इसके अलावा तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक आदि राज्यों को मिलाकर पूरे देश में लगभग 7000 ऐसे वनगांव मौज़ूद हैं जिनमें टांगिया वनमज़दूरों के 20 लाख से भी ज्यादा परिवार बसे हुए हैं।

टांगिया गॉव के संदर्भ में अगर देखा जाए तो आज़ाद भारत की सरकारों व वनविभाग द्वारा संविधान की बड़े धड़ल्ले से धज्जियां उड़ाई गइं अग्रेजों के बने कानून जो मूल रूप से संविधान की मंशा के ठीक उलट थे उन्हें आज तक जारी रखा गया है। टांगिया पद्धति जैसी गुलाम व्यवस्था को 80 के दशक तक चलाया गया। यहां तक कि आज़ादी के बाद भी भारत सरकार द्वारा इन गुलाम बस्तियों को निरन्तर कई राज्यों जैसे बंगाल, उतर प्रदेश, उत्तराखण्ड, असम आदि में बसाया गया। उत्तरी बंगाल में तो वन विभाग और टांगिया गॉवां के बीच 60 के दशक के अंत तक अनुबंधों पर दस्तखत किये जाते रहे। 70 के दशक के अंत तक आते-आते टांगिया व्यवस्था के तहत अनुबंधों की समाप्ति भी कर दी गई। इस समय तक आते-आते भारत के कई नये राज्यों में वनविभाग को अहसास हो रहा था कि अब टांगिया काश्तकारों से बेगारी के रूप में काम नहीं कराया जा सकता। तब इनके लिये कुछ वेतन मान भी तय किया गया, लेकिन वो भी इतना कम था कि टांगिया काश्तकारों में लगातार बढ़ रहे रोष को कम करने के लिये नाकाफ़ी साबित हुआ।

अपने मौलिक अधिकारों से भी वंचित हैं वनग्रामवासी

इन सब के अलावा एक बड़ी विडम्बना यह रही कि इन वनग्रामों एवं टांगिया गॉवों में शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार को भी सरकार ने कोई मान्यता नहीं दी तथा वहां चलाए जा रहे स्कूलों को लेकर भी सरकार द्वारा कोई राजनैतिक इच्छा नहीं दिखाई गई। 1980 के आते-आते ये सभी स्कूल भी बंद कर दिये गये । 90 के दशक तक उत्तर प्रदेश के गोरखपुर तथा हरिद्वार जिलों में बसे टांगिया गॉवों में जब पक्के मकान बनाये गये तो वनविभाग के र्कमचारियों ने आकर उन मकानों को तोड़ दिया। इसी तरह टांगिया विकास के लिये जब वनविभाग द्वारा टांगिया फण्ड का गठन किया गया तब उस धन राशि में भी घोटाला कर वन विभाग के र्कमचारी अच्छी खासी मोटी रकम लील गए।

आज़ादी के बाद वनग्रामों एवं टांगिया गॉवां के साथ निश्चित रूप से भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाया गया। राजस्व गॉवों के लिये  तो विकास का पैमाना तय किया गया लेकिन उनके पास बसे वनगॉवों के लिये विकास का कोई पैमाना उनके पास मौजू़द नहीं था। दूसरी ओर इन गॉवों में परिवारों के बढ़ने के कारण एक और समस्या उत्पन्न हो रही थी, वो थी वनग्राम एवं टांगिया मज़दूरों के बच्चों के बड़े होने पर उन्हें वनविभाग के काश्तकारों के रूप में मान्यता न देकर दिये गये नाममात्र के अधिकारों से भी वंचित कर  देने की समस्या। उनको न तो भूमि का कोई पट्टा दिया गया और न ही उनके साथ किसी तरह के नये समझौते किये गये। आजीविका का कोई और विकल्प न होने के कारण इस नई पीढ़ी की बढ़ी हुई जनसंख्या के सामने बहुत सस्ते दरों पर वनविभाग के लिये विभागीय प्लांटेशन करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

टांगिया काश्तकारों में असंतोष की शुरुआत

70 के दशक के आते-आते टांगिया काश्तकारों की समझ में आने लगा था कि उनके अधिकार चुप बैठ कर अन्याय सहते रहने  से नहीं दिये जाएंगे। चूंकि वनविभाग ने काश्तकारों के साथ आगामी समझौतों को रोक दिया था, वनविभाग की इस चालाकी को भांपते हुये कई गावों में प्लांटेशन  के लिये पट्टे पर दी गयी ज़मीनों पर टांगिया काश्तकारों ने अपना दख़ल कायम कर लिया। लेकिन सन् 1980 में वन संरक्षण कानून पारित होने के बाद वनविभाग द्वारा वनाग्रामों एवं टांगिया काश्तकारों को वनक्षेत्रों से  बाहर करने की नई योजना बनाई गई। वनविभाग के लिये जंगल बढ़ाने व बचाने वाली वनमज़दूरों की ये पूरी फौज  बेकार हो चुकी थी। अब वे किसी भी तरीके से इन मज़दूरों और कुलियों से मुक्ति चाहते थे।

इसी प्रक्रिया में टांगिया काश्तकारों को वनभूमि से बेदख़ल करने से पहले वनविभाग ने इनके बच्चों को शिक्षा से वंचित करने के लिये एक रणनीति के तहत वनगॉवों में चल रहे स्कूलों को बन्द करवा दिया। गोरखपु वर्किंगप्लान सन्1980-90 में जिसका स्पष्ट उल्लेख है। जिसमें एक मुख्य वन संरक्षक ने साफ कहा है कि टांगिया बच्चों को शिक्षा न दी जाये,नहीं तो ये पढ़-लिख कर अपने अघिकारों की मांग करेंगे। यही वजह रही कि वनविभाग ने एक तरफ इन मजदूरों को अधिकार देने के बजाय ठेकेदारी प्रथा को और मजबूत करने के काम को तेज़ी दी, तो दूसरी तरफ धीरे-धीरे  टांगिया काश्तकारों के सभी अधिकारों एवं रियायतों को समाप्त कर दिया। आखिरकार  टांगिया गॉवों को बेदख़ल करने के लिए वनविभाग ने राज्य द्वारा सन् 1985 में  टांगिया गॉवों को जगह खाली करने का नोटिस ज़ारी किया।  हरिद्वार व गोरखपुर जिलों में यह आदेश एक ही समय पर ज़ारी किया गया। गौरतलब है कि ज़िला हरिद्वार में यह आदेश वहां ज़ारी किया गया जहॉ राजाजी नेशनल पार्क एवं आरक्षित वन था और गोरखपुर में वहां जहां पर आरक्षित वन थे । हरिद्वार में 9  व गोरखपुर में 23 टांगिया गॉवों के लिए यह नोटिस जारी किया गया । इन दोनों जगहों पर टांगिया गॉवों में बसे लोगों ने इस आदेश का जमकर विरोध किया ।

जब अमानवीयता के चरम पर जा पहुंचा वन विभाग

गोरखपुर में वन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों ने वन टांगिया मजदूरों के उत्पीडन को लेकर सारी हदें पार कर दीं । तमाम टांगिया ग्रामों को बेदखली के आदेश ज़ारी करने के बाद  गॉव उजाड़े जाने लगे । फसलें ट्र्क्टर से रौद दी गईं । गोरखपुर के तिलकोनियां वनग्राम में 6 जुलाई 1985 को वनविभाग द्वारा अंजाम दी गयी घटना इतिहास के पन्नों कलंक के रूप में दर्ज हुई । वनरेंज अधिकारी विजय प्रताप सिंह के नेतृत्व में नौ वन कर्मियों ने खेत में काम कर रहे वन टांगिया किसान परदेशी पर गोलियां चलाईं । लाठी, डण्डे और असलहे से लैस वनकर्मियों ने वनटांगिया परिवारों के घरों को फॅूक दिया । फायरिंग एवं मार से करीब 27-28 वनटांगिया किसान बुरी तरह से घायल हो गए व दो काश्तकारों की मौत हो गई। जिला न्यायालय ने लगभग 6 वर्ष पश्चात ‘31 दिसम्बर 1991 को नौ अभियुक्तों के लिये आजीवन कारावास की सजा मुकर्रर की।

महाराजगंज के कम्पार्ट नंबर 24 वनग्राम में वन अधिकारी की मौजूदगी में पूरे गांव में लूट-पाट की गई। फसलों को ट्रेक्टर से रौंदवा दिया गया तथा लोगों के साथ अमानुषिक व्यवहार किया गया। इसी तरह कैम्पियरगंज के ‘भारीवैसी’ वन ग्राम में भी फसलें रौंदी गयीं तथा लोगों को थानें में लाकर पीटा गया। वनविभाग द्वारा किए जारहे इस उत्पीड़न से त्रस्त हो कर आखिरकार वन टांगिया मज़दूरों ने जिला न्यायालय में अपनी ज़मीन के लिए दावा दाख़िल किया। यह केस अभी तक अदालत में विचाराधीन स्थिति में ही पड़ा है। ज़िला अदालत में कुछ हासिल न होता देखकर सन् 2005 में वनविभाग के सताए इन वनटांगिया मज़दूरों ने उच्चतम न्यायालय में अपनी ज़मीनों के लिए लड़ने की तैयारी की व याचिका दायर की। इसी तरह से ज़िला हरिद्वार के टांगियागॉव हरिपुर, भगवतपुर, टीरा, हजारा, कालूवाला, रसूलपुर को भी वनविभाग द्वारा उत्पीड़न का शिकार बनाया गया। अधिकारियों ने एक साथ इन गॉवों में हमला बोला व गॉव वालों को अपने घरों को खाली कर ट्रकों में सामान भरने के लिए मजबूर कर दिया। इस कार्यवाही के जवाब में वहां की तमाम महिलाओं एवं पुरूषों ने पीएसी से जमकर मुकाबला किया और वहॉ से पुलिस को भागने के लिये मजबूर कर दिया। चॅूकि ये गॉव राजाजी नेशनल पार्क की सीमा के अन्दर आते हैं इसलिए वन्यजन्तु अधिनियम-1972 के तहत इन गॉवों को वहां रहने की इजाज़त तो नहीं थी, लेकिन अधिनियम यह भी कहता है कि ऐसे क्षेत्रों में जब तक यहां बसे ग्रामवासियों के रहने के लिए कोई अन्य वैकल्पिक व्यवस्था न हुई हो व इनके तमाम हक़-ओ-हक़ूक तय होकर न दिये गये तब तक इन गॉवों को वहॉ से हटाया नहीं जा सकता। लेकिन प्रशासन ने इस कानूनी जिम्मेदारी से अपना पल्ला आसानी से झाडते हुये इन टांगिया गॉवों को ज़बरन उजाडने़ की कोशिशें कीं ।  इस स्थिति से निपटने के लिए सन् 1986 में टांगियावासियों ने राजनैतिक दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सहारा लेकर उच्चतम न्यायालय में वन विभाग के ख़िलाफ मुक़दमा दायर किया । इस मुक़दमें में  इन गरीब टांगिया मज़दूरों का लाखों रुपया बरबाद हुआ। यह मुकदमा चार साल तक चला। सन् 1990 में उच्चतम न्यायालय द्वारा फैसला दिया गया जोकि मुख्यतः राज्य के ही हक़ में था। इसके बाद  भगवतपुर टांगिया को सन् 1986 में विस्थापित कर दिया गया ( इसी गांव को अभी सहारनपुर में वनाधिकार कानून के तहत राजस्व का दर्जा प्राप्त हुआ है)। विस्थापित किये गये इस गॉव की स्थिति तो और भी दयनीय थी । जिस ज़मीन पर उन्हें बसाया गया उस पर वन विभाग व राजस्व विभाग का झगड़ा है, जिसके चलते वहां पर पुनर्वास  के बावज़ूद बुनियादी सुविधाएॅ जैसे बिजली व पीने का पानी आदि तक मुहैया नहीं कराई गयी। अभी भी यहां 47 प्रतिशत लोग भूमिहीन हैं और बाकी 53 प्रतिशत को थोड़ी-थोड़ी ज़मीन का पट्टा दिया गया जिससे गुज़र हो पाना मुमकिन नहीं। दूसरा उन्हें वन विभाग द्वारा बख्शे गये नाममात्र के अधिकारों से भी पूर्ण रूप से वंचित कर दिया गया ।

उ.प्र. सरकार की पहल पर आयुक्त समाज कल्याण द्वारा टांगिया गॉवों को राजस्व का दर्जा दिये जाने सम्बंधी आदेश न सिर्फ गुमनामी और नाइंसाफी के अंधेरों में गुम हो चुके इन गॉवों को उम्मीद की किरण दिखाने वाला क़दम है, बल्कि देश के लगभग एक तिहायी ज़िलों में धधक रही प्रतिशोध की ज्वाला को कम करने के लिये अन्य राज्यों के वास्ते प्रेरणा बनने का काम भी कर  सकते हैं।

——- रोमा

 

Feature Image: Representational image of Adivasis filing land claims

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