Menu

Citizens for Justice and Peace

भारत में किसानों, कृषि श्रमिकों और वन श्रमिकों के अधिकार सामुदायिक संसाधन

11, Apr 2018 | CJP Team
#agrarian #communityresources #farmers

भारत की अर्थव्यवस्था हमेशा से देश भर में फैली नदियों के संजाल और उपजाऊ मिट्टी की प्रचुरता के कारण मुख्य रूप से कृषि प्रधान रही है. पंजाब में गेहूं के स्वर्णिम मैदानों से, गंगा और इसकी सहायक नदियों के बाढ़ के मैदानों में मक्का, बाजरा और दालों के जलोढ़ लहलहाते विशाल कृषि क्षेत्र तक, दार्जिलिंग के चाय बागानों और छत्तीसगढ़ के रसीले धान के खेतों, महाराष्ट्र के कपास और गन्ने और चिक्कमगलगु की अद्भुत कॉफी तक… भारतीय किसान एक विकासशील देश में बढ़ती आबादी के लिए बहुतायत में सब कुछ उपजाने की क्षमता रखता हैं.

लेकिन हमने किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या किया है? क्या हमने बने कानूनों पर अमल करने के लिए कुछ किया है या क्या हमने उन्हें उनकी अपनी ही युक्तियों पर छोड़ दिया है ताकि गरीबी, उदासीनता और अलगाव से लड़ें, जब तक वे फांसी के फंदे पर झूलने का फैसला न कर लें?

पारंपरिक भारतीय खेती – एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

अमेरिकी मध्य-पश्चिमी इलाकों में बड़े पैमाने पर होने वाली यन्त्र सज्जित खेती के विपरीत, भारतीय खेती हमेशा घनिष्ठ रूप से श्रम पर निर्भर रही है. परंपरागत रूप से भारतीय किसानों ने भार ढोने वाले जानवरों, जैविक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल के विपरीत  प्राकृतिक चयन पद्धतियों की गुणवत्ता वाले बीजों के उपयोग पर भरोसा किया है. आनुवंशिक रूप से संशोधित बीज और खाद्य पदार्थ एक जटिल बहस का मुद्दा है, जिसे अलग रूप से संबोधित करना भी आवश्यक है.

भारत में सामंतवाद – ज़मींदारी प्रणाली

ज़मींदारी जैसी सामंत प्रणाली ने ज़मीन के अधिकार को किसानों से छीन कर ज़मीनदारों को दे दिया, जिन्होंने बदले में अत्यधिक करों के बोझ से उन्हें लाद दिया. इन ज़मींदारों ने अपने स्वयं के खजाने को भरा और अंग्रेज़ उपनेशवादियों को एक हिस्सा दिया, जिन्होंने उन्हें अपने प्रति निष्ठा के बदले में संरक्षण दिया और ज़मीनदारों ने भारत को लूट कर उपनिवेशवादियों की संपत्ति में वृद्धि करने में मदद करने में खासी भूमिका निभाई. इससे ग्रामीण भारत में बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण हुआ, जिसमें भूमि के मालिक और समृद्ध किसान एक तरफ और छोटे, सीमांत किसान, किरायेदार और कृषि मजदूर दूसरे ओर आ खड़े हुए. उनके बीच की खाई न सिर्फ और बढ़ी और आज भी बढ़ती जा रही है.

1947 के बाद, यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ प्रयास किए गए कि भूमि का कुछ पुन: वितरण किया जाना चाहिए. यह सार्वभौमिक नहीं था और हमेशा कृषि मजदूर (जो वास्तव में ज़मीन को जोतते हैं या गरीबों में भी सबसे गरीब हैं) तक नहीं पहुंचा. ऑपरेशन बारगा को एक ऐसे राजनीतिक प्रयोग (बंगाल में सीपीआई-एम) के रूप में रखा गया है. लेकिन भूमि के पुन: वितरण का मुद्दा अधकचरा है. बड़े किसान बचाव के लिए कहते हैं कि भूमि का विखंडन आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है. हालांकि, अधिक लोगों के लिए अनुकूल समाधान सहकारी खेती हो सकती है, जो काफी दिनों से किसानों की विरोध आंदोलनों में स्पष्ट मांग थी.

अन्य भूमि स्वामित्व और कराधान प्रणाली और ऋण का जाल

1882 में, सर थॉमस मुनरो और कप्तान अलेक्जेंडर रीड ने रैय्यतवाड़ी व्यवस्था द्वारा खेत जोतने वाले किसान को ज़मीन पर किसानी का अधिकार देकर हालात को बदलने की कोशिश की. किसान करों का भुगतान सीधे अंग्रेजी उपनिवेशवादियों को करते थे, लेकिन उन्हें निजी उधारदाताओं से बड़े ऋण लेने की ज़रुरत पड़ती रहती थी, जो अक्सर भारी ब्याज दरों की मांग करते और कुछ इस तरह से हिसाब करते कि मूलधन चुका देने के बावजूद, कुछ रकम हमेशा बाकी रह जाती थी, और उस बचे ब्याज की रकम पर वे ब्याज चुकाते रहते थे.

उस ही समय के आसपास महलवाड़ी प्रणाली विकसित हुई, जहां गांव का मुखिया कर जमा करता था और अंग्रेज़ उपनिवेशवादियों को दे दिया करता था. जमीन का स्वामित्व तो किसान के पास ही था और करों का बँटवारा प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से की भूमि के अनुपात में था. लेकिन इससे किसान को ज्यादा मदद नहीं मिली क्योंकि वे पैसे उधार देने वालों से नहीं बच सकते थे, जो कि अत्यधिक ब्याज दरों की मांग करते थे, जिसके कारण किसान कर्ज दलदल से कभी उभर नहीं पाते थे.

बढ़ते कर्ज के कारण ही किसान आत्महत्या जैसे भयावह विकल्प चुनने पर मजबूर हो जाते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि निजी धन ऋणदाता या बैंक, एक ख़राब फसल, सूखा या बिन मौसम की बारिश या ओले, या शादी और चिकित्सा व्यय जैसी साधारण चीज़ों के कारण किसानों के वित्तीय स्वास्थ्य पर कहर बरपा हो रहा है.

नील पामर (सीआईएटी) द्वारा फ़ीचर छवि. कुल्लू शहर, हिमाचल प्रदेश के पास अपने सब्जी भूखंडों में काम करने वाले महिला किसान

अंग्रेजों के युग में भारतीय वन अधिनियम

अंग्रेजों ने पहले 1878 में और फिर 1927 में नए क़ानून पारित करके चुपचाप से सारी जंगल की भूमि को सरकारी संपत्ति में शामिल कर लिया था. उनका उद्देश्य लकड़ी के व्यापार और अन्य वन उपजों के व्यापार और उससे हुए लाभ को विनियमित करना था. इसने आदिवासियों और अन्य वन निवास समुदायों से वन भूमि के स्वामित्व को छीन लिया, जो अपनी आजीविका के लिए वन उत्पादों पर निर्भर थे. आप भारतीय वन अधिनियम, 1927 यहां पढ़ सकते हैं. इस कठोर कानून ने संपन्न भारतीय लकड़ी की बिक्री और तस्करी में शामिल वन विभाग और माफिया के बीच एक अपवित्र संबंध स्थापित कर दिए.

2006 के वन अधिकार अधिनियम, 1920 के शोषक भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों को नकार देता है. इससे वन निवास समुदायों को उन जमीनों के अधिकार के लिए आवेदन करने की अनुमति मिलती है जिन पर वे पीढ़ियों तक बसे रहे हैं. हालांकि, इस अधिनियम के प्रावधान अब तक पत्र और आत्मा में लागू नहीं किए गए हैं, कई आदिवासियों को 6 मार्च और 12 मार्च, 2018 के बीच किसान लम्बे मार्च में नासिक से मुंबई तक शामिल होने पर मजबूर कर दिया.

इसके अलावा, पर्यावरण और वन मंत्रालय के द्वारा 2018 के नए विन्यास नियमों को पारित किया गया जो एफआरए, 2006 के तहत जंगल निवासी और आदिवासी की के अधिकारों को छीनने के लिए बना है. सीजेपी भारतीय किसानों और वन श्रमिकों के साथ एकजुटता से खड़ा है. हम ऑल इंडिया यूनियन ऑफ फ़ॉरेस्ट वर्किंग पीपुल (एआईयूएफडब्ल्यूपी) के साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि राज्य के अधिकारियों द्वारा आदिवासियों और वन श्रमिकों के खिलाफ झूठे मामलों को खारिज किया जा सके जो उन्हें अपने देश में मिले अधिकारों को त्याग देने के लिए दबाव बना रहे हैं.

भूमि हो किसान की

यह सामंती और शोषक स्वामित्व और कराधान प्रणालियों के खिलाफ दुनिया भर में कृषि समुदायों के लिए युद्धघोष रहा है. दरअसल, भारत के संस्थापक पिता किसानों के महत्व को समझते हैं जिसके कारण लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में नए भारत के नारे के रूप में जय जवान जय किसान  को घोषित किया. स्वतंत्रता के बाद भूमि का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न भूमि सुधारों को लागू किया गया था.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23, 38 और 39 ने राज्यों को जमींदारी अधिनियमों के अपने उन्मूलन के साथ-साथ बंधुआ श्रम प्रथाओं को समाप्त कर दिया गया. राज्य लोगों के अधिक हित में भूमि और सामुदायिक संसाधन जैसे तालाबों, झीलों आदि को पुनर्वितरित कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, आप, 1963 के यूपी जमींदारी अधिनियम उन्मूलन को यहां पढ़ सकते हैं.

विभिन्न राज्यों द्वारा भूमि सीलिंग अधिनियम लागू किए गए थे ताकि जमीन की एक व्यक्ति द्वारा जमाखोरी को रोकी जा सके और भूमि संसाधनों का अधिक न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित किया जा सके. भूमिहीन और सीमांत किसानों को अतिरिक्त भूमि पुनर्वितरित की जानी थी. आप महाराष्ट्र कृषि भूमि सीलिंग अधिनियम, 1961 यहां पढ़ सकते हैं.

शुरुवात में भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 में अंग्रेजों द्वारा अधिनियमित किया गया था. हालांकि, इसमें कई कमी थी जैसे कि:

एकतरफा अधिग्रहण – 1894 अधिनियम के तहत, एक बार जब प्राधिकरण भूमि के किसी विशेष भाग को प्राप्त करने के इरादा करता है, वो उस भूमि पर कब्ज़ा कर सकता बावजूद इसके कि इसका प्रभाव उस वव्यक्ति पर क्या होगा जिसकी ज़मीन ली जा रही है.

कोई बचाव के साधन नहीं – 1894 अधिनियम के अनुसार एक कुशल अपीली तंत्र के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी. सुनवाई (धारा 5ए के तहत) द्वारा निर्धारित की गई थी, लेकिन सुनवाई का आयोजन करने वाले अधिकारियों द्वारा बोर्ड पर विचारों को रखने की आवश्यकता नहीं है.

पुनर्वास के लिए कोई उपाय नहीं – अधिग्रहण से विस्थापित लोगों के पुनःस्थापन और पुनर्वास से संबंधित 1894 के कानून में कोई प्रावधान नहीं हैं.

अति आवश्यक क्या है– यह अधिनियम का सबसे आलोचना योग्य धाराओं में से एक है. यह अधिनियम स्पष्ट नहीं करता है कि हासिल करने के लिए क्या जरूरी है, जिसके कारण फैसला अधिग्रहण अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया जाता है. परिणामवश तात्कालिक अधिग्रहण श्रेणी के अधीन आने वाले अधिकांश अधिग्रहण चुनौती देने के दायरे में नहीं आते है.

मुआवजे की कम दर– अधिग्रहीत भूमि के लिए भुगतान की जाने वाली दरें इस क्षेत्र में प्रचलित सर्किल दरें हैं जो पुराने होने के लिए कुख्यात हैं और इसलिए क्षेत्र में प्रचलित वास्तविक दरों से कहीं दूर तक सम्बंधित नहीं हो सकती हैं.

जैसे शीर्षक से ज़ाहिर होता है कि में भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 का प्राथमिक उद्देश्य भूमि अधिग्रहणथा और इसको मुहीम के तौर पर करना था. हालांकि, 2013 के अधिनियम को ‘भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनव्यर्वस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013  में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकारके रूप में शीर्षक दिया गया है, जो अधिनियम के दायरे में आने वालों को उचित मुआवजा प्रदान करता है और उन प्रभावित लोगों के पुनर्वास, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में उनकी भलाई और पूर्ण पारदर्शिता के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों का विस्तार करता है.

दोनों भूमि सीलिंग अधिनियमों का एक महत्वपूर्ण मूल्यांकन यहां पढ़ा जा सकता है.

*** फीचर छवि सौजन्य अमीर रिज़वी

 

और पढ़िए –

आदिवासियों और वनवासियों के साथ फिर हुआ धोखा

भगतसिंह के शहादत दिवस पर AIUFWP की वनाधिकार रैली

 

 

Leave a Reply

Go to Top