Menu

Citizens for Justice and Peace

FRA, 2006 के तहत ऐसे जताई जाती है जमीन पर दावेदारी वनाधिकार कानून 2006 के तहत वन भूमि पर व्यक्तिगत या सामूहिक अधिकार की दावेदारी एक जटिल प्रक्रिया है

26, Sep 2019

इस प्रस्तुति में हमने उन चीजों को तलाशा है, जिनकी वन भूमि पर रहने वाले लोगों को अपनी जमीन पर हक की दावेदारी के दौरान जरूरत होती है. हमने यह पता करने की कोशिश की है कि वनाधिकार कानून 2006 के तहत अपनी जमीन पर दावे के लिए किन चीजों की जरूरत पड़ती है? क्या यह सिर्फ कागज जमा करने की खानापूर्ति है. आखिर इस क्रिया में क्याक्या करना शामिल है? सोनभद्र की यात्रा के दौरान में हमने यही पता करने की कोशिश की.

साल 1995 की एक रात. जबरदस्त बारिश हो रही थी. इसी भरी बारिश के मौसम में सोनभद्र के बसौली गांव के रामखेलावन प्रजापति का कच्चा घर वन विभाग ने ढहा दिया. उसके खेती के औजार, बरतन, कपड़े और कंबल से लेकर घर का सब सामान एक कुएं में फेंक दिया गया. पूरा परिवार बेघर हो गया. रात बिताने के लिए कोई जगह नहीं बची. इस घटना के बाद उसकी पत्नी और पोती चल बसी. बारिश में भीगने की वजह से दोनों गंभीर रूप से बीमार हो गई थीं. राम खेलावन की उम्र अस्सी साल की है. दिखाई न देने की वजह से अब उन्होंने काला चश्मा पहन लिया है. अब सिर्फ उस ओर इशारा कर देते है, जहां 35 साल पहले उनका घर था. इसके बाद मार्च 2018 में उन्होंने सामुदायिक वनाधिकार का दावा पेश किया था. उनके साथ कुछ अन्य लोगों ने भी अपना दावा पेश किया था. अब वे सारे फैसले का इंतजार कर रहे हैं.

आदिवासी और वन निवासी समुदायों को उनके जीवन और जीविका से जुड़े अधिकार दिलाना CJP के चार कार्यक्षेत्रों का हिस्सा है. 2017 से ऑल इंडिया यूनियन फॉर फॉरेस्ट वर्किंग पीपुल्स- AIUFWP के साथ मिल कर, हम अदालत के भीतर और बाहर न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण रूप से संघर्ष कर रहे हैं. CJP जनजातीय नेताओं के विरुद्ध दुर्भावनापूर्वक थोपे गए मुकदमों के खिलाफ भी लड़ रही है. कृपया आर्थिक सहयोग देकर इस अभियान में हमारी सहायता करें.

भारत के जंगलों में लगभग साढ़े दस करोड़ आदिवासी और दूसरी जनजातियां रहती हैं. दोनों का एक दूसरे के साथ अटूट संबंध है. हालांकि जंगलों से आदिवासियों और दूसरी जनजातियों को उजाड़ने का मामला दशकों से विमर्श के केंद्र में रहा है. अतिक्रमणकारी (Encroacher)  जैसे शब्द शहर केंद्रित अंग्रेजी मीडिया की ओर से ईजाद किए गए. जंगलों के लेकर बड़ी कंपनियों और विकास परियोजनाओं के अपने हित रहे हैं. खास कर वन भूमि और उनमें छिपे खनिजों को लेकर.

दशकों के संघर्ष के बाद 2006 में वनवासियों के कई आंदोलन हिंसक हो उठे. राज्यों की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली ताकत के खिलाफ आदिवासियों के विरोध के दौरान कई जनजातीय समुदाय के लोगों और वनवासियों को जान गंवानी पड़ी. आखिरकार सरकार को Scheduled Tribes and Other Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 लाना पड़ा. संविधान बनने के 56 साल बाद आखिर जनजातियों के वनाधिकार को मान्यता मिली. इस कानून में जनजातीय लोगों और वनवासियों के खिलाफ ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को स्वीकार किया गया. इस कानून के तहत जंगल की जमीन पर जनजातीय समुदायों के स्वाभाविक हक को मान्यता मिली.

वनाधिकार कानून, 2006 के मुताबिक संबंधित ग्राम परिषद से इजाजत के बगैर वनवासियों की भूमि का इस्तेमाल करने का अधिकार किसी को नहीं है. सरकार भी ग्राम परिषद की इजाजत के बगैर इसमें कोई गतिविधि नहीं कर सकती.

इस कानून के तहत जमीन पर मालिकाना, खेती और इसमें लगने वाले संसाधन पर उनका व्यक्तिगत हक है. जबकि जंगलों पर सामुदायिक हक के तहत भूमिहीन लोगों समेत सभी ग्रामीणों को छोटे वनोपज हासिल करने, उन्हें इस्तेमाल करने और बेचने का अधिकार है. साथ ही उनकी खेती की जमीन के पारंपरिक दायरे में उन्हें जंगल के संसाधनों के इस्तेमाल का भी अधिकार है.

जनजातीय कार्य मंत्रालय के डेटा के मुताबिक 2006 के वनाधिकार कानून के आने के 11 साल बाद तक 57 लाख जंगल की जमीनों के 18 लाख पट्टे दिए जा चुके हैं. यह आंकड़ा अक्टूबर 2017 तक का है. यह जंगल की जमीन का सिर्फ 14 फीसदी हिस्सा है, जिस पर वनवासी अपने अधिकार का दावा कर सकते हैं. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक दशक में जनजातीय समुदाय के लोगों ने वनाधिकार कानून के तहत जमीन पर अपने अधिकार के लिए पूरे देश में 42 लाख से अधिक दावे किए हैं. लेकिन इसमें सिर्फ 40 फीसदी यानी 17 लाख से कुछ अधिक दावे ही मंजूर किए गए हैं. उत्तर प्रदेश में 79 फीसदी दावे खारिज हो चुके हैं. यह पूरे देश में सबसे अधिक है. इसके बाद पश्चिम बंगाल में 67 और महाराष्ट्र में 63 फीसदी दावे खारिज हुए हैं. मध्य प्रदेश में 59 फीसदी दावे खारिज हुए हैं.

वनाधिकारों को लागू करने में जनजातीय कार्य मंत्रालय के प्रदर्शन, इच्छाशक्ति और प्रयास की पूरी देश के विशेषज्ञों ने आलोचना की है. भुवनेश्वर स्थित नॉन प्रॉफिट संस्था वसुंधरा के गिरि राव के मुताबिक सिर्फ 7,504.32 वर्ग किलोमीटर जंगल की जमीन को मान्यता मिली है. जबकि 2005 से पहले तक 1.12 लाख वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा था. इस साल अगस्त तक सिर्फ सिर्फ 6.67 फीसदी वन भूमि को ही मान्यता मिली थी. सिर्फ चिट्ठियां जारी करना छोड़ कर जनजातीय मंत्रालय वनाधिकार कानून को लागू कराने की अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा है.

AIUFWP की डिप्टी सेक्रेट्री रोमा मलिक ने हाल में CJP को एक इंटरव्यू में बताया, “जब से जंगल की जमीन पर दावे का सवाल पैदा हुआ है तब से यह कानून ही लागू नहीं किया जा रहा है. जहां पैसे का सवाल होता है, वहां पैसे देने से सरकार को अच्छा प्रचार मिल जाता है. इसमें ठेकेदारों को फायदा होता है. लेकिन यह गांव वालों को उनके सामुदायिक अधिकार के तहत उन्हें जमीन देने का मामला है. आपको ग्राम सभा की जमीन की प्रबंधन भी ग्राम सभाओं को ही सौंपना पड़ता है. इसलिए वनवासियों को उनकी जमीन सौंपने का मामला इतनी बड़ी समस्या बन गया है.”

लेकिन सवाल यह है कि जमीन पर दावेदारी के लिए क्या चाहिए? क्या यह सिर्फ कुछ कागजात जमा करने या कागजी कार्यवाही पूरा करने का मामला है. आखिर इस प्रक्रिया में क्या करना पड़ता है? हमने सोनभद्र की एक फील्ड ट्रिप में इस सवाल के जवाब ढूंढे. हमारी इस पड़ताल से जो जमीन पर दावे की प्रक्रिया की जो तस्वीर उभरी वह कुछ इस तरह है.

जमीन का दावा पेश करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों का अनुबंध

 

वनाधिकार समिति द्वारा ग्राम सभा को दिया जाने वाला प्रपत्र

 

वनाधिकार के तहत इस्तेमाल की जाने वाली चीजों का स्वरूप (इनमें घर बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले सामान, खाने बनाने की जरूरत के सामान और जलाशय जैसे साझा संसाधन शामिल हैं)

 

ग्रामीणों ने अपने रहने वाली जगहों, जोत की जमीन और पहाड़, पहाड़ियों से घिरे अपने गांव का पहले एक विस्तृत नक्शा बनाते हैं. वे दरअसल वे इन चीजों का नक्शा तैयार करते हैं जिनसे उनकी जमीन घिरी होती है. गांव का एक दल नक्शा बनाता है. यह एक कठिन काम है और गांव वालों को इस तरह का नक्शा बनाने में महीनों लग जाते हैं.

धूमाँ  गाँव का नक्षा

जोरुखद गाँव का नक्षा

 


ग्रामीण परिवार सभी सदस्यों के चित्रों और अंगूठे के हस्ताक्षर से भरे 75 साल पुराने परिवार वृक्ष का रजिस्टर तैयार करते हैं

हर मौसम की वन सम्पदा की सूचि

(वन सम्पदा पर हमारी विस्तृत रिपोर्ट यहाँ पढ़िए):

1973-74 और 1982-83 के बीच वन प्रभाग द्वारा तैयार की गई विपणन योग्य वस्तुओं और वन उपज की जानकरी देने वाली कार्य योजना

 

गजेटियर की एक प्रति (औपनिवेशिक युग से)

यह केंद्रीय रूप से एकत्र किया जाना है और इसमें तार्किक मुद्दे और खर्च शामिल हैं.

आमिर हसन की लिखी किताब Tribal Administration in India का एक खंड जनजातीय लोगों के क्षेत्रों, प्रशासन, आजादी के पहले की उनकी स्थिति, जनजातीय विकास और प्रशासन के संवैधानिक प्रावधान, भू राजस्व प्रशासन, वन प्रशासन बनाम आदिवासी प्रशासन, गैर अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जनजातियों के बारे में विस्तार से बताता है.

रोमा ने इस बात को रेखांकित किया है कि जंगलों में रहने वाले लोगों के लिए इन दस्तावेजों को हासिल करना कितना कठिन काम है. इसके अलावा उनसे इन बातों को जानने की अपेक्षा की जाती है. वह कहती हैं, ‘’जमीन के लिए दावे करने में सरकार से कोई सहायता नहीं मिलती. यह उन लोगों पर पूरी तरह छोड़ दिया जाता है, जिन्हें अपनी जमीन के लिए दावा करना है. उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वह दावे दाखिल करने की प्रक्रिया के बारे में खुद जानें. जमीन के दावे लिए जो जरूरी दस्तावेज होते हैं, उन्हें हासिल करने के लिए मदद की जरूरत होती है. मसलन, वन विभाग के काम करने की अपनी योजना होती है.’’ औपनिवेशिक वक्त से ही वन प्रबंधन की उनकी अपनी योजना होती थी. इनका दस्तावेजीकरण हो चुका है. जंगलों की जड़ी-बूटियों, पेड़-पौधों और लोगों के अधिकारों का भी दस्तावेजीकरण हुआ है. उस समय लोगों के क्या अधिकार थे? पशुओं को लेकर क्या अधिकार थे. खेतों या कृषि भूमि को लेकर उनके क्या अधिकार थे?

उस वक्त अंग्रेजों के पास इस तरह के भू मानचित्र थे. इन दस्तावेजों को लगाना जरूरी है. इसके बाद गजेटियर की बारी आती है. कानून में प्रावधान है कि आपको तीन पीढ़ियों के दस्तावेज जमा करने हैं. ग्राम  सभाओं की आबादी मिश्रित होती है. कई जगह आदिवासी जनजातीय समुदायों के तहत वर्गीकृत हैं. कई जगह उन्हें इस समुदाय के तहत नहीं रखा गया है. इसलिए उनकी गणना OTFD यानी Other Forest Dwellers (अन्य वनवासी) में होती है. एक दूसरी तरह की गलत अवधारणा भी फैलाई गई है. वह यह कि जंगल में अपनी जमीन के दावे के लिए 75 साल पुराना दस्तावेज जमा कराना होगा. लेकिन वनाधिकार कानून में कहीं इसका जिक्र नहीं है. वनाधिकार कानून में तीन पीढ़ियों की बात की गई है और यह वक्त 25 से 30 साल तक का भी हो सकता है. इसलिए गजेटियर अटैच करना जरूरी है. यही वजह है कि हमने गजेटियर जमा कर यहां अटैच किए हैं.

 

और पढ़िए –

जल, जंगल और ज़मीन के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष

सोनभद्र में आदिवासी संघर्ष की भारी जीत : सुकालो गोंड को मिली बेल

किस्मतिया और सुखदेव आए घर, सुकालो भी जल्द होंगी रिहा

आदिवासियों और वनवासियों के साथ फिर हुआ धोखा

सोनभद्र की बेटी सुकालो

भारत में किसानों, कृषि श्रमिकों और वन श्रमिकों के अधिकार

घातक हमला झेलने के बाद मेरा डर भी ख़त्म हो गया – निवादा राणा

 

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Sign up for petition
Go to Top