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अपने सिद्धांतों पर समझौता करने से पहले, मरना पसंद करूंगा: चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ मानवाधिकार रक्षक की रूपरेखा

04, May 2018 | Mansi Mehta and Sushmita

चंद्रशेखर आज़ाद एक जुझारू दलित युवा नेता हैं, जिन्हें जून 2017 से अवैध तरीके से जेल की सलाखों के पीछे बंदी बना कर रखा गया है. उन्होंने सामाजिक परिवेश में हिन्दुओं की ऊँची जाति के भगवान से डरने वालों को पुरस्कृत करती प्रथा के खिलाफ जाकर ‘रावण’ के उपनाम को धारण किया. पिछले कुछ सालों में उन्होंने न केवल अपने आकर्षक व्यक्तित्व के कारण, बल्कि शिक्षा के माध्यम से दलित समुदाय को सशक्त बनाने की अपनी प्रतिबद्धता द्वारा भी, दलित अधिकारों के आंदोलन को बल दिया है. पेश है चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ की कहानी:

प्रारंभिक जीवन

आज़ाद का जन्म 1986 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के छुतमलपुर के पास ढडकुली गांव में हुआ था. उन्होंने स्थानीय जिला कॉलेज से अपनी कानून की डिग्री पूरी की. चंद्रशेखर आज़ाद को पहली बार 2015 में परेशानी का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने अपनी संपत्ति पर एक बोर्ड लगवाया जिसपर लिखा था ‘द ग्रेट चमार्स ऑफ ढडकुली आपका हार्दिक अभिनन्दन करता है , जिसके कारण दलितों और ठाकुर के बीच तनाव पैदा हो गया. उन्होंने इस घटना के तुरंत बाद भीम सेना का गठन शुरू किया और उसके बैनर के तहत कई युवा दलितों को संगठित किया. शिक्षा के माध्यम से दलितों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से भीम सेना की स्थापना आज़ाद ने 2015 में की थी.

घडकौली गाँव में चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा स्थापित विवादास्पद बोर्ड. छवि सौजन्य – भीम आर्मी

सामाजिक न्याय के लिए आज़ाद की  प्रतिबद्धता की कहानी की शुरुआत उनके पिता, जो एक स्कूल मास्टर थे, पर हुए अन्याय से  शुरू होती है, जिन्हें अपने खाने पीने के बर्तन की व्यवस्था खुद अलग से करने के लिए आदेश दिया गया था. चंद्रशेखर दलितों के खिलाफ हो रहे भेदभाव पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि स्थानीय एएचपी इन्टर-कॉलेज में अक्सर दलित छात्रों को हिंसा का सामना करना पड़ता है, चाहे वो बेंच साफ़ करने का बहाना हो या पानी पी लेने का. “हमें एहसास हुआ कि इस तरह के जातीय दमन से लड़ने के लिए संगठित होना ज़रूरी है,” चंद्रशेखर अपने प्रेरणा के स्रोत के विषय में बताते हैं. भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, विनय रतन सिंह भीम आर्मी जैसे संगठन के औचित्य को स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि ऐसे संगठन की ज़रुरत सिर्फ जातीय दमन से लड़ने के नहीं बल्कि पाठशाला शुरू करने के लिए ज्यादा है, जहाँ बड़े बच्चे और छोटे बच्चों को सरकारी स्कूलों की कमी की आपूर्ति करने के लिए पढ़ाते हैं. सहारनपुर के फतेहपुर भादो  में ऐसी पहली पाठशाला की स्थापना 2015 में की गई और गुज़रते सालों में इनकी गिनती बढ़ती गयी. मई 2017 तक यह गिनती 350 स्कूलों तक जा पहुंची. न सिर्फ सहारनपुर में बल्कि पास के जिलों में भी जैसे – मेरठ, मुज्ज़फरनगर और शामली.

सहारनपुर में हिंसा

मई 5, 2017, को शब्बीरपुर और रामपुर गाँव में दलित समुदाय के खिलाफ हिंसा तब फूटी, जब उन्होंने महाराणा प्रताप के जन्मतिथि के अवसर पर ठाकुरों द्वारा निकाली जाने वाली शोभा यात्रा का विरोध किया. दलितों का यह कहना था कि यह यात्रा निकालने की इजाज़त नहीं ली गयी थी. इस घटना में दलितों के 60 घर आग के हवाले कर दिए गए. मई 9, 2017 को भीड़ का गुस्सा तब फूटा जब शब्बीरपुर गाँव में पुलिस ने भीम सेना के नेतृत्व में गाँधी मैदान में शांतिपूर्वक धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया. इस हमले में कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए. लाठी चार्ज के पश्चात, भीड़ द्वारा की गयी हिंसा निंदनीय है, मगर यह भी बताना ज़रूरी है कि इस हिंसा में ना तो किसी की जान गयी ना कोई गंभीर रूप से घायल हुआ.

21 मई, 2017 को, हज़ारों भीम सेना कार्यकर्ता दिल्ली के जंतर मंतर में इकट्ठे हुए, जहां चंद्रशेखर ने उत्साहजनक भाषण दिया. पूरा भाषण यहां देखा जा सकता है:

गैरकानूनी गिरफ्तारी और लंबे समय तक हिरासत

चंद्रशेखर को 9 जून, 2017 को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. कई आपराधिक मामलों के अलावा, जो उनके ऊपर अन्यायपूर्ण रूप से लगाये गए थे, अन्य मामलों में उन्हें जमानत मिलने के एक दिन बाद, नवंबर 2017 के बाद से क्रूर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) भी उन पर जड़ दिया गया था. 23 जनवरी, 2018 को पारित एक चौंकाने वाले  आदेश के माध्यम से, उत्तर प्रदेश सरकार ने उक्त अधिनियम की धारा 12(1) के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए)की अवधि और बढ़ा दी. 2 मई 2017 से 6 माह के लिए उनकी हिरासत की अवधि बढ़ा दी गई है जिसका अर्थ है कि उन्हें मई 2018 तक हिरासत में रखा जाएगा. आदेश के अनुसार ‘बोर्ड पर सभी सबूतों पर विचार के बाद’ और सलाहकार बोर्ड (हिरासत) की सलाह पर नजरबंदी की अवधि को वैकल्पिक रूप से विस्तारित किया जा रहा है.इस तथ्य के बावजूद कि उन्हें 27 आपराधिक मामलों में जमानत मिल चुकी है और जल्द ही वे रिहा होने वाले थे.

चंद्रशेखर आज़ाद जेल में अबतक 9 महीने काट चुके हैं और उनके जीवन पर घना खतरा मंडरा रहा है. यह पूरी तरह से अविश्वसनीय लगता है कि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देखा जा रहा है, वास्तव में वह चेतना बढ़ाने और शिक्षा सुलभ बनाकर दलित समुदाय को सशक्त बनाने का अनुकरणीय काम कर रहा थे. दरअसल, भीम सेना का उदय दलित सम्मेलन की पाठ्य पुस्तक में एक नया अध्याय है और भारत के दलित आंदोलन की धारा को नयी दिशा देने की संभावना है. “सहारनपुर में विकास और जंतर मंतर में हजारों दलितों की सभा सभी राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी है” के राजू, कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के मुखिया, ने यह स्वीकार करते हुए कहा था कि पार्टी दलित समर्थन हासिल करने में सफल नहीं रही है. चंद्रशेखर की गिरफ्तारी ने मुसलमानों को भी जबरदस्त झटका दिया है; चंद्रशेखर ने स्वयं चलचित्र अभियान में वक्तव्य दिया कि मुसलमान इस देश के लिए खतरा नहीं हैं, ब्राह्मणवाद है. भाषण यहां देखा जा सकता है:

CJP, जनवरी 2018 से चंद्रशेखर की रिहाई के लिए अभियान में सक्रिय रूप से जुटी हुई है. CJP द्वारा चलाई गयी एक ऑनलाइन याचिका में भारी संख्या में हस्ताक्षर (6,800 प्लस)प्राप्त हुए हैं, जो दिल को छूनेवाली टिप्पणियों के साथ गूंजते हैं – शब्द और भावना में- आज चंद्रशेखर ने लाखों भारतीयों के दिलों में एक ऊँचा मक़ाम हासिल कर लिया है. सबको साथ आकर चंद्रशेखर की रिहाई की गूँज को और मजबूती देनी चाहिए. आप भी अपना समर्थन दिखा सकते हैं और चंद्रशेखर आज़ाद रावण की आज़ादी के लिए बनी हमारी याचिका पर हस्ताक्षर कर सकते हैं! बस यहां क्लिक करें-

 

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2 Comments

  1. कितना अच्छा होता,कि दलित समाज के सम्पन लोग स्कुल-काॅलेज,अस्पताल खोलते और ,गरीब स्वर्णो के बच्चो को उस प्राइवेट सेवा देते।

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