भला एक 8 साल का बच्चा ‘संदिग्ध वोटर’ कैसे हो सकता है ? असम की बॉर्डर पुलिस ने बालक को पूछताछ के लिए बुलाया!

02, Aug 2018 | Zamser Ali

मोनुवर हुसैन, एक 8 साल का मेधावी छात्र है जो अभी दूसरी कक्षा में है और पढ़ना-लिखना, गिनती करना, यहाँ तक की सरल जोड़ना घटाना भी जानता है. मगर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि असम का राज्य तंत्र मोनुवर को ‘विभाजन’ सिखाने में तुला हुआ है. जुलाई 2018 में मोनुवर का नाम डी-वोटर यानी ‘संदिग्ध वोटरों’ की सूची में पाया गया! जबकि अगले दस साल तक, याने १८ वर्ष की आयु होने से पहले, वह वोट डालने के योग्य भी नहीं होगा!

19 जुलाई को जब मनुवर को होजई जिले में पुलिस के सामने पेश होने को कहा गया तो उसके पिता बाबर अली को ज़बरदस्त झटका लगा. बाबर नियमित रूप से वोट करते आए हैं और उनके पास सारे रिकॉर्ड मौजूद हैं जिनसे यह साफ़ साफ ज़ाहिर होता है कि उनका परिवार अपने क्षेत्र में भारत के स्वतंन्त्र होने के पहले से रह रहा है। यहां तक की बाबर के पिता और मोनुवर के दादा मोनिर उद्दीन का नाम 1951 एनआरसी की सूची में नागांव जिले के बरबाली गाँव के निवासी के रूप शामिल था।

मोनुवर हुसैन का जन्म प्रमाण पत्र जिसमें उसके परिजनों का नाम मौजूद है

 मनुवर हुसैन की माँ आरिफा बेगम का ग्राम पंचायत सर्टिफिकेट जिसमें शादी के बाद उनके पिता के घर से उनके पति के घर चले जाने की जानकारी है

मोनुवर हुसैन के दादा मोनिर उद्दीन के नाम 1971 की वोटर लिस्ट में

 

जब एक छोटे बच्चे को पुलिस द्वारा समन जारी करने की बात बाहर आई तो व्यापक रूप से इसका विरोध किया गया। संयोग से असम अल्पसंख्यक छात्र संघ (AAMSU) के अध्यक्ष रेज़ौल करीम सरकार भी उसी दिन होजई में मौजूद थे जिन्होंने मामले की जानकारी मिलते ही हस्तक्षेप किया, जिसके बाद जिला प्रशासन ने इसे महज़ दफ्तर द्वारा हुई लिपिक त्रुटि बता दिया.

 

मगर मोनुवर एकलौता नहीं है जिसको डी-वोटर नोटिस मिला।  इसी से मिलता जुलता एक और मामला सामने आया जब 9 और 3 साल के बच्चे के साथ-साथ उनके 72 साल के दादाजी को भी डी-वोटर नोटिस दे दिया गया।  बिवानाथ जिले के बकरापट्टा गाँव में रहने वाले लाल मियां साल 1966 से नियमित मतदाता रहे हैं और उनके पास साल 1930 के भी पहले के दस्तावेज़ मौजूद हैं.

वहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि सीमा पुलिस द्वारा हज़ारों बच्चों को ऐसे नोटिस जारी किये गए और कईयों को तो पूछताछ के लिए भी बुलाया गया. हालांकि, इससे होनी वाली शर्मिंदगी और सार्वजनिक रोष से बचने के लिए इसे प्रशासन ने पूर्ण रूप से गोपनीय रखा. लोगों को इस बात का डर है कि डी-वोटरों की संख्या के आधार पर कहीं उनके नामों को भी NRC सूची से बाहर न कर दिया जाय।

अप्रैल, 2018 में असम विधानसभा द्वारा प्रस्तुत की गई पिछली रिपोर्ट के अनुसार असम में 1.48 लाख डी-वोटरों और लगभग 92,000 घोषित विदेशी हैं। साल 2016 में भाजपा के सत्ता में आने से पहले राज्य में 1.18 लाख डी-वोटर थे। इसका मतलब इन दो सालों में अचानक 30,000 लोगों की वृद्धि हो गई! दिलचस्प बात ये है कि विदेशी अधिकरण (FT) के अनुसार आज असम में 1.99 लाख डी-वोटर हैं जो 81,000 तक की वृद्धि दर्शाते हैं।

NRC के अद्यतन के लिए तय की गई विधियों के अनुसार, सभी डी-वोटरों और घोषित विदेशियों को NRC से बाहर रखा जाएगा। अगर वे कानूनी प्रक्रिया को पूरी करने के बाद भारतीय नागरिक साबित हो जाते हैं, तो ही उनका नाम NRC में दर्ज कर लिया जाएगा। मगर राज्य समन्वयक ने 2 मई को साल 2017 में आए गुवाहाटी उच्च न्यायलय ने यह आदेश पारित किया कि घोषित विदेशियों के सभी भाई-बहन को भी NRC की सूची से निकाल दिया जायेगा।

इस आदेश के बाद असम के सीमा पुलिस विभाग ने कथित तौर पर हजारों नए मामलों को विदेशी अधिकरण में संदर्भित करके डी-वोटरों की संख्या में बहुत वृद्धि कर डाली। कई लोग इस बात को लेकर हैरान थे कि यह सचमुच इसलिए किया गया ताकि बड़ी संख्या में लोग जानबूझकर NRC से बेदखल कर दिए जाएं। बड़े पैमाने पर लोगों में भय और घबराहट की स्थिति पैदा हो गई है जिसके परिणामस्वरुप लोगों ने राज्य द्वारा दिए गए सभी आश्वासनों को एक भेदभाव फैलाने वाला प्रोपेगेंडा समझकर खारिज कर दिया।

 

अनुवाद सौजन्य – मनुकृति तिवारी

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