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Migrants

পরিযায়ী শ্রমিকদের ভোট দেওয়ার অধিকার: সিজেপির অভিযান ECI এর কাছে ডাক ভোটপত্রের দাবি রেখে স্মারকলিপিতে স্বাক্ষর

কোবিদ ১৯ এবং লকডাউনের মাঝে বহু পরিযায়ী শ্রমিক নিজ নিজ গ্রামে ফিরে গেছেন।  বহু অনেক কষ্টে নিজের বাড়ি পৌঁছেছেন আর বহু কাজকর্ম হারিয়ে এখন চাকরিবিহীন। রাজ্য বিধানসভা ভোট এবং সংসদীয় উপ নির্বাচনের প্রক্রিয়া শুরু হতে চলেছে আর কয়েক মাসের মধ্যে।  এর মধ্যে, এরকম বহু শ্রমিকের এই পুরো প্রক্রিয়া থেকে বাদ পরে যাওয়ার একটা সম্ভাবনা রয়েছে।…

मायग्रंट लाइव्हज मॅटर: निवडणूक आयोगाला खुले पत्र भारताचे लक्ष पहिल्यांदाच “स्थलांतरित मजूर” या वर्गाकडे गेले आहे

सामान्य माणसावर अपार निष्ठा ठेवून आणि लोकशाही राज्याच्या अंतिम यशाने आणि प्रौढ मताधिकारावर आधारित लोकशाही सरकारची स्थापना केल्याने प्रबोधन होऊन सामान्य माणसाचे कल्याण, जीवनमान, सुखसोई आणि चांगले आयुष्य यांना चालना मिळेल अशा पूर्ण विश्वासाने संविधान सभेने प्रौढ मताधिकाराचे तत्त्व स्वीकारले आहे.” – अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर अमेरिकन संघराज्याने सार्वत्रिक प्रौढ मताधिकार टप्प्याटप्प्याने दिलेला असताना, भारताने मात्र…

मायग्रंट डायरीज: लक्ष्मण प्रसाद झारखंड के लक्ष्मण प्रसाद कहते हैं, “गांव पहुंच कर मैं बहुत खुश हूं, खाने के लिए अब लाइन में नहीं लगना पड़ेगा.”

43 साल के लक्ष्मण प्रसाद मुंबई में रहते हुए 27 साल हो चुके हैं. इतने वर्षों से वे यहीं रोजी-रोटी कमा रहे हैं. वैसे तो वे इस महानगर में कई जगहों पर रह चुके हैं, लेकिन पिछले 15 साल से अपने परिवार के साथ सांताक्रुज के कलीना इलाके में रह रहे हैं. प्रसाद पहले किराए…

मायग्रंट डायरीज: मुन्ना शेख लॉकडाउन के दौरान ट्रेन से 62 घंटे में मुंबई से कटिहार पहुंचे प्रवासी कामगार ने कहा, "उम्मीद है बिहार सरकार कुछ पैसा और राशन दे ताकि हम जिंदा रह सकें."

27 साल के मुन्ना शेख, बांद्रा में शास्त्री नगर इलाके में 15 लोगों के साथ रहते थे. बांद्रा का यह इलाका कम कमाई वाले लोगों की रिहाइश है. यहां देश के तमाम राज्यों के हजारों प्रवासी कामगार रहते हैं. मुन्ना शेख को रोजगार की तलाश में 15 साल पहले बिहार से मुंबई आना पड़ा था.…

Migrant Diaries: Atiur Rehman “Not a penny in my pocket for three months, not a grain in my belly for three days before CJP helped me,” recalls a migrant worker from West Bengal

The Covid-19 pandemic could have been an opportunity for all of us as a society to showcase our most compassionate and humane side. But many employers and middle-men took this opportunity to further exploit their labourers, especially impoverished and often unlettered migrants, and push them to the brink of starvation. This is the story of…

मायग्रंट डायरीज : गणेश यादव “एक बार मुंबई रहने लायक सुरक्षित हो जाए, तो मैं फिर इसकी ओर रुख करूंगा,” कहते हैं मधुबनी जिले के रसोइए जिनको बिहार में कोई आर्थिक भविष्य नहीं दिखता

मुंबई में रसोइए का काम करने वाले पैंतीस साल के गणेश यादव अपने फ़न में माहिर हैं. खाना बनाने में उनका कोई सानी नहीं. अपने काम में उन्हें बड़ा आनंद आता है. तीन बच्चों के पिता गणेश एक विनम्र व्यक्ति हैं. वह कहते हैं, “मेरे पास यही एकमात्र हुनर है. लेकिन इसी की बदौलत मैं…

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