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CJP campaigns for migrant workers’ Right to Vote Signs memorandum to ECI demanding postal ballots for migrant workers

The Covid-19 pandemic and the subsequent national lockdown forced lakhs of migrant workers to head back to their native villages. While many workers took long journeys to get back home after being virtually rendered unemployed and homeless, many others just wanted to be in the relative safety of rural India with their families, even as…

मायग्रंट डायरीज: लक्ष्मण प्रसाद झारखंड के लक्ष्मण प्रसाद कहते हैं, “गांव पहुंच कर मैं बहुत खुश हूं, खाने के लिए अब लाइन में नहीं लगना पड़ेगा.”

43 साल के लक्ष्मण प्रसाद मुंबई में रहते हुए 27 साल हो चुके हैं. इतने वर्षों से वे यहीं रोजी-रोटी कमा रहे हैं. वैसे तो वे इस महानगर में कई जगहों पर रह चुके हैं, लेकिन पिछले 15 साल से अपने परिवार के साथ सांताक्रुज के कलीना इलाके में रह रहे हैं. प्रसाद पहले किराए…

मायग्रंट डायरीज: मुन्ना शेख लॉकडाउन के दौरान ट्रेन से 62 घंटे में मुंबई से कटिहार पहुंचे प्रवासी कामगार ने कहा, "उम्मीद है बिहार सरकार कुछ पैसा और राशन दे ताकि हम जिंदा रह सकें."

27 साल के मुन्ना शेख, बांद्रा में शास्त्री नगर इलाके में 15 लोगों के साथ रहते थे. बांद्रा का यह इलाका कम कमाई वाले लोगों की रिहाइश है. यहां देश के तमाम राज्यों के हजारों प्रवासी कामगार रहते हैं. मुन्ना शेख को रोजगार की तलाश में 15 साल पहले बिहार से मुंबई आना पड़ा था.…

Migrant Diaries: Atiur Rehman “Not a penny in my pocket for three months, not a grain in my belly for three days before CJP helped me,” recalls a migrant worker from West Bengal

The Covid-19 pandemic could have been an opportunity for all of us as a society to showcase our most compassionate and humane side. But many employers and middle-men took this opportunity to further exploit their labourers, especially impoverished and often unlettered migrants, and push them to the brink of starvation. This is the story of…

मायग्रंट डायरीज : गणेश यादव “एक बार मुंबई रहने लायक सुरक्षित हो जाए, तो मैं फिर इसकी ओर रुख करूंगा,” कहते हैं मधुबनी जिले के रसोइए जिनको बिहार में कोई आर्थिक भविष्य नहीं दिखता

मुंबई में रसोइए का काम करने वाले पैंतीस साल के गणेश यादव अपने फ़न में माहिर हैं. खाना बनाने में उनका कोई सानी नहीं. अपने काम में उन्हें बड़ा आनंद आता है. तीन बच्चों के पिता गणेश एक विनम्र व्यक्ति हैं. वह कहते हैं, “मेरे पास यही एकमात्र हुनर है. लेकिन इसी की बदौलत मैं…

Migrant Diaries: Abul Hasan Mirza “I'll invite you home for a meal soon. We want to thank you,” says an optimistic construction supervisor who shared the rations he got with his team

Abul Hasan Mirza is a rare kind of migrant worker. He is a supervisor at construction sites, and works for a company called Hotema. When the coronavirus pandemic descended like a nightmare he stood his ground and didn’t abandon those who worked under his charge. Like many migrants leaving Mumbai, Mirza could also have boarded…

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