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पुलवामा आतंकी हमला: बदले से नहीं, न्याय से भरेंगे ज़ख्म सचिव की मेज़ से

23, Feb 2019 | तीस्ता सेतलवाड़

14 फरवरी को कश्मीर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के काफ़िले पर आतंकवादियों द्वारा हमले में भारत ने अपने 44 बहादुर बेटे खो दिए. असहनीय दुःख वाली इस भयावह घटना से पूरे देश में शोक की लहर फैल गई है. बहुत से लोग इस दुःख को व्यक्त करने के लिए कुछ अप्रिय रास्ता भी अपना रहे हैं… शहीद CRPF जवानो ने जिन मूल्यों की सुरक्षा में जान गंवाई ये रास्ते उन मूल्यों का अपमान करते हैं… ये मूल्य है भारत के लोगों का आपसी सौहार्द जो मुश्किल के समय में भी हमें साथ बनाए रखता है.

इस बात से तो कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि आतंकवादियों द्वारा किया गया ये भयावह हमला एक बहुत ही कायरतापूर्ण और निंदनीय कृत्य था. ये ज़ाहिर सी बात है कि इन कायर आतंकियों के ज़हन में बहुमूल्य इंसानी जीवन के प्रति कोई सम्मान और लगाव नहीं है. ये आतंकवादी वे लोग हैं जो दुनिया के राजनीतिक तौर पर सबसे अस्थिर इलाकों में भय और क्रूरता के माहौल को और भड़का कर उसे और भी अधिक जटिल बना देने की कोशिश करते हैं. हर सही सोच वाले व्यक्ति को इस हमले की निंदा करनी ही चाहिए.

हमें उनके उस षड़यंत्र पर भी ज़रूर सवाल उठाना चाहिए जिसके ज़रिये यह आतंकवादी हमारे भीतर की उत्तेजना, घृणा और आपसी विश्वास की भावना के साथ खेलते हैं, उसका इस्तेमाल करते हैं और कश्मीरियों व दूसरे भारतीय अल्पसंख्यकों के लिए हमारे ज़हन में नफ़रत भड़काने की कोशिश करते हैं.

उत्तर और पश्चिमी भारत में इस तरह के नफ़रतपूर्ण हमलों की कई ख़बरें सामने आईं हैं. कश्मीरियों के मन में भय और असुरक्षा की भावना डाली जा रही है. पुलवामा हमले के 48 घंटो के अन्दर ही कईयों को उनकी सोशल मीडिया पोस्ट के कारण नोटिस भेजे गए व कईयों के तो टर्मिनेशन दे दिए गए, वो भी बगैर किसी पूर्व सूचना के. पूरा एक गिरोह है जो सोशल मीडिया के ज़रिये ये घृणित माहौल तैयार करने का काम कर रहा है.

इस निर्दयी कृत्य के बाद देश में जिस तरह की प्रतिक्रिया सामने आई है, उसके मद्देनज़र हमें इस ख़याल पर गौर करना ही चाहिए कि बदला ले लेने का मतलब इंसाफ़ हो जाना बिलकुल नहीं है. गर हम मासूमों पर हमला करने लग जाएं, डर और नफ़रत भड़काने वाले संदेशों को रोकने की बजाए उनकी झड़ी बरसाने लगें, तो ये उन आतंकवादियों का साथ देना ही हुआ, उनका विरोध नहीं! लिहाज़ा, लोगों के बारे में अभद्र टिप्पणी करना सिर्फ़ इसलिए कि वो कश्मीरी हैं, उन्हें गलियां देना और धमकाना सिर्फ़ इसलिए क्योंकि इनका धर्म भी वही है जो उनका था, किसी को उक्साना कि कश्मीरियों को मार दो, उनकी संपत्ति को नुक्सान पहुंचाओ, उनके कार्यस्थल पर तोड़फोड़ करो और सैनिकों की शहादत का बदला ले लो… इस तरह की हरकतें पुलवामा के नायकों का गौरव बढ़ाएंगी नहीं, बल्कि उसे मटियामेट कर देंगीं.

यदि हम धर्म, जात, क्षेत्र के आधार पर यूं ही विभाजित होते रहे तो ये एक तरह की सहायता होगी उन आतंकवादियों के लिए जो भारत को, और एक राष्ट्र के रूप में भारतीयता के विचार को, नष्ट करना चाहते हैं. भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांत और संवैधानिक मूल्य उनके सबसे बड़े भय हैं. यही वे नष्ट करना चाहते हैं. तो चलिए हम सब एक हो कर उन्हें ऐसा करने से रोकें!

हमारी सेना और CRPF दोनों धर्मनिरपेक्ष, संवैधानिक मानकों पर बने संस्थान हैं. हमारे लिए ये उनसे सीख लेने वाली बात है. जयपुर छावनी में एक विशाल बोर्ड पर लिखा है कि, “यदि आप एक सैनिक के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो एक ऐसे भारतीय बनें जो इस लायक हो की कोई भी सैनिक उसके लिए अपनी जान दांव पर लगाने को तैयार हो जाए!”

जबकि वर्तमान राजनीतिक वातावरण द्वारा उक्साए जा रहे भारतीयों का एक वर्ग, सोशल मीडिया पर और सड़कों पर भी वैसी ही नफ़रत भरी प्रतिक्रिया दे रहा है जैसा जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी चाहते थे, भारत की सेना और CRPF ने इस पर शांति और समझदारी से प्रतिक्रिया दी है.

इतना ही नहीं ‘CRPF मददगार’ ट्विटर हैंडल ने सहायता के लिए 14411 टोलफ़्री नंबर के साथ ट्विट किया है. तथा 7082814411 पर एसएमएस के ज़रिये भी उनसे मदद ली जा सकती है.

 

जैश-ए-मोहम्मद ने हमले की जिम्मेदारी ली है. ये आतंकवादी हमारी भावनाओं को उत्तेजित कर हमें एक दूसरे से लड़वाने के लिए इस तरह की चरम हिंसा का सहारा लेते हैं. हमें उन्हें सफल नहीं होने देना है और उन्हें पुरजोर तरीके ये सन्देश दे देना है कि वे चाहे कोई कुछ भी कर लें, भारत हमेशा एकजुट ही रहेगा… इस से बेहतर मुह तोड़ जवाब और क्या हो सकता है?

अभी शोक का समय है, फिर उपचार की प्रक्रिया शुरू होगी. हां, घाव के निशान रह जाएँगे, दुःख भी रहेगा. पर जिनकी जान गई, हम उनके ऋणी हैं और जवाबी कार्यवाही से हमें ये ऋण चुकाना भी है… परन्तु हिंसा और नफरत से नहीं… बल्कि हमें लड़ना है अपनी उन तीव्र भावनाओं से जो हमारे सबसे कमज़ोर क्षणों में पैदा होती हैं और हमें हिंसक बना देती हैं. हमें अपनी ताकत वापस जुटानी है, एकजुट हो जाना है और इस भयानक त्रासदी के समय में भी उदार और संयमी बने रहना है.

भारत एक गौरवपूर्ण और शक्तिशाली लोकतंत्र है. लेकिन यह भी आवश्यक है की दुख और आक्रोश में भी एकजुट खड़े रहते हुए, संयमित रहकर हम गंभीर और ज़रूरी सवाल पूछें. सवाल जो डरावने विचलित करने वाले और हमले कि निंदा मात्र के नहीं, बल्कि सभी प्रकार के आतंक से लड़ने के लिए हमें सशक्त बनाने वाले हों. सवाल जो वर्तमान सरकार से हमले के बाद उसकी प्रतिक्रिया, ज़िम्मेदारी, और खासतौर पर समाज को भावनात्मक स्तर तोड़ने के विषय में उससे जवाब मांगें. ये सभी भारतीयों का अपरिहार्य अधिकार है जिसका उपयोग हमें करना ही चाहिए.

यह सभी भारतीयों के लिए, विशेष रूप से उन मुखर, शहरी-केंद्रित लोगों के लिए, आवाज़ उठाने का समय है, जो हमारे अर्धसैनिक बलों (जिनमे से CRPF भी है), पुलिस, सेना और अन्य बलों से सम्बंधित नीति बनाने वालों को प्रभावित कर सकते हैं. जहाँ से हमारे अधिकतर जवान आते हैं वो सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों के विशाल तबका है. न्याय का यह भी मतलब है कि जिस जवान की मौत हुई है उस पर आश्रित परिवार की क्षतिपूर्ति भी हो सके (केवल मुआवज़ा नहीं). ऐसे सैनिकों के परिवारों को भारत और भारतीयों द्वारा आश्वस्त करना है कि हम भी उनके ज़ख्मो को भरना चाहते हैं. हम भी न्याय ही चाहते हैं.

अंत में, हमें ठोस न्याय के लिए कदम आगे बढ़ाना चाहिए. आतंकी हमलों के अपराधियों को सज़ा और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों तरह के कानून हैं. कानून को अपने कार्य में अग्रसर होने दें. तभी न्याय हो सकता है.

 

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