इलेक्टोरल बॉन्ड: लोकतंत्र का “ट्रोजन हॉर्स” राजनैतिक पार्टियों को चन्दा देने वालों को गोपनीय रहने की स्वतंत्रता और देश के बाहर रहने वालों को भी विदेशी मुद्रा अधिनियम (FEMA) के तहत चंदे की छूट ने भारतीय चुनावी प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ की संभावना खड़ी की है

31, Oct 2022 | CJP Team

सरकार के पारदर्शिता और जवाबदेही के दावों के उलट, इलेक्टोरल बॉन्ड में कई मूलभूत लोकतंत्र विरोधी बाते हैं। विशेष रूप से इस गोपनीयता के सिद्धांत के चलते जनता को यह मालूम ही नहीं कि जिन पार्टियों को हम वोट करते हैं उन्हें कौन चन्दा दे रहा है। बिना पूरी जानकारी के मतदाता का निर्णय प्रभावित हो सकता है जो चुनावे लोकतंत्र के लिए ठीक संकेत नहीं है। भारत के एक अधिक सुदृढ़ और जवाबदेह लोकतंत्र बनने की राह में इस इलेक्टोरल बॉन्ड योजना और चुनावी चंदे के अन्य कई कानून बाधा बन कर खड़े हैं।

 14 अकतूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने गुप्त इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को चुनौती देतीं कई याचिकाओं की अगली सुनवाई दिसम्बर 2022 में मुकर्रर की है। ये याचिकाएं शुक्रवार 14 अकतूबर को एक लंबे विलंब के बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की गईं, जबकि इससे पिछली सुनवाई मार्च 2021 में हुई थी।[i] इस देरी के बाद, अंततः इस मामले को 6 दिसम्बर 2022 को सुना जाएगा।

इलेक्टोरल बॉन्ड वह माध्यम हैं जिसके ज़रिये कोई भी व्यक्ति राजनैतिक पार्टी को चन्दा दे सकता है। चन्दा देने वालों की पहचान गुप्त रखने के अलावा भी इस योजना में ऐसे पेंच हैं जो वर्तमान में भारत की राजनीति पर हावी धनबल के चरित्र को स्पष्ट करते हैं। इस परिपेक्ष्य में यह कानूनी शोध भारत में चुनावी चंदे से जुड़े नियमों में हालिया संशोधन और उस संदर्भ में 2018 में सरकार द्वारा स्थापित चुनावी बॉन्ड योजना को उदाहरण सहित स्पष्ट करने का काम करता है।[ii]

भारत में चुनाव की फन्डिंग हेतु निम्नलिखित कानून लागू हैं: 

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the Peoples Act), 1951)[iii]
  • अधिनियम की धारा 29B राजनैतिक दलों को चंदा लेने का अधिकार देती है, बशर्ते वह किसी विदेशी स्त्रोत से न लिया गया हो।

[29B. राजनैतिक पार्टियों को चंदा लेने की स्वतंत्रता

कंपनी अधिनियम, 1956 (1 of 1956) को ध्यान में रखते हुए कोई भी राजनैतिक दल किसी भी व्यक्ति या कंपनी द्वारा स्वेच्छा से दिए गए कितने भी चंदे को स्वीकार कर सकता है, बशर्ते वह सरकारी कंपनी न हो।

परंतु, कोई भी राजनैतिक दल “विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम” [Foreign Contributions (Regulation) Act], 1976 (49 of 1976) की धारा 2, अनुच्छेद e द्वारा परिभाषित किसी भी विदेशी स्त्रोत से चंदा स्वीकार नहीं कर सकता।

व्याख्या: उक्त धारा और धारा 29C के उद्देश्यों हेतु:

  1. “कंपनी” का अर्थ धारा 3 के अनुसार है।
  2. “सरकारी कंपनी” का अर्थ धारा 617 के अनुसार है।
  3. “अंशदान” (चंदे) का अर्थ “कंपनी अधिनियम, 1956” (1 of 1956) की धारा 293A के अनुसार है, जिसमें किसी भी व्यक्ति द्वारा एक राजनैतिक दल को दिया गया चंदा या अंशदान शामिल है, तथा
  4. “व्यक्ति” का अर्थ “इनकम टैक्स अधिनियम, 1961” (43 of 1961) की धारा 31, अनुच्छेद 2 के अंतर्गत आता है, लेकिन जिसमें सरकारी कंपनी, शासकीय इकाइयां या आंशिक अथवा पूर्ण रूप से सरकारी फन्डिंग पर आश्रित संस्थाएँ शामिल नहीं हैं।]
  • अधिनियम की धारा 29C कहती है कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष के आखिर में राजनैतिक पार्टियों के कोषाधिकारी, किन्हीं भी व्यक्तियों या कंपनियों द्वारा रु. 20,000 से अधिक के चंदों की एक रिपोर्ट तैयार करेंगे और इन पार्टियों को इलेक्टोरल बॉन्ड द्वारा चंदों का विस्तृत विवरण न देने की छूट होगी।

 

  • किसी भी राजनैतिक दल के कोषाधिकारी या अन्य किसी अधिकृत व्यक्ति को पार्टी की तरफ से हर वित्तीय वर्ष में निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रख एक रिपोर्ट बनानी चाहिए:
  1. किसी भी व्यक्ति द्वारा पार्टी को दिया गया बीस हजार से ज्यादा का चंदा
  2. सरकारी कंपनी के अतिरिक्त किसी भी अन्य कंपनी द्वारा दिया गया बीस हजार से ज्यादा का चंदा

[बशर्ते इलेक्टोरल बॉन्ड द्वारा प्राप्त चंदे के संदर्भ में इस अनुच्छेद की कोई भी बात लागू नहीं होती।

व्याख्या: इस अनुच्छेद के उद्देश्य हेतु “इलेक्टोरल बॉन्ड” का अर्थ “भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934” (2 of 1934) की धारा 31 की उप-धारा 3 की व्याख्या के अनुसार होगा।]

  • उप-धारा (1) के तहत बनाई गई रिपोर्ट नियत शैली के अनुसार होगी।
  • उप-धारा (1) के अंतर्गत वित्तीय वर्ष की रिपोर्ट राजनैतिक पार्टी के कोषाधिकारी या अन्य किसी अधिकृत व्यक्ति द्वारा “इनकम टैक्स अधिनियम, 1961” (43 of 1961) की धारा 139 के अनुसार उस वित्तीय वर्ष के आय विवरण (return) दाखिल करने की अंतिम तारीख से पहले चुनाव आयोग को जमा करा दी जानी चाहिए।
  • यदि उक्त कोषाधिकारी या अधिकृत व्यक्ति उप-धारा (3) के अनुसार रिपोर्ट जमा नहीं करा पाता तो चाहे “इनकम टैक्स अधिनियम, 1961” में जो भी कहा गया हो, वह राजनैतिक पार्टी अधिनियम के तहत कर छूट की अधिकारी नहीं होगी।
  • कंपनी अधिनियम, 2013

“कंपनी अधिनियम, 2013” की धारा 182 कहती है कि कंपनियाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनैतिक पार्टियों को चंदा दे सकती हैं। इस कानून की धारा 182(3) कहती है कि किसी एक वित्तीय वर्ष में दिए गए चंदे का पूरा हिसाब-किताब कंपनी के उस अवधि के खाते में दर्ज होना चाहिए। 2017 से पहले तक कंपनियों के लिए अपने तीन वित्तीय वर्षों के औसत मुनाफे का 7.5% तक ही चंदे में देने की सीमा थी, लेकिन उस साल लाए गए एक बदलाव के द्वारा उनके लिए राजनैतिक पार्टियों को बिना किसी सीमा के पैसा देने का रास्ता साफ हो गया।[iv]

  • इनकम टैक्स अधिनियम 1961[v]

“इनकम टैक्स अधिनियम, 1961” की धारा 80GGB एवं 80GGC के तहत कंपनियों को राजनैतिक पार्टियों को दिए गए चंदे पर 100% छूट प्राप्त करने की अनुमति है। इस छूट का अर्थ है कि दी गई धनराशि को कुल कर योग्य आय में से घटा दिया जाता है। उदाहरण के लिए यदि अमूक कंपनी की कर योग्य आय 500 करोड़ है लेकिन उसने पहले ही किसी राजनैतिक पार्टी को 10 करोड़ का चंदा दिया हुआ है तो उसकी कुल कर योग्य आय अब घट कर 490 करोड़ रह जाएगी।

इनकम टैक्स अधिनियम की धारा 13A विशेष रूप से राजनैतिक पार्टियों के लिए बनाया गया प्रावधान है। यह प्रावधान राजनैतिक पार्टियों को अचल संपत्ति, पूंजी लाभ (capital gain) एवं चंदे को कर योग्य आय से बाहर रखने की आजादी देता है, बशर्ते खाते के रखरखाव, ऑडिटिंग एवं 20,000 रुपये से अधिक की फन्डिंग (यदि वह इलेक्टोरल बॉन्ड द्वारा नहीं की गई है) का हिसाकिताब रखने संबंधी शर्तें पूरी की गईं हो, और 2,000 रुपये से अधिक का कोई भी चंदा नियत शैली के अनुरूप ही लिया गया हो। इसका अर्थ यह है कि कानून के अनुसार 2,000 रुपये से अधिक का चंदा नियत शैली में चेक, बैंक ड्राफ्ट या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ही पार्टी को दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही, राजनैतिक पार्टी को 20,000 से अधिक के चंदे का हिसाब रखना चाहिए, जबकि इलेक्टोरल बॉन्ड में चंदे का हिसाब रखने की कोई बाध्यता नहीं है।

  • विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010

FCRA एक ऐसा कानून है जिसका जिक्र चुनावी फन्डिंग के संदर्भ में बहुत कम किया जाता है, जबकि गैर सरकारी संस्थाओं की फन्डिंग के संदर्भ में इसकी बहुत बात होती है। FCRA का नया कानून 2010 में 1976 के संस्करण को संशोधित कर लाया गया था। इस ऐक्ट के दोनों ही संस्करणों में विदेशी स्त्रोत का अर्थ एक ऐसी कंपनी था जिसके शेयर व पूंजी का कंसकम 50% हिस्सा विदेशी हाथों में हो।[vi] हालांकि, 2016 में लाए गए “वित्त अधिनियम” (Finance Act) में इस परिभाषा को इस प्रावधान द्वारा बदल दिया गया जो कहता है कि यदि कोई कंपनी विदेशी मुद्रा अधिनियम (FEMA), 1992 के तहत नियत सीमाओं का पालन कर रही है तो उसे कानूनी रूप से विदेशी स्त्रोत नही माना जाएगा, चाहे उसकी शेयर पूंजी का 50% विदेशी हाथों में ही क्यों न हो।[vii]

विदेशी स्त्रोत की परिभाषा को बदल देने का असर “लोक प्रतनिधित्व अधिनियम” (RPA) पर पड़ता है। RPA की धारा 29B कहती है कि कोई भी राजनैतिक पार्टी विदेशी स्त्रोत से पैसा स्वीकार नहीं करेगी। लेकिन 2016 के वित्त अधिनियम में विदेशी स्त्रोत के अर्थ में ही बदलाव कर दिया गया है। इस वित्त अधिनियम की वजह से कोई भी पार्टी 50% से ज्यादा विदेशी नियंत्रण वाली कंपनी से चंदा स्वीकार कर सकती है यदि वह कंपनी FEMA द्वारा क्षेत्रवार निवेश पर निर्धारित सीमाओं का पालन करती है।

“विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999” या FEMA विदेशी मुद्रा के बेहतर प्रबंधन हेतु लागू किया गया था। यह कानून कंपनियों के बॉन्ड और शेयर जैसे विदेशी मुचलकों (securities) से भी संबंधित है। FEMA के तहत दिए गए अधिकारों के अनुसार सरकार समय समय पर विदेशी निवेश (FDI) संबंधी नीति जारी करती है। आखिरी FDI नीति 2020 में जारी की गई। इस नीति के ज़रिये विदेशी निवेश की सीमाएँ तय की जाती हैं जिन्हें “क्षेत्रीय सीमा” (sectoral cap) कहा जाता है। उदाहरण के लिए, रक्षा के क्षेत्र में किसी विदेशी कंपनी को 74% नियंत्रण तक की छूट है जिसके आगे मालिकाना शेयर रखने के लिए सरकारी अनुमति जरूरी है। डिजिटल माध्यम में समाचार व सम-सामयिक कार्यक्रम प्रदर्शित करने के क्षेत्र में कोई विदेशी कंपनी 26% तक शेयर मालिक हो सकती है, वह भी सरकार की अनुमति से। इस सब का अर्थ यह है कि यदि कंपनी विदेशी निवेश के संदर्भ में एफडीआई नीति का पालन करती है तो वह FCRA के तहत चंदे का विदेशी स्त्रोत नहीं मानी जाएगी, फिर भले ही उस कंपनी का 50% और यहाँ यक कि 100% भी विदेशी हाथों में हो, और इस तरह वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत राजनैतिक पार्टियों को फंड करने योग्य होगी।[viii]

इलेक्टोरल बॉन्ड योजना

केंद्र सरकार ने 2 जनवरी 2018 को एक गज़ट अधिसूचना के जरिये इलेक्टोरल बॉन्ड योजना लागू की। इलेक्टोरल बॉन्ड की प्रकृति एक वचन पत्र (promissory note) जैसी होती है और यह एक वाहक बैंकिंग यंत्र (bearer banking instrument) होता है। अर्थात इस बॉन्ड के द्वारा एक निश्चित अवधि में पैसा देने का वचन दिया जाता है और जिस धारक के पास यह होगा, वह इसे चेक की तरह भुना सकता है। बॉन्ड में अंशदाता या धारक का नाम नहीं होता। यह बॉन्ड सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चुनिंदा शाखाओं में उपलब्ध होते हैं। यह बॉन्ड रु. 1,000 के मूल्य से शुरू होकर रु. 1,00,00,000 मूल्य के हो सकते हैं। यह सिर्फ जनवरी, अप्रैल, जुलाई, अकतूबर महीनों में केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किन्हीं दस दिनों में जारी किए जा सकते हैं, जबकि आम चुनाव के साल में सरकार अतिरिक्त तीस दिन की घोषणा कर सकती है। “फैक्टली” नामक वेबसाईट की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 से लेकर 2020-21 तक के तीन वित्तीय वर्षों में ही देश भर में 19 राजनैतिक दलों द्वारा 6500 करोड़ के भारी-भरकम मूल्य के बॉन्ड भुनाए गए।

इस अधिसूचना के भाग 7(4) में कहा गया है कि बैंक को बॉन्ड खरीददारों द्वारा दी गई जानकारी किसी भी उद्देश्य के लिए सार्वजनिक नहीं की जा सकती जब तक अदालत का ऐसा आदेश न हो या किसी सुरक्षा एजेंसी द्वारा कोई आपराधिक मामला दर्ज न किया गया हो। इलेक्टोरल बॉन्ड की गोपनीयता RPA की धारा 29C(b) द्वारा भी सशर्त संरक्षित की जाती है। हालांकि यह धारा राजनैतिक दल के कोषाधिकारी को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में गैर-सरकारी कंपनियों द्वारा दिए गए रु. 20,000 से अधिक के सभी चंदों का हिसाब देने को बाध्य करती है, लेकिन उसी धारा में इलेक्टोरल बॉन्ड द्वारा दिए गए चंदों का रिपोर्ट में जिक्र करने की आवश्यकता नहीं मांगी गई है।

कंपनी ऐक्ट, 2013 की धारा 182 इन व्यापारिक प्रतिष्ठानों द्वारा चंदा प्राप्त करने वाले राजनैतिक दलों की पहचान जाहिर करने को जरूरी बताती थी, लेकिन 2017 के एक संशोधन से यह अनिवार्यता खत्म कर दी गई। आजकल कंपनियाँ किसी ट्रस्ट द्वारा राजनैतिक दलों को चंदा देती हैं। वे इन सभी ट्रस्ट को फंड देती हैं और वे ही पार्टियों को चंदा डटे हैं। अतः अमूक कंपनी ने किस पार्टी को चंदा दिया यह बात उसके खातों को देखकर भी नहीं पता चल सकती।

भारतीय लोकतंत्र पर इलेक्टोरल बॉन्ड योजना का असर

ऊपर दी गई जानकारी का निचोड़ यही है कि चाहे कंपनी भारतीय हो या विदेशी (यदि वह FEMA के नियमों का पालन करती है) तो वह राजनैतिक दलों को कितना भी चंदा दे सकती है। इसके लिए उसे मुनाफे में रहना भी जरूरी नहीं बशर्ते वह तीन साल से व्यापार कर रही हो, किस राजनैतिक पार्टी को चंदा दिया जा रहा है यह खुलासा करने की आवश्यकता नहीं, और साथ ही कंपनी दिए गए चंदे पर कर योग्य आय में से 100% की छूट प्राप्त कर सकती है।

जहां तक राजनैतिक पार्टियों का प्रश्न है- उन्हें चंदे के खाते का हिसाबकिताब और जरूरी दस्तावेज़ सहेज कर रखने होते हैं ताकि निर्वाचन अधिकारी उसके स्त्रोत के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर सकें। साथ ही उन्हें रु. 20,000 से ज्यादा का स्वैच्छिक अंशदान करने वाले व्यक्तियों के नाम व पते समेत सभी जरूरी विवरण मुहैया कराने होंगे। लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड द्वारा चंदा देने वालों का विवरण, अर्थात चंदे के स्त्रोत संबंधी जानकारी देने की जरूरत नहीं है।

अतः इलेक्टोरल बॉन्ड मतदाताओं को पार्टियों को मिलने वाले चंदे के स्त्रोतों की जानकारी से महरूम रखते हैं। राजनैतिक पार्टियां भारत के लोगों का प्रतिनधित्व करने का एक ज़रिया हैं- संविधान में जनता को संप्रभु माना गया है, सरकार चलाने वाली राजनैतिक पार्टियों को नहीं। इलेक्टोरल बॉन्ड जनता से इन पार्टियों के बारे में जानकारी पाने का अधिकार छीन लेता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार बनाम एसोसिएशन फॉर डेमक्रैटिक रिफॉर्म के मामले के दौरान चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के बारे में नागरिकों को सही जानकारी होने की जरूरत पर विस्तार से प्रकाश डाला है। अदालत का कहना था- “हमारे विचार में बिना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के, और बिना स्वतंत्र और और निष्पक्ष जानकारी पाए मतदाताओं के लोकतंत्र जिंदा नहीं रह सकता। किसी प्रत्याशी के पक्ष में बिना पूरी जानकारी पाए मतदाताओं द्वारा डाले गए वोट अर्थहीन हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया, एक तरफा जानकारी, गलत जानकारी, अधूरी जानकारी और जानकारी का अभाव, ये सभी एक अशिक्षित नागरिक समाज बनाते हैं जिससे लोकतंत्र एक मज़ाक बनके रह जाता है। अतः गलत जानकारी, अधूरी जानकारी या न्यून जानकारी से ग्रसित मतदाताओं का वोट डालना लोकतंत्र पर गंभीर असर छोड़ता है। अभिव्यक्ति की आजादी में सही सूचना देना व पाना भी शामिल है जिससे राय रखनी की स्वतंत्रता व्यक्त होती है। अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार में सही जानकारी पाने का अधिकार अंतर्निहित है अतः यह मानने का कोई कारण नहीं है कि इस अधिकार के तहत लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक किसी पद के उम्मीदवार के बारे में सही जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकती”।[ix]

हालांकि उक्त ADR मुकदमे के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों की सम्पूर्ण जानकारी की महत्ता पर बात की थी, लेकिन राजनैतिक पार्टियों को चंदा देने वालों की पहचान जाहिर करने पर कोई चर्चा नहीं हुई। एक मुकदमे में चुनावों के काले धन से प्रभावित होने के खतरे पर बात हुई, पर फन्डिंग का स्त्रोत सार्वजनिक करने को लेकर कोई ठोस टिप्पणी नहीं की गई।[x]

यहाँ जनता द्वारा राजनैतिक दलों की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के अधिकार एवं किसी व्यक्ति के राजनैतिक पार्टी से जुडने के निजी अधिकार के बीच टकराव नजर आता है। लेकिन मामले का महीन अवलोकन किए बिना तस्वीर अधूरी रह जाति है। इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के मूल में चंदा देने वाले की गोपनीयता और एक ऐसी पहचान (KYC) प्रक्रिया है जिससे सरकर के मुताबिक व्यवस्था में काले धन का प्रवेश नहीं हो पाता। इलेक्टोरल बॉन्ड को दी गई अदालती चुनौती के खिलाफ एक सुनवाई के दौरान सरकार ने यह तर्क दिया है कि चंदा देने वालों को निजता का हक मतदाताओं के निजता के अधिकार का ही विस्तार है। [11][xi] हालांकि हम जानते हैं कि संविधान में भी निजता का अधिकार निरंकुश नहीं है और उसकी निर्धारित सीमाएँ हैं। राजनैतिक पार्टियों और उनके द्वारा बनाई गईं सरकारों का काम किसी से अहसान लेना और उसका अहसान चुकाना नहीं है। उनका कार्य सभी भारतीय लोगों की खुशहाली सुनिश्चित करना है। राजनैतिक पार्टियों को फन्डिंग देना और चुनाव में वोट करना एक जैसा नहीं है क्योंकि मतदाता वोट देकर राजनैतिक पार्टी पर अहसान नहीं कर रहा जिसे पार्टी बाद में चुकाए। लेकिन, क्योंकि राजनैतिक पार्टियों को धनवान चंदेदारों की पहचान और उनके द्वारा दी गई राशि का पता होता है इसीलिए वे सत्ता में आने पर उनका अहसान उतारने को उनके पक्ष में नीतियाँ बना सकते हैं। इस प्रकार चंदा देने वाले की गोपनीयता और मतदान करने वाले की निजता में फर्क है। इलेक्टोरल बॉन्ड तथा FCRA द्वारा विदेशी स्त्रोत की परिभाषा मिलकर एक ऐसी स्थिति को जन्म देते हैं जहां भारत के बाहर से पैसा यहाँ के राजनैतिक तंत्र में प्रवेश करता है जबकि न तो वह पारदर्शी है ताकि आम नागरिक को उसका पता हो, और न ही उसकी जवाबदेही है ताकि उस आधार पर वह फैसला कर सके।

यह देखना अभी बाकी है कि मानिनीय सर्वोच्च न्यायालय शक्ति के असंतुलन से उपजी इस उलझन पर क्या रुख लेता है।

 

[i] https://www.thehindu.com/news/national/does-electoral-bonds-system-provide-from-where-the-money-comes-sc-asks-government/article66009637.ece

[ii] S.O. 29 (E) https://incometaxindia.gov.in/Communications/Notification/NotificationSO29_2018.pdf तिथि, 2 जनवरी 2018

[iii] https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/2096/1/A1951-43.pdf

[iv] https://ibclaw.in/section-182-of-the-companies-act-2013-prohibitions-and-restrictions-regarding-political-contributions/

[v] https://incometaxindia.gov.in/pages/acts/income-tax-act.aspx

[vi] बिदेशी मुद्रा अधिनियम (FCRA) की धारा 2(1) (j)

[vii] वित्त अधिनियम, 2016 एंट्री संख्या 236 https://www.cbic.gov.in/resources/htdocs-cbec/fin-act2016.pdf

[viii] समेकित एफडीआई नीति, 2020 की एंट्री 5.2.6 एवं 5.2.7 https://dpiit.gov.in/sites/default/files/FDI-PolicyCircular-2020-29October2020.pdf

[ix] 2002 (3) SCR 294

[x] कॉमन कॉज़ बनाम भारत सरकार https://main.sci.gov.in/judgment/judis/15749.pdf

[xi] https://www.hindustantimes.com/india-news/privacy-of-electoral-bond-buyers-vital-centre-tells-supreme-court/story-Jygdc2y3k2arsvq1yw1eiM.html

 

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