‘लव जेहाद’ का शोर मचा कर कुचली जा रही है महिलाओं की आज़ादी और गरिमा प्रजावाणी

12, Dec 2020 | तीस्ता सेतलवाड़

अफ़ग़ानिस्तान में बामियान के बुद्ध को तालेबान की ओर से डाइनामाइट से उड़ा देने के ठीक दो साल पांच महीने पहले यानी 6 अक्टूबर 1998 को मैंने गुजरात के डीजीपी सी. पी. सिंह का इंटरव्यू लिया था. 2001 में काबुल से 130 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थापित गांधार शैली में बनी बुद्ध की यह मूर्ति तालेबान के विस्फोट में उड़ा दी गई थी.

उन दिनों विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की ओर से ‘लव जिहाद’ का बहाना बना कर अल्पसंख्यकों पर ज़बरदस्त हमले हो रहे थे. इन संगठनों का कहना था कि अंतर धार्मिक विवाह लड़कियों को अग़वा कर किए जा रहे हैं. जिस दिन मैंने सी.पी सिंह से इंटरव्यू (Communalism Combat, October 1998) लिया, उस दिन उन्होंने साफ कहा था कि ‘ ज़बरदस्ती अंतर धार्मिक विवाह और धर्मांतरण के आरोप बिल्कुल बेबुनियाद हैं.’

उनका कहना था कि जिन महिलाओं की ज़बरदस्ती शादी कराने के आरोप लगाए जा रहे हैं, उन्होंने अपनी मर्ज़ी से जीवन साथी चुना था. भले ही डीजीपी ने इस मामले में बड़ी ही साफगोई से अपना जवाब दिया था और हालात स्पष्ट किए थे, लेकिन इसके बाद के दो साल (1998-2000) के दौरान गुजरात पुलिस ने अलग-अलग समुदायों के महिलाओं और पुरुषों के बीच शादी की ‘जांच’ के लिए एक स्पेशल सेल बनाई थी. जबकि पुलिस का यह कदम साफ तौर पर कानून की नजर में बराबरी, (संविधान का अनुच्छेद 14), गरिमा के साथ जीवन बिताने (संविधान का अनुच्छेद 21) और अपनी मर्ज़ी किसी भी आस्था, मत और धर्म (संविधान का अनुच्छेद 25) को मानने जैसे मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन था.

जिस दिन मैंने सीपी सिंह का इंटरव्यू लिया था, उसके ठीक दो साल 124 दिन बाद यानी 2 मार्च, 2001 को तालेबान सरकार ने कह दिया कि बामियान में मौजूद बुद्ध की प्रतिमा, एक ‘मूर्ति’ है. इसके बाद मुल्ला मोहम्मद उमर ने दुनिया के सामने एक शब्द उछाला. वह शब्द था – जेहाद. मुल्ला उमर के आदेश में जेहाद को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल का संदेश था. हिंसक और राजनीतिक इस्लाम के पैरोकारों की ओर से दूसरे श्रेष्ठतावादियों को परोसे गए  गए इस अरबी शब्द का  वास्तविक अर्थ इसके बाद पूरी तरह से बदल चुका था, अब चाहे कोई सिर पटक कर भी समझाए कि इसका मौलिक अर्थ ‘भलाई के लिए किया जाने वाला महान संघर्ष या प्रयास’ है, उस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

गुजरात यानी ‘आदर्श हिंदू राज्य’ (राष्ट्र) में महीने दर महीने और साल दर साल पुलिस प्रशासन का इस्तेमाल जाति और समुदाय की दीवार तोड़ कर शादी करने वाले जोड़ों को निशाना बनाने में किया गया. इन जोड़ों ने अगर इस तरह से शादी करने और साथ रहने का फैसला किया था तो यह ग़ैरक़ानूनी काम नहीं था. वे स्पेशल मैरिज एक्ट 1941 में निहित संवैधानिक अधिकार का ही इस्तेमाल कर रहे थे. 2002 में नरोदा पाटिया में सुनियोजित और नृशंस हत्याओं के दोषी, बाबू बजरंगी को सजा मिली थी. वह भी नवचेतन ट्रस्ट नाम से एक ट्रस्ट चलाता था. उसका दावा था कि इसके जरिये उसने घर से भाग कर दूसरे समुदाय में शादी करने वाली 700 लड़कियों को ‘बचाया’ था. इनमें से कई पटेल जातियों की लड़कियां थीं, जिन्होंने दूसरी हिंदू जातियों की लड़कों से शादी की थी. अस्पृश्यता मिटाने, जाति भेद खत्म करने और समाज में आज़ादी, समानता और भाईचारा फैलाने के लिए अंतर सामुदायिक शादियों को अहम कदम मानने वाले डॉ अंबेडकर की प्रतिक्रिया इन स्थितियों को देखने के बाद क्या होती, पता नहीं ?

फ्रंटलाइन पत्रिका की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि बाबू बजरंगी के संगठन ने अंतर सामुदायिक शादियों को खत्म करने के लिए जोर ज़बरदस्ती और हिंसा और सहारा लिया. इनमें अपहरण और अग़वा किए जाने जैसे कदम भी शामिल थे. राज्य की पुलिस ने इन मामलों को रोकने में कोई खास सक्रियता नहीं  दिखाई. ऐसे अपराधों के खिलाफ लोगों के संवैधानिक और मौलिक अधिकार बहाल करने के लिए उसने आगे बढ़ कर कदम नहीं उठाए.

‘लव-जिहाद’ एक ऐसा शब्द है, जिसे आज के सार्वजनिक विमर्श में थोप दिया गया है. अब हम यह भी देख चुके हैं कि कई हाई कोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट का अंतर सामुदायिक शादियों पर क्या रुख रहा है. लव जिहाद, आज ऐसा शब्द बन चुका है जिसे एक आक्रामक बहुसंख्यकवाद ने बड़े जोर-शोर से हमारे सार्वजनिक विमर्श में चिपका दिया है. दरअसल यह ऊंची वर्चस्वशाली हिंदू जातियों की ओर से फैलाई जा रही धार्मिक अतिवादी कहानियों, इस्लामफोबिया और सांप्रदायिक नफरत में लिपटा शब्द बन गया है. इस पूरे विमर्श ने अब भारतीय अदालतों को भी अपने लेपेटे में ले लिया है.

हमने केरल में ऐसे अदालती केस देखे हैं (शाहन शा  बनाम स्टेट ऑफ केरल, 2009) जिनमें ऐसे ‘कट्टरपंथी संगठनों के काम करने की तरीकों का संदर्भ दिया गया था जो प्रेम के बहाने युवा लड़कियों का धर्मांतरण इस्लाम में करा रहे हैं’. इस तरह के मामलों में सबसे चर्चित केस 2017 का हादिया उर्फ़ अखिला केस था. अखिला ने अपना धर्म परिवर्तन कर परिवार की मर्जी के खिलाफ शफ़ीन जहान से शादी कर ली थी . इस तरह के मामलों से जुड़े अदालती केस में हम फैसलों को महिलाओं की आज़ादी या उनकी स्वायत्तता के खिलाफ पाते हैं. उनकी इच्छा, स्वतंत्रता और महिला के तौर पर उनके व्यक्तित्व को या तो परिवार की संपत्ति या समुदाय की इज़्ज़त के तौर पर देखा जाता है.

8 अक्टूबर, 2020 को (पूजा उर्फ़ ज़ोया बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य मामले में) इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले से एक बार फिर इस पर बहस तेज हुई. यह आदेश छोटा और दो टूक था. गुजरात के दर्जनों ऐसे मामलों के उलट इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महिला से सिर्फ सात सीधे सवाल पूछे और यह तय हो गया कि (पूजा उर्फ़ ज़ोया, उम्र 19 साल) वह बालिग़ है, और अपने पति शावेज के साथ रहना चाहती है. कोर्ट ने उसके खिलाफ केस खारिज करते हुए कहा कि वह बालिग़ है और वह जिसके साथ चाहे रह सकती है.

कोर्ट ने कहा, “हालांकि संविधान के तहत देश के नागरिकों को किसी भी धर्म, आस्था या मत को मानने का हक है, लेकिन सिर्फ शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन चिंताजनक है.” सिंगल बेंच ने धर्म और विवाह के बीच अंतर करते हुए कहा कि शादी एक चीज है, और आस्था दूसरी चीज. अगर अलग-अलग धर्मों को मानने वाले दो लोग शादी करना चाहते हैं तो स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 का रास्ता उनके लिए खुला है. यह कानून युनिफ़ॉर्म सिविल कोड बनाने की दिशा में शुरुआती कोशिश का नतीजा था.

इस आदेश के बाद यूपी और हरियाणा के सीएम ने कहा कि वे ‘लव जिहाद’ रोकने के लिए कानून बनाएंगे. दोनों राजनीतिक नेता एक ऐसी राजनीति के प्रतीक हैं जो हिंसक श्रेष्ठतावाद का प्रतिनिधित्व करता है. एक ऐसी राजनीति, जिसमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हिंसक हमले किए जाते हैं. इस तरह हम देख रहे हैं कि आज़ादी, गरिमा, स्वायत्तता और स्वतंत्रता की संवैधानिक बुनियाद को कुचलने के लिए किस तरह एक ‘कानूनी’ कदम उठाने क धमकी दी गई है. बाकी हिंदुस्तानियों को यह सोचने की जरूरत है कि इसके खिलाफ कहां और कैसे लड़ाई शुरू की जाए.

हाल में आए तनिष्क के विज्ञापन को ही ले लीजिए. एक अलग ढंग से, अंतर धार्मिक शादियों के प्रति सहिष्णुता पैदा करने वाला यह विज्ञापन, संघी ट्रोल्स का शिकार हो गया और टाटा कंपनी ने इसे हटा भी दिया. दरअसल अंतर सामुदायिक शादियों को बढ़ावा देने के मामले में हमें डॉ अंबेडकर के विचार पर गौर करना होगा, जो इसे जाति विहीन और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से मुक्त समाज के लिए जरूरी मानते थे. मणि रत्नम की फिल्म ‘बॉम्बे’ ने इस (मुंबई) विशाल महानगर में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुई हिंसा के दौर में अंतर सामुदायिक संबंध (शादी) की रूमानी तस्वीर खींची थी. लेकिन यह तस्वीर स्टोरियोटाइप थी. ऐसा लगता था कि बुर्क़ा और घूंघट भारत की वास्तविक तस्वीर हो. लोगों के दिमाग में यही तस्वीरें भूत की तरह नाच रही थीं. महिलाओं की यह कथित रुढ़िवादी छवियां उन लोगों को भी परेशान कर रही थीं जो लैंगिक आज़ादी और स्वायत्तता के सवाल को भी बड़ी मुश्किल से ही समझते हैं.

(इस लेख का एक हिस्सा 8 नवंबर 2020 को कन्नड़ अखबार प्रजावाणीके रविवार संस्करण में छप चुका है)

 

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