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बाल यौन उत्पीड़न: 95 प्रतिशत मामले अभी भी लंबित हैं पीओसीएसओ(पोकसो) के दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सबसे खराब निर्वाहक हैं

17, Apr 2018 | Sushmita
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बाल यौन उत्पीड़न के मामले देश में बढ़ रहे हैं और भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन न्यायाधीशों की पीठ, ने उच्च न्यायालयों से यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस – POCSO), 2012 के तहत बाल यौन उत्पीड़न के मामले में लंबित केसों की संख्या के बारे में जानकारी तलब की है.

राष्ट्रिय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2016 के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि कुल 1,01,326 पीओसीएसओ मामलों में से केवल 229 मामले अदालत ने इस साल तय किए गये थे. आंकड़ों के मुताबिक 70,435 पॉस्को के मामले पिछले साल से इस साल आगे बढ़ाये गए थे. 2016 में 30,891 नए मामले दर्ज कराये गए. पिछले मामलों को मिलाकर कुल 1,01,326 मामले लंबित हैं.

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एडवोकेट अलख आलोक श्रीवास्तव ने एक आठ महीने की बच्ची के क्रूर यौन उत्पीड़न के मामले में एक याचिका दायर की, जो वर्तमान में 31 जनवरी को अदालत के आदेश के तहत गहन देखभाल के लिए एम्स में भर्ती हैं. याचिका में कहा गया है कि एनसीआरबी के मुताबिक 95% लंबित दर थी. भारत के मुख्य न्यायाधीश मिश्रा ने कहा कि अदालत उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की देखरेख में गठित टीम द्वारा एकत्र किए गए नए और स्वतंत्र आंकड़े चाहती है.

बच्चों के यौन उत्पीड़न के मामलों की सबसे अधिक संख्या महाराष्ट्र में है जहां 17,300 मामले अभी भी लंबित हैं, यूपी में 15,900 और मध्य प्रदेश में 10,950 मामले हैं. केरल, ओडिशा, कर्नाटक, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और गुजरात में 3,500 और 5,000 के बीच के मामलों की लंबितता है. एक साल पहले, यह बताया गया था कि देश भर में पोकसो से संबंधित मामलों की कुल लंबितता 27,558 थी. एक साल बाद, यह संख्या 90,205 तक पहुंच गई है. लंबितता के आंकड़ो की छलाँग चिंता का विषय है.

विशेष अभियोक्ता की नियुक्ति के लिए प्रावधान

POCSO अधिनियम के तहत बच्चों के खिलाफ घटित अपराधों के मामलों के जाँच के लिए विशेष अदालतों की स्थापना अनिवार्य है और उनका इरादा बच्चों की सुरक्षा और उन्हें उत्पीड़न से बचाने के लिए किया गया था. यह सुनिश्चित करने के लिए कि एफआईआर के पंजीकरण के दिन से एक वर्ष की भीतर जाँच पूरी हो जानी चाहिए, देश भर के 681 जिलों में 597 ऐसी अदालतें लगभग हर जिले में गठित की गई हैं. ये अदालतें उच्च न्यायालयों की देखरेख में आती हैं और उच्च न्यायालयों को पीओसीएसओ अदालतों के कामकाज की निगरानी करनी होती है. उच्च न्यायलय और राज्यों ने नियुक्त 459 विशेष सरकारी अभियोजकों और 729 विशेष किशोर पुलिस इकाइयां स्थापित की गईं. हालांकि, यहाँ कुशल निगरानी की प्रणाली गायब है.

‘ज्ञात’ शैतान

एक और सर्वेक्षण, जिसमें 12 से 18 साल की उम्र के बीच के 45,000 से अधिक बच्चों ने 26 राज्यों में भाग लिया, ने बताया कि हर दो बच्चों में से एक बाल यौन शोषण का शिकार है. इसके अलावा, प्रत्येक पांच में से एक यौन शोषण होने के डर की वजह से सुरक्षित नहीं महसूस करता है. सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि चार परिवारों में से एक परिवार बच्चे के साथ हुए उत्पीड़न की रिपोर्ट करने के लिए आगे नहीं आता है.

इसके अलावा, विभिन्न समूहों द्वारा किए गए विभिन्न अध्ययनों ने इस तथ्य के संकेत दिये हैं कि 80 प्रतिशत से अधिक मामलों में अपराधी पीड़ित को जानते हैं. हालांकि अदालतों में मामलों की लापरवाही निश्चित रूप से चिंता का विषय है, बच्चों की बहुत अधिक चिंता का विषय उनके परिचितों द्वारा विशेष रूप से पिता और सौतेले-पिता द्वारा किया शोषण हैं. ऐसे मामलों में प्रक्रियात्मक विलंब का मतलब है कि अभियुक्त, जो जमानत का लाभ उठा सकते हैं, वापस उसी घर में चला जाता है. इससे भी अधिक, ज्यादातर मामलों में बच्चों को शक्ति का असंतुलन, जो कि उत्तरजीवी और अपराधी के बीच मौजूद हो सकता है, के कारण मामलों की रिपोर्ट करने की संभावना न के बराबर होती है. ऐसे मामलों में एक अलग तरह से सहारा देने की आवश्यकता है.

POCSO के तहत बाल अनुकूल प्रावधान

POCSO अधिनियम, 2012 में अनिवार्य रिपोर्टिंग इत्यादि जैसे प्रावधानों ने सुनिश्चित किया कि मामलों की संख्या में वृद्धि दर्ज हो. यह एक संदर्भ में है कि न्यायाधीश बहुत ही असंवेदनशील हैं और ‘झूठे’ और ‘वास्तविक’ मामले के न्यायिक पूर्वाग्रह के साथ न्यायलय में आएंगे. बच्चों को पुलिस स्टेशनों के बाहर इंतजार करना होगा, पुलिस बाल यौन शोषण के मामलों को रिकॉर्ड नहीं करेगी, न्यायालय बच्चों को गलियारों में बैठा देती थी. पीओसीएसओ ने इनमें से कुछ चीजें बदल दी, जैसे कि: किसी बच्चे को एफआईआर दर्ज करने के लिए पुलिस स्टेशन में जाने की ज़रूरत नहीं है, सादे कपड़े में एक महिला द्वारा उनका बयान दर्ज कुआ जायेगा, बाल कल्याण समिति को एक ‘सहायक व्यक्ति’ प्रदान किया जायेगा जो जांच और परीक्षण के दौरान साथ रहेगा.

स्पष्ट खामियां

POCSO अधिनियम की धारा 32 के प्रावधानों के तहत मामलों के संचालन के लिए प्रत्येक विशेष न्यायालय के लिए स्वतंत्र विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति करना अनिवार्य है. हालांकि, एक्ट के कार्यान्वयन के निर्देश मांगने के लिए वकील गौरव बंसल द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि बारह राज्यों में से कई राज्यों में जिनमें महाराष्ट्र, गुजरात, केरल और अन्य दो केंद्र शासित प्रदेशों शामिल हैं, सार्वजनिक अभियोजकों को नियुक्त नहीं की गयी है. आप गौरव कुमार बंसल की पूरी रिट याचिका को यहां देख सकते हैं.

भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, जे एस खेहर के बेंच ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों को सुओ-मोटा एक्शन लेने और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों से निपटने के लिए विशेष सरकारी अभियोजकों को नियुक्त करने का निर्देश दिया. जाँच को  बच्चों के अनुकूल बनाने के लिए, पोकसो की  धारा 33 (2) ने निर्दिष्ट किया है कि विशेष लोक अभियोजक बच्चे से प्रश्न पूछने से पहले(बच्चों की मुख्या परीक्षा में, प्रतिपरीक्षा या पुन: परीक्षा के लिए) प्रश्नों की सूची को विशेष अदालत को संसूचित करेगा, जो क्रम में उन प्रश्नों को बालक के समक्ष रखेगा. याचिका ने यह भी सवाल उठाया कि यही कारण है कि ऐसे मामलों की जल्दी जाँच नहीं हो पाती.

मामलों के देरी का मुद्दा साथ ही अपराधियों का कई बार पीड़ितों का करीबी होना,, बच्चे के जीवन और मनोबल के लिए एक गंभीर खतरा बन जाता है. यह हमें मजबूर करता है कि हमारे बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए और अधिक रचनात्मक तंत्रों के बारे में सोचें.

 

अनुवाद सौजन्य – सदफ़ जाफ़र

फीचर छवि सौजन्य – फामोसा

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