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संकट के इस दौर में सुप्रीम कोर्ट कहां है?

यह आलेख इस बारे में नहीं है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये अदालत की सुनवाई कितनी कारगर है. यह इस बारे में भी नहीं है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में कितने जजों को बैठना चाहिए. इस आलेख में इस बात पर चर्चा करेंगे कि देश की ऊंची अदालतों खास कर सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 को लेकर दायर याचिकाओं के साथ क्या सुलूक किया. हम यह भी बताएंगे कि कैसे हमारी अदालतों खास कर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान और हिन्दुस्तान की अवाम दोनों को निराश किया है. 

इस पर चर्चा करने से पहले मैं दो चीजें बिल्कुल साफ कर दूं. पहली तो यह कि कुछ याचिकाओं में बिल्कुल दम नहीं था और उन्हें खारिज करना बिल्कुल सही कदम था. दूसरी बात यह कि कुछ याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद नहीं की गई थी वे विज्ञान के एक्सपर्ट बन जाएं या फिर डॉक्टरों और नीतिनिर्माताओं का रोल अदा करने लगें. उन्हें तो कोविड-19 को लेकर उठाए गए कदमों या काहिली को संवैधानिक अधिकारों और नीतिनिर्देशक सिद्धातों की कसौटी पर कसना था. उन्हें तो संघवाद और राज्यों के उत्तरदायित्वों को लेकर किए जा रहे दावों को परखना भर था. आपको लग सकता है कि यह मांग कुछ ज्यादा ही है. लेकिन पिछले कुछ वक्त से कार्यपालिका और विधायिका के सामने न्यायपालिका के समर्पण के साफ संकेत मिल रहे हैं. कार्यपालिका के सामने जज जिस तरह झुकते दिखे हैं वह अद्भुत है. कश्मीर में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के अंतर्गत थोक में गिरफ्तारियां और सीएए आंदोलन के मामले में हुई बेधड़क गिरफ्तारियों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट का रुख ऐसा था, कि उसे देख कर कई मानवाधिकार वकीलों ने शायद वकालत का पेशा छोड़ने पर विचार करना शुरू कर दिया होगा

कश्मीर के मामले में दायर किए गए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाओं से जिस तरह निपटा गया उसने इंसाफ पाने के सारे कानूनी साधन को एक तरह से अर्थहीन बना दिया है. इसी तरह से राजनीतिक बॉन्ड (इलेक्टोरल बॉन्ड) के मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. हद तो यह हो गई कि भारत के चीफ जस्टिस (पूर्व) अपने ही खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की सुनवाई के लिए बनी कमेटी के चीफ बन कर बैठ गए. 

अर्थशास्त्र में विकास के ऊपर से नीचे पहुंचने यानी ट्रिकल डाउन की थ्योरी भले ही सफल साबित नहीं हुई हो लेकिन न्यायपालिका में यह कारगर साबित होती है. 

अगर सुप्रीम कोर्ट तमाम मामलों से अपने को दूर रखने लगे तो हाई कोर्ट में इस तरह की प्रवृति पैदा होना लाजिमी है. हालांकि हाई कोर्ट के कई जजों ने कार्यपालिका से लोहा लिया है और अपनी जिम्मेदारी निभाई है. मैं ऐसे फैसलों पर जरूर चर्चा करूंगा. 

बहरहाल मूल मुद्दे पर आते हैं. कश्मीर, सीएए और यूएपीए साफ तौर पर राजनीतिक मुद्दे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि इन मुद्दों को हमारे संवैधानिक सिद्धातों के दायरे में ही सुलझाया जाना चाहिए, पर सुप्रीम कोर्ट यह करने में नाकाम रहा. लेकिन कोविड-19 तो गैर राजनीतिक मुद्दा है. इससे पूरे देश की आबादी प्रभावित है. गरीब और हाशिये के लोगों पर तो इसने एक तरह से कहर ही ढा रखा है. सोशल डिस्टेंसिंग का उनके लिए कोई मतलब ही नहीं है, और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं तो दूर की कौड़ी ही है. लॉकडाउन के वक्त तो छोड़ ही दीजिये, सामान्य दिनों में भी उनकी भोजन और दूसरी जरूरतें ठीक से पूरी नहीं हो पाती हैं. इस बात से शायद ही कोई इनकार करे कि कोविड-19 को तुरंत काबू किया जाना चाहिए लेकिन यह भी जरूरी है गरीबों को भोजन और पैसा मिले. उन्हें सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं दी जाएं. कम से कम संकट के इस दौर में तो उन्हें ये चीजें मुहैया करानी ही चाहिए.

इसमें कोई शक नहीं कि पिछले लगभग दो महीने से चल रहे लॉकडाउन का सबसे गहरा असर गरीबों, प्रवासी मजदूरों, बच्चों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, ट्रांसजेंडर्स और यौनकर्मियों पर पड़ा है. पूरी आबादी में इनकी हिस्सेदारी 70 फीसदी है. अगर इस राष्ट्रीय संकट के वक्त भोजन और रोजगार से वंचित इन लोगों के लिए अदालतें अगर कुछ नहीं कर सकी हैं तो साफ है कि ये इन लोगों को इंसाफ देने में नाकाम रही हैं. इसके साथ यह भी साफ है कि वे अपनी भूमिका निभाने में भी पूरी तरह नाकाम रही हैं. 

यह ठीक है कि न्यायपालिका की अपनी सीमा है लेकिन भूख से मर रहे हाशिये के लोगों की सुनवाई करने में इसे न तो आड़ बनाया जा सकता है, और न ही इसे किसी भी तरह न्यायोचित ठहराया जा सकता है. अदालतों का यह रवैया उल्टे यह बताता है कि उसने कार्यपालिका के सामने पूरी तरह समर्पण कर दिया है. यह न सिर्फ संस्थान (न्यायपालिका) की नाकामी है बल्कि यह जजों की भी निजी नाकामी है. 

आज कोविड-19 से पैदा स्वास्थ्य संकट ने जो विकराल रूप धारण कर लिया है, उसका अंदाजा पहले नहीं लगाया जा सकता था. इसलिए इसके शुरुआती दौर में सुप्रीम कोर्ट की हस्तक्षेप करने की हिचकिचाहट समझ में आती है. हालांकि यह भी पूरी तरह सही नहीं है कि अदालत ने दखल नहीं दिया. लॉकडाउन लगने से पहले ही यानी 16 मार्च, 2020 को अदालत ने स्वत: संज्ञान लेकर जेलों के कुछ कैदियों और सुधार गृहों में रहने वाले लोगों को निकालने के लिए निर्देश दिए थे. सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को नोटिस देकर इस पर कदम उठाने को कहा था. 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उच्च स्तरीय कमेटी बनाने का निर्देश दिया था, जो विचाराधीन कैदियों और दोषियों को लॉकडाउन पीरियड में रिहा करने के संबंध में निर्देश दे सकें. शायद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करने के दबाव की वजह से ही बड़ी तादाद में उच्चस्तरीय कमेटियां बनीं और खासी तादाद में कैदियों को रिहा किया जा सका. कैदियों की पर्याप्त संख्या में रिहाई हुई या नहीं इस पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं लेकिन हकीकत यह है कि सुप्रीम कोर्ट के रुख की वजह से राज्य सरकारों को इस मामले में सक्रिय किया जा सका. यह इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि थोड़ी सी न्यायिक सक्रियता क्या कर सकती है. यहां तक कि जब 13 अप्रैल को कैदियों की रिहाई के मामले की सुनवाई हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया (जी हां, निर्देश दिया) कि असम में डिटेंशन सेंटर में रह रहे लोगों को तीन साल में नहीं, दो साल में ही रिहा किया जाए. अब तक डिटेंशन सेंटर से उन्हीं को रिहा किया जाता था, जिन्होंने यहां तीन साल बिताए थे. इसके साथ ही मुचलके की राशि भी एक लाख रुपये से घटा कर पांच हजार रुपये कर दी गई. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निश्चित तौर पर स्वागतयोग्य था. सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम केंद्र सरकार के विरोध के बावजूद उठाया. 

लेकिन ये मामले अपवाद हैं. ज्यादातर मामलों में सुप्रीम कोर्ट अपनी भूमिका निभाने में नाकाम साबित हुआ है. शुरू में कोविड-19 को लेकर एक अनिश्चितता का माहौल था. दुनिया के दूसरे देशों में इस महामारी के स्वरूप और ‘इंतजार करो और देखो’ की नीति की वजह से कोई कदम न उठाने में सुप्रीम कोर्ट की हिचकिचाहट समझ में आती है. लेकिन जब सप्ताह दर सप्ताह यह संकट बढ़ता गया और बड़ी तादाद में लोगों के भूखे रहने, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने की खबरें आने लगीं, तो उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने इसमें दखल देने से इनकार करके न सिर्फ अपना रुख देर से जाहिर किया बल्कि अपनी जिम्मेदारी से भी पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया. अगर स्वत: संज्ञान लेकर जेलों में ठूंसे हुए लोगों को लॉकडाउन पीरियड में रिहा करने का निर्देश दिया जा सकता था तो स्वत: संज्ञान लेकर ही प्रवासी मजदूरों के लिए खाने और उन्हें घर पहुंचाने की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया जा सकता था. लेकिन स्वत: संज्ञान लेने की बात तो छोड़ दीजिये, प्रवासी मजदूरों के मुद्दों को नोटिस में लाए जाने के बाद भी इसे कोई तवज्जो नहीं दी गई. 

अदालतों के काम का आकलन करने के क्रम में कुछ सवाल पैदा होते हैं. पहला, संकट के दौर में खास कर गरीबों के संदर्भ में मूल अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के संबंध में राज्य की क्या जिम्मेदारी बनती है? दूसरा, क्या यह अदालतों का काम है कि वह नीतिगत मुद्दों पर विचार करे, वैज्ञानिक और चिकित्सा एक्सपर्ट की तरह व्यवहार करे और राज्य पर पड़ने वाले वित्तीय असर की चिंता करे? तीसरा सवाल यह है, कि प्रवासी मजदूरों, गरीबों और समाज के हाशिये के लोगों को भोजन, शेल्टर और चिकित्सा और यात्रा सुविधा दिलाने में उसे प्रक्रियागत और ठोस तरीके से क्या कदम उठाने चाहिए थे? 

सामाजिक, आर्थिक अधिकार राज्य की जिम्मेदारी

सबसे जरूरी बात पहले, प्रवासी मजदूरों के लिए सस्ता इलाज, फ्री राशन, फ्री यात्रा और गरीबों के लिए कुछ कैश की व्यवस्था करके सरकार कोई परमार्थ का काम नहीं कर रही है. ऐसा करके वह अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही है. इसे हासिल करना लोगों का हक है. खास कर हेल्थ इमरजेंसी और ऐसी आपदाओं के वक्त. अंतर्राष्ट्रीय समझौतों में ऐसा ही कहा गया है और भारतीय संविधान भी यही कहता है. लोक कल्याणकारी राज्य के ये बुनियादी सिद्धांत है. 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून, 2005, के काफी पहले यानी 1880 से ही अकाल और आपदाओं जैसे संकट के दौर में लोगों को राहत देने के संबंध में कानून बने हुए हैं. 

देश में कई दफा अंतर्राष्ट्रीय दबाव और प्रतिबद्धताओं की कई वजह से ऐसे कानून बनाए गए हैं, जिन्हें बनाने की सरकारों की मंशा नहीं रही थी. सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की वजह से ऐसे कानून बनते रहे हैं, इन्हें लागू करने की मंशा कम ही दिखी है. 2005 में ह्योगो फ्रेमवर्क ऑफ एक्शन के प्रावधानों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून (National Disaster Management Act) पारित हुआ था. चूंकि दुनिया भर में आपदा जोखिमों को कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने इस फ्रेमवर्क को अपनाया था इसलिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून लाया गया. इसी तरह 2015 में जब आपदा जोखिमों को कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्रल ने सेनडाई फ्रेमवर्क को अपनाया और सभी देशों से इस दिशा में काम करने की अपील की तो भारत में 2016 में एक राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना लागू की गई. इस कानून के मुताबिक आपदा प्रबंधन में राहत, बचाव और पुनर्वास के काम आते हैं. यह केंद्र की जिम्मेदारी बनती है कि आपदाओं से नुकसान की भरपाई के लिए फंड मुहैया कराए. 

ऐसे मौकों पर नेशनल एक्जीक्यूटिव कमेटी और स्टेट एक्जीक्यूटिव दोनों को मिल कर पीने के पानी, रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए जरूरी सामान, स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रभावित क्षेत्रों में दूसरी सेवाओं की बहाली के लिए संसाधन मुहैया कराना होता है. केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी होती है वह डिजास्टर मैनेजमेंट रेस्पॉन्स फंड और डिजास्टर मैनेजमेंट रिलीफ फंड, नाम से दो अलग-अलग फंड बनाए. लेकिन इतने वर्षों के दौरान इनमें से एक भी फंड नहीं बना. ऐसे वक्त में केंद्र और राज्य दोनों सरकार के पास नौकरशाही की प्रक्रिया से गुजरे बगैर सामान खरीदने का अधिकार होता है. ऐसे वक्त के लिए राष्ट्रीय प्राधिकरण ने न्यूनतम राहत मानक भी निर्धारित कर रखे हैं. ऐसे वक्त में राहत कैंपों में रह रहे लोगों तक पर्याप्त पोषण से भरा भोजन पहुंचाना भी सरकारों की जिम्मेदारी है. ऐसे कैंपों में पोषक भोजन के अलावा बच्चों के लिए दूध और बच्चों को दूध पिलाने वाली माताओं को पोषक भोजन देने के अलावा हर दिन तीन लीटर पीने का पानी भी उपलब्ध कराना अनिवार्य है. पोषक भोजन, पानी और दूध जैसी जरूरी चीजें किसी भी कीमत पर देना अनिवार्य है. इस वक्त यह नहीं देखना होता है कि लोगों को पास राशन कार्ड है या नहीं. 

2008 में जैविक आपदा प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय निर्देश बने थे. इनका भी संबंध महामारी से निपटने उसकी रोकथाम और क्वॉरन्टीन उपायों से है. इस गाइडलाइन में कहा गया है, “ महामारी रोग कानून, 1987 में लागू हुआ था और अब इसे खत्म करने की जरूरत है. इस कानून में जैविक इमरजेंसी के दौरान केंद्र दखल दे, ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. इसके बदले ऐसे कानून की जरूरत है, जो जैविक आतंकवाद और जैव हथियारों से हमले समेत इस तरह की दूसरी जैविक इमरजेंसी के दौरान और आगे की जनस्वास्थ्य जरूरतों को पूरा कर सके. इस कानून के जरिये केंद्र, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को पर्याप्त अधिकार मिलना चाहिए कि वे बगैर किसी बाधा (दंड या अधिकारों का उल्लंघन के मामले के संबंध में) प्रभावित क्षेत्रों को अधिसूचित कर सके. लोगों के आने-जाने पर रोक लगा सके या प्रभावित क्षेत्र में क्वॉरन्टीन कर सके. उनके पास यह अधिकार हो कि वे किसी भी इमारत में घुस कर संदिग्ध चीजों का सैंपल ले सकें और उन्हें सील कर सकें.”

यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब आपदा प्रबंधन कानून, 2005, लागू होने के बाद हुआ. केंद्रीय अधिकारियों के मुताबिक तो अब तक क्वॉरन्टीन से जुड़े मामलों, लॉकडाउन और आने-जाने पर रोक के मामलों के संबंध में कोई कानून नहीं है.

अब भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या मौजूदा लॉकडाउन, लोगों के आने-जाने पर लगे प्रतिबंध और क्वॉरन्टीन वगैरह का कोई कानूनी आधार है भी कि नहीं? केंद्र और राज्य सरकारों के पास आपदा के असर को कम करने के लिए सामान्य और व्यापक अधिकार हैं. वह इसके लिए निर्देश जारी कर सकती हैं लेकिन मौजूदा दौर में कोरोनावायरस संक्रमण को काबू करने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, वह किसी खास कानूनी अधिकार के तहत नहीं उठाए गए हैं. एक अहम सवाल ये है, कि क्या ये कानून की कसौटी पर कहीं टिकते भी हैं, या नहीं? फिर भी चलिए हम यह मान कर आगे बढ़ते हैं कि लॉकडाउन, क्वॉरन्टीन वगैरह कानूनी तौर पर मान्य हैं. 

किसी भी परिस्थिति में आपदा के दौरान गरीबों की देखभाल की जिम्मेदारी का कानून में स्पष्ट तौर पर जिक्र है. भोजन, हेल्थकेयर और शेल्टर हासिल करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है. हालांकि संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि लोगों को जीवन और आजादी से वंचित नहीं रखा जा सकता और इसके लिए किसी कानूनी प्रक्रिया की जरूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इसकी व्यापक व्याख्या की है. इसके मुताबिक मनुष्य का जीवन सिर्फ एक ‘जीव के तौर पर अस्तित्व’ बना कर रखने तक ही सीमित नहीं है. उसे मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है. इसमें शेल्टर यानी आश्रय हासिल करने का अधिकार भी शामिल है. ओलगा टेलिस बनाम बीएमसी (1985 3 SCC 545), चमेली सिंह (1996 2 SCC 549), पीयूडीआर PUDR (AIR 1982 SC 1473) केस में जीविका के अधिकार, पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति (1996 4 SCC 37), में स्वास्थ्य का पर्याप्त अधिकार, आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (2001 2 SCC 62) मामले में पीने के साफ पानी के अधिकार (2001 2 SCC 62) और भोजन के अधिकार आदि ऐसे मामले में हैं, जिनमें अदालतों में बहस हुई है और फैसले दिए गए हैं. लिहाजा लोगों की देखभाल राज्य की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी ही नहीं है, बल्कि इन जरूरी चीजों के लिए राज्य से मांग करना लोगों का अधिकार भी है. 

दरअसल आपदा के दौरान लोगों की सुरक्षा और उन्हें राहत देने की जिम्मेदारी राज्य की है. यह एक स्वीकार्य कानूनी सिद्धांत है. और यह उसी समय से मान्य है, जब ग्रोशियस ने 16वीं सदी में इसकी उद्घोषणा की थी. Levine v. Milne Citing (424 US 577) और Dandridge (39 USA 471) के मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कल्याणकारी लाभ हासिल करना मौलिक अधिकार नहीं है, और न केंद्र (संघीय) और राज्य सरकारों पर कोई संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वे न्यूनतम मदद की गारंटी दें. लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि भारत में हम इस अमेरिकी मॉडल का अनुसरण नहीं करते, जो यह कहता है कि कल्याणकारी लाभ हासिल करना लोगों का अधिकार नहीं है. 

भारत में अदालतों के कम से कम 300 ऐसे फैसले होंगे, जिनमें बार-बार यह कहा गया गया है कि भारत कल्याणकारी राज्य है. इनके अलावा बड़ी तादाद में नीति-निर्देशक सिद्धांत हैं, जो कानून बन चुके हैं. और इस तरह ये अधिकार के तौर पर लागू होने वाले कानून में तब्दील हो चुके हैं. इनमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट, नरेगा, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा का कानून, वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और कल्याण से से जुड़ा कानून, हाथ से मैला साफ करने का काम रोकने से जुड़ा कानून, अनुसूचित जनजाति और पारंपरिक वन निवासी (वनाधिकार कानून) कानून समेत, दलितों, महिलाओं और बच्चों के संरक्षण से जुड़े तमाम कानून शामिल हैं. हालांकि इन कानूनों को अब तक पूरी तरह लागू न किए जाने का मामला अलग बात है. लेकिन कानून के शासन के तौर पर संविधान और कई तरह के कानूनों की बुनियाद होने की वजह से कल्याणकारी राज्य का अस्तित्व अपने आप सिद्ध हो जाता है.

मैं एक और तर्क रखना चाहता हूं. अगर भोजन का अधिकार, पेयजल का अधिकार और जीविका का अधिकार कानून के जरिये बाध्यकारी न होकर नीति-निर्देशक सिद्धातों की तरह ही माने जाएं तो भी पब्लिक इमरजेंसी के दौरान ये मौलिक अधिकार का स्वरूप और मजबूती ले लेते हैं. जिस तरह से आपदा से निपटने के क्रम में कुछ नागरिक आजादी और मैलिक अधिकारों में कटौती की जा सकती है, उसी तरह से ऐसे वक्त में कई नीति-निर्देशक सिद्धांत मौलिक अधिकार का स्तर और स्वरूप हासिल कर लेते हैं. ऐसे वक्त में हेल्थकेयर, भोजन और पेयजल की सुविधा हासिल करना मौलिक अधिकार का स्वरूप ले लेता है. 

इतालवी सिद्धांतकार जियोर्जी अगमबेन के एक सिद्धांत के मुताबिक ‘अपवाद की स्थिति’ में राज्य अपनी ताकत हासिल कर लेता और इसे बढ़ाता भी है. खास कर आपातकालीन हालात में. 

वे बताते हैं कि कैसे अपवाद की स्थिति लंबे वक्त तक चलते रहने के दौरान आम नागरिकों को नागरिकता और व्यक्तिगत अधिकारों से वंचित किया जाता है. अपवाद की स्थिति में सरकार अतीत की तुलना में अपनी ताकत और अधिकारों का और विस्तार कर लेती है. और इस बढ़े हुए अधिकार की वजह से कानूनी और गैरकानूनी, सार्वजनिक और निजी का फर्क धूमिल हो जाता है. 

यह स्थिति तब आती है जब सरकारें ऐसे संकट के वक्त अपने अधिकार बढ़ा लेती है. ऐसे अपवाद की स्थिति घोषित करने के लिए सरकार लोगों के बीच इस चीज को मुद्दा बनाती है कि देखिये यह होना है. नागरिकों से कहा जाता है कि पहले से सरकार को जो अधिकार मिले हैं उनमें इसलिए इजाफा किया गया है ताकि नागरिकों की सुरक्षा हो सके. देश और इसमें रहने वाले नागरिकों की बेहतरी हो सके. 

ऐसे हालात में देश में रहने वाले नागरिकों का कोई वैधानिक दर्जा नहीं रह जाता है. जैसा कि अगमबेन कहते हैं, वे सिर्फ मनुष्य बन कर रहते हैं. उनका कानूनी दर्जा खत्म हो जाता है. लोगों को न सिर्फ नागरिकता से वंचित कर दिया दिया जाता है, बल्कि अपने जीवन के बारे में फैसला लेने का अधिकार भी उनसे छीन लिया जाता है. वे कैदियों की तरह रहते हैं. यह स्थिति वैसे राज्यों जैसी होती है जहां कोई बड़ा सत्ताधारी उनकी जिंदगी को नियंत्रित कर रहा हो. 

नागरिकों को कहा जाता है कि राज्य के अधिकार और ताकत में ये बड़े परिवर्तन उनकी भलाई के लिए जरूरी थे, इसलिए किए गए. हालांकि ऐसी स्थिति में इस स्थिति को लागू करने वाले व्यक्ति और उसकी सरकार अपने ही बनाए कानून से छूट पाने का अधिकार हासिल कर लेती है. 

जिन नागरिकों की ओर से राज्य अपने अधिकारों का इस्तेमाल करता है, उन्हें इमजरेंसी के दौरान नीति-निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने पर जोर देने का पूरा अधिकार है. क्योंकि यह असाधारण समय होता है. 

यह सही है कि ऐसी स्थिति में जिसे अपवाद की स्थिति (states of exception) कहते हैं, में नागरिक आजादी में कटौती कर दी जाती है. लेकिन कानून के हिसाब से ऐसे वक्त नागरिक में कटौती करने से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले मानवाधिकार (जैसे भोजन और पानी का अधिकार) मौलिक अधिकार में तब्दील हो जाते हैं. ये नकारात्मक अधिकार नहीं बल्कि सकारात्मक अधिकारों में तब्दील हो जाते हैं. ऐसे में राज्य इन मानवाधिकारों को बरकरार रखने के लिए बाध्य हो जाते हैं. ऐसा करने में नाकामी संविधान को पूरी तरह नकारने जैसा होगा. इसे कोई भी न्यायिक व्यवस्था स्वीकार नहीं कर सकती. लिहाजा यात्रा करने, इधर-उधर घूमने और अपने पेशे को जारी रखने का लोगों का मौलिक अधिकार/आजादी छीना जाता या सीमित किया जाता है (जैसा कि इस वक्त हो रहा है). तो नीति-निर्देशक सिद्धांत मसलन भोजन का अधिकार, आश्रय का अधिकार, स्वास्थ्य सुविधाओं के अधिकार मौलिक अधिकार में तब्दील हो जाते हैं, जिसकी रक्षा करने के लिए राज्य बाध्य हैं. राज्यों का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह जिस तरह अन्य मौलिक अधिकारों में हनन की स्थिति में लोगों को अदालत तक जाने की सुविधा मुहैया कराती है, वैसे ही इन अधिकारों के हनन के स्थिति में हाई कोर्ट या सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाने देने की सुविधा मुहैया कराए. लेकिन यही वह स्थिति है जहां सुप्रीम कोर्ट और दूसरे हाई कोर्ट असफल होते दिखते हैं.

साधारण वक्त में संविधान नि:संदेह काफी महत्वपूर्ण होता है लेकिन संकट के समय में ही संविधान और उसे लागू करने के तरीकों की परीक्षा होती है. यही वजह है इस मौजूदा संकट में सुप्रीम कोर्ट का नाकाम रहना ज्यादा ध्यान खींचता है. 

न्यायिक शक्ति 

दो सवाल खड़े होते हैं. क्या न्यायपालिका को यह अधिकार है कि वह कार्यपालिका को यह बताए कि उसे क्या करना चाहिए? आखिर उसके अधिकार या ताकत का विस्तार कहां तक जा सकता है? दूसरा सवाल यह है, कि ऐसे वक्त में न्यायपालिका क्या कर सकती थी? 

सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह कह चुका है कि वह कार्यपालिका को अपना ज्ञान नहीं देगी. वह नीतिगत मसलों पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता. दूसरी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट कोई मेडिकल या वैज्ञानिक एक्सपर्ट नहीं है और न अर्थशास्त्र का ज्ञाता. 

पहली बार में यह समझदारी की बात लगती है लेकिन ऐसा करना पूरी तरह न्यायिक समीक्षा को छोड़ देना जैसा है. आइए देखें कि पिछले कुछ सालों के दौरान सुप्रीम कोर्ट का फैसला देने का अधिकार कैसा रहा है. कुछ उदाहरणों पर गौर करें. सुप्रीम कोर्ट ने जब देखा कि विदेशियों की ओर से भारतीय बच्चों को गोद लेने के मामले में कानून अपना काम ठीक से नहीं कर रहा है तो इसने इस संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए (Laxmikant Pandey AIR 1987 SCC 232). डी के बसु के केस में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तार हुए व्यक्ति और आरोपी के अधिकार के बारे में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे. इसी तरह विसाखा केस (1997 6 SCC 241) में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न के मामले में काफी प्रभावी दिशा-निर्देश जारी किया. सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि यौनकर्मियों के बच्चों को किस तरह से शिक्षा दी जाए (Gaurav Jain AIR 1990 SC 292). शीर्ष अदालत ने यह निर्देश भी दिया कि 15 साल से ज्यादा पुराने वाहनों को हटा दिया जाए. अदालत का यह निर्देश पूरी तरह वैज्ञानिक था कि वाहनों में सीएनजी गैस का इस्तेमाल कैसे हो. आजाद रिक्शाचालक केस (AIR 1981 SC 14) में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक को निर्देश दिया कि वह रिक्शाचालकों को एडवांस लोन दे. साथ ही कर्ज के भुगतान के संबंध में भी उसने पूरी स्कीम की रूपरेखा रखी. कॉमन कॉज केस (1996 1 SCC 753) में इसने यह बताया कि कैसे खून इकट्ठा किया जाए और कैसे यह ट्रांसफ्यूजन के दौरान पैदा होने वाले खतरे से दूर रहे. यह पूरी तरह से मेडिकल साइंस में दखल देने जैसा था. 

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेशनल कॉलेजों में फीस स्ट्रक्चर पर विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किया. सेव लाइफ फाउंडेशन केस में (2016 7 SCC 194) में हादसों के दौरान लोगों की जान बचाने में मदद करने वाले नागरिकों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने दिशा निर्देश दिए. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नदियों को जोड़ने की परियोजना लागू करने के निर्देश दिए. नीतिगत विषयों पर इस तरह के निर्देश देने से अचानक ही यह देश की सबसे अहम परियोजना बन गई.

इसलिए इस तथ्य से आंख न फेरें कि जब भी सुप्रीम कोर्ट चाहता है यह नीति तैयार करता है (चाहे वो वैज्ञानिक मामले हो आर्थिक या कुछ और), और जब वह ऐसा नहीं करना चाहता है तो इस मंत्र का जाप करने लगता लगता है कि हम नीतिगत मसलों में हस्तक्षेप नहीं करते. मैं आपको सैकड़ों उदाहरण गिना सकता हूं.

क्या ये मामले सिर्फ विधायिका या कार्यपालिका के लिए नहीं थे? कई बार, सुप्रीम कोर्ट ने नीतिगत मसलों में हस्तक्षेप न करने के बारे में कहा है लेकिन यह भी जाहिर किया है कि जब भी मनमाने ढंग से कोई नीति बनाई जाएगी या मौलिक अधिकारों का हनन होगा वह हस्तक्षेप करेगा. 

संवैधानिक अदालतों का मकसद ही है कि वे विधायिका और कार्यपालिका के फैसलों पर निगरानी रखें. इसे ही न्यायिक समीक्षा कहा जाता है.

अगर आज सिर्फ बेहद सनसनीखेज सरकार समर्थक इलेक्ट्रॉनिक टीवी चैनलों को ही देखें और सिर्फ ट्वीटर को ही खबरें हासिल करने का स्त्रोत बना लें तो पता चल जाएगा कि देश में भुखमरी की कितनी बड़ी समस्या है और कार्यपालिका ने किस तरह से प्रवासी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया है.

ये बेहद अहम मुद्दे थे, जिन पर सुप्रीम कोर्ट को गौर करके स्वत: संज्ञान लेना था. जैसे ही यह संकट शुरू हुआ सुप्रीम कोर्ट को इस पर तुरंत स्वत: संज्ञान लेना चाहिए था. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में तमाम निर्देश दे सकता था. सॉलिसीटर जनरल जो कह दे उसे मान लेने के बजाय वह प्रवासी मजदूरों के बारे में किए जा रहे दावों की जांच के लिए स्वतंत्र अधिकारियों की नियुक्ति कर सकता था. भले ही दावे शपथ पत्र के जरिये किए गए हों. इस समय एक सक्रिय सुप्रीम कोर्ट की जरूरत थी. 

सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील होकर नीतिगत फैसलों में हस्तक्षेप किए बिना प्रवासी मजदूरों की समस्याओं पर आदेश जारी कर सकता था. इसके लिए न तो डॉक्टर होने की जरूरत थी, और न ही वैज्ञानिक होने की. 

सबसे पहले अदालत को कोर्ट की मदद के लिए एक एमीकस क्यूरी की नियुक्ति करनी चाहिए थी (याचिकाकर्ता को हटाए बगैर). सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में ऐसा किया है. एमीकस क्यूरी स्वतंत्र रूप से सरकार के दावों की जांच करता और कोर्ट की मदद करता. सुप्रीम कोर्ट संविधान के एक स्वतंत्र प्रहरी के तौर पर दृढ़तापूर्वक काम करे, इसके लिए यह जरूरी कदम होता. 

दूसरे कदम के तौर पर अदालत को स्वतंत्र पर्यवेक्षक/कमेटियों को नियुक्त करना चाहिए था जो अलग-अलग जगहों पर जाकर सरकार के दावों की जांच करती. संवैधानिक अदालतों ने पहले भी इस तरह का कदम उठाया है. 

28 फरवरी, 1982 में सुप्रीम कोर्ट ने एक पत्र के आधार पर हरियाणा की खदानों में आयुक्तों को यह देखने के लिए भेजा था कि क्या वहां सचमुच बंधुआ मजदूर काम कर रहे हैं. कमिश्नरों ने अपनी जांच में इसकी पुष्टि की और फिर देश में चर्चित बंधुआ मजदूरी मुक्ति का केस चला. पिछले कई दशकों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से तथ्यों की जांच करने का ढर्रा अपनाया है.

सरकार के दावों की स्वतंत्र जांच का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि क्योंकि कोविड संक्रमण के इस दौर में पूरा देश लॉकडाउन की वजह से लगभग बंद पड़ा था. नागरिकों के लिए यह आसान नहीं था कि वे जगह-जगह जाकर सरकार के दावों की जांच करे और इसकी रिपोर्ट दें. वे सिर्फ सूचनाओं के बारे में किसी घटना के बारे में बता सकते हैं. आज हम ऐसी स्थिति में हैं, जहां पूरा देश लॉकडाउन की चपेट में है. सरकार एक के बाद एक भारी-भरकम दावे कर रही है. जबकि मीडिया लगातार भुखमरी और प्रवासी मजदूरों की अथाह समस्याओं के बारे में लगातार रिपोर्ट कर रहा है. लेकिन कोर्ट न तो मीडिया पर ध्यान दे रहा है और न ही किसी को लॉकडाउन की स्थिति और इसके असर के बारे में जानकारी लेने के लिए नियुक्त कर रहा है. यह बिल्कुल सही वक्त था जब अदालत सरकार के दावों की जांच के लिए स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की नियुक्ति करती. 

अदालत अगर पर्यवेक्षक नियुक्त करती तो माना जाता कि वह सरकार के दावों पर आंखें मूंद कर भरोसा नहीं कर रही है. लेकिन यहां तो अदालत सरकार को शाबाशी देने में लगी है. वह जो कह रही है उसे आंखें मूंद कर अदालत माने चली जा रही है. इसलिए अब तो स्वतंत्र पर्यवेक्षक बहाल करने का सवाल ही नहीं उठता. 

कम से कम सुप्रीम कोर्ट वैसा तो कर सकता था जैसा कर्नाटक हाई कोर्ट ने किया. कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक आदेश देकर विभिन्न जिलों के लीगल सर्विस अथॉरिटीज को कहा कि वह अलग-अलग जगहों पर जाकर लॉकडाउन के असर की जांच करें और रिपोर्ट जमा करें. उन्होंने जगह-जगह जाकर हालात की जांच की और अदालत में रिपोर्ट दाखिल की. इस तरह हाई कोर्ट को वास्तविकता जानने का मौका मिला. उसके बाद उसने सराहनीय आदेश जारी किए. 

सुप्रीम कोर्ट ने 30 मार्च, 2020 सरकार के उस दावे को तुरंत मान लिया, जिसमें उसने कहा था प्रवासी मजदूर तेजी से फैल रही फेक न्यूज़ से प्रभावित होकर अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं. 4 अप्रैल 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने फिर सरकार के उस दावे को मान लिया कि सड़कों पर अब एक भी प्रवासी मजदूर नहीं है. लेकिन एक महीने बाद (जब कुछ और अखबारों और दूसरे समाचार चैनलों को लोगों ने देखना शुरू किया) पता चला कि सड़कों पर प्रवासी मजदूर अब भी पैदल चल रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में कुछ नहीं कर सकता और याचिका खारिज कर दी. 

जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया कि राशन कार्ड से महरूम बड़ी तादाद में लोगों को अनाज नहीं मिल रहा है तो वह बड़ी आसानी से यह निर्देश दे सकता था कि सभी गरीबों के लिए भोजन सुनिश्चित किया जाए. यह कोई नीतिगत मामले में हस्तक्षेप की बात नहीं होती. गरीबों को खाना मिलना संविधान के आर्टिकल 21 का उल्लंघन और जीवन के मौलिक अधिकार का हनन है. 

सुप्रीम कोर्ट को आखिर में रेलवे को यह निर्देश देना पड़ा कि प्रवासी मजदूरों से कोई किराया न लिया जाए. संकट के वक्त एक संवैधानिक अदालत से ऐसी ही अपेक्षा की जाती है. 

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर 1382 (2018 18 SCC 777) जेलों की अमानवीय परिस्थिति के बारे में सरकार को निर्देश दिया था. इसमें सरकार से सुप्रीम कोर्ट को जज की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाने को कहा गया था, जो जेलों की स्थिति सुधारने के लिए सिफारिशें दे सके. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को अगले आदेश देने तक सक्रिय रखा. वास्तव में जैसा कि इस पेपर में पहले भी इस बात की चर्चा की गई है कि कोविड संकट शुरू होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने कैदियों के बारे में आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में बड़ी संख्या में एक ही जगह रखे गए कैदियों को अस्थायी रिहाई का आदेश दिया. 

सुप्रीम कोर्ट को एक और कदम उठाना चाहिए था. शीर्ष अदालत को कम से कम सरकार को विभिन्न मामलों में जिम्मेदार बनाने का आदेश जरूर देना चाहिए था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस अधिकार का लगातार इस्तेमाल किया है. कई बार अनिवार्य निर्देश जारी कर कई बार जोर देकर, दबाव डाल कर और सरकार को शर्मसार कर. अदालत किसी मुद्दे को जिंदा रख कर और उस मुद्दे पर उसे जवाबदेह बना कर सरकार को शर्मसार करती है ताकि वह समस्या के हल के लिए कदम उठाए. अदालत बार-बार सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगती है. किसी मामले में जो हो रहा होता है उसकी निगरानी के लिए स्वतंत्र आयोग गठित करने के लिए कहती है. सरकारी अधिकारियों और वकीलों को याचिकाकर्ता के वकीलों और सिविल सोसाइटी से जुड़े समूहों के साथ मिल कर हल निकालने के लिए कहती है. ऐसे कदम सुझाती है, जिसे सराकर के लिए स्वीकार करना या खारिज करना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि कई उच्च न्यायालयों ने इस मैजूदा संकट के वक्त पहल की और इसके शानदार नतीजे निकले.

अदालत की ओर से धीरे-धीरे दबाव डालने का क्लासिक उदाहरण पीयूसीएल की ओर से भोजन के अधिकार की बहाली के लिए दाखिल याचिका है. पीयूसीएल ने यह याचिका 2001 में दाखिल की थी. इसके आधार पर 13 साल बाद यानी 2014 में भोजन के अधिकार का कानून लागू हुआ. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने कई आदेश जारी किए जिसने बड़े पैमाने पर गरीबों की मदद की. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार नियमित अंतराल पर कानून न होने के बावजूद कई निर्देश जारी किए (कई बार राज्य और केंद्र सरकारों को सकुचाते हुए इन निर्देशों का पालन करना पड़ा) . सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान मिड डे मील, आंगनबाड़ी स्कीम, मातृत्व लाभ और भुखमरी से मौतों के मामले में निर्देश जारी किए. नीतियां कानूनी अधिकारों में तब्दील हुईं और खाद्यान्न और पूरक पोषाहार का न्यूनतम आवंटन सुनिश्चित हुआ. इन मुद्दों पर विस्तृत निर्देश दिए गए थे. कई बार महत्वपूर्ण ‘अंतरिम आदेश’ पारित किए गए. 

उदाहरण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम आदेश पारित किए जैसे – 1. प्राइमरी स्कूलों में दोपहर में पका हुआ भोजन देने का आदेश. 2. पीडीएस के एक हिस्से के तौर पर अंत्योदय योजना के तहत वंचित परिवार को हर महीने बेहद सस्ते (सब्सिडी) मूल्य पर अनाज देने का आदेश. 3. संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (भारत का सबसे बड़ा ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, बाद में यह रोजगार गारंटी एक्ट बन गया) के लिए संसाधन दोगुना करने का आदेश. 4. समेकित बाल विकास सेवाओं (ICDS) के यूनिवर्सलाइजेशन का आदेश. इसके अलावा भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर विकेंद्रीकरण का आदेश. इसके तहत सरकारी कार्यक्रमों में स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित की गई (विस्तृत जानकारी के लिए भोजन के अधिकार अभियान की वेबसाइट देखें) .

सुप्रीम कोर्ट के आदेश लागू हो रहे हैं या नहीं इसकी निगरानी के लिए उसने स्वतंत्र आयोग नियुक्त किए, जिसने कोर्ट को इस बारे में रिपोर्ट दी. और आखिरकार खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद यह याचिका निपटाई गई. फिर अदालत, याचिकाकर्ताओं, आयुक्तों और भोजन के अधिकार अभियान को अभी बहुत कुछ करना है. हालांकि इस दिशा में जमीनी स्तर पर एक संतोषजनक सफलता तो मिली ही है. 

यह सिर्फ एक उदाहरण था कि सुप्रीम कोर्ट अपने अधिकार का इस्तेमाल कर किस तरह करोड़ों लोगों की जिदंगी बेहतर बना सकता है. लेकिन दुर्भाग्य से उसका यह उत्साह गायब है. आइए देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कोविड से जुड़े मामलों में क्या किया. 

सुप्रीम कोर्ट और कोविड से जुड़े मामले 

मार्च 2020 से ही कोविड-19 के असर को लेकर कई लोगों और संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया इनमें से कई याचिकाओं में वित्तीय आपातकाल घोषित करने की मांग की गई थी. लेकिन इस मांग में कोई दम नहीं था. कुछ दूसरी ऐसी याचिकाएं थीं, जिनके निपटारे के लिए उच्चस्तरीय मेडिकल और दूसरी विशेषज्ञता की जरूरत होती है. सुप्रीम कोर्ट के पास यह नहीं है इसलिए उससे इन याचिकाओं की सुनने की अपेक्षा भी नहीं थी. दूसरी ओर, कई ऐसे मुद्दे उठाए गए जिन पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर सकता था और उससे यह सुनवाई करनी भी चाहिए थी. लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रहा. 

सुप्रीम कोर्ट का बुनियादी रुख यही रहा कि सरकार बहुत अच्छा काम रही है इसलिए कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट यह कहता रहा कि ये नीतिगत मामले हैं और उसे इसमें दखल नहीं देना चाहिए. 

सरकार जो कुछ भी कहती रही, सुप्रीम कोर्ट उसे बड़ी श्रद्धापूर्वक सुनता रहा. खास कर सॉलिसीटर जनरल की कही गई बातों को. जब बहुत जोर दिया जाता है तो सुप्रीम कोर्ट केंद्र से अनुरोध के लहजे में कहता है कि वह याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार करे. इसके लिए न तो समय सीमा निर्धारित की जाती है और न कोई निर्देश दिया जाता है कि किसी मुद्दे पर विचार करते वक्त किन पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है. इस बारे में न तो कोई चिंता जताई जाती है और न कोई सवाल पूछा जाता है और इस तरह याचिका अपनी स्वाभाविक मौत मर जाती है.

आइए जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट कोविड-19 से जुड़े कुछ अहम मुद्दों से कैसे निपटा. 

प्रवासी मजदूर कानून (Migrant Labour Act) के तहत सभी प्रवासी मजदूरों का रजिस्ट्रेशन जरूरी होता है. लेकिन अनुभव बताता है कि दस फीसदी मजदूरों का भी रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है. इनमें से ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर हैं और ये कंस्ट्रक्शन साइटों, ईंट भट्ठों जैसे उद्योगों में काम करते हैं. कमाने के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले इन मजदूरों के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है. भारत में कितने प्रवासी मजदूर हैं इस बारे में तो कोई पक्का आंकड़ा ही नहीं है. लेकिन रिसर्च एंड इनफॉरमेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज के प्रोफेसर अमिताभ कुंडू ने 2011 के एनएसएसओ सर्वे और भारत के आर्थिक सर्वेक्षण के आधार पर अनुमान लगाया है कि 2020 में ऐसे प्रवासियों मजदूरों की संख्या कम से कम साढ़े छह करोड़ होगी. 

एक मोटे अनुमान के मुताबिक इनमें से 30 फीसदी अस्थायी और अन्य 30 फीसदी स्थायी तौर पर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 2019 की स्टडी का आकलन है कि बड़े शहरों की 29 फीसदी आबादी दिहाड़ी मजदूरों की है. 

जाहिर है यह आबादी अपने घरों को लौटना चाहती होगी. केंद्र और राज्य सरकारें प्रवासी मजदूर कानून को लागू करने में पूरी तरह नाकाम रही है. लिहाजा केंद्र सरकार को प्रवासी मजदूरों की इस समस्या के बारे में पता होना चाहिए था. लेकिन 24 मार्च, 2020 को अचानक किया गया लॉकडाउन प्रवासी मजदूरों के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हुआ. लॉकडाउन का इस तरह से ऐलान करने से लगा कि सरकार ने पहले से इसकी तैयारी कर रखी होगी. जबकि 24 मार्च से काफी पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया था. फ्लाइट्स रोक दी गई थीं. भारत में वायरस फैल गया था. इस बीच लोगों से बालकनी में खड़े होकर ताली बजवाने का तमाशा भी हुआ. कुछ राज्यों ने इस समय तक लॉकडाउन भी लागू कर दिया था. 

इससे काफी पहले 31 जनवरी, 2020 को केंद्र सरकार ने अलग-अलग तरह के पीपीई के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. मार्च के पहले सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने काम शुरू किया था. लेकिन बिल्कुल सीमित तरीके से. सिर्फ बेहद जरूरी सुनवाइयां हो रही थीं. इस वक्त कोई भी काबिल सरकार होती तो वह इस संकट के दौर में मजदूरों के अपने घरों की ओर लौटने के मुद्दे को भांप लेती और उस हिसाब से तैयारी करती. अगर सरकार 37 दिनों के बाद यानी कोरोना वायरस संक्रमण के पूरी तरह फैलने के बाद मजदूरों को घर जाने की इजाजत दे सकती थी तो वह 24 मार्च से भी ऐसा कर सकती थी. ये ऐसे सवाल हैं, जिन्हें कोर्ट को केंद्र सरकार से कहना चाहिए था. आइए देखते हैं कि कोर्ट ने क्या किया.

25 मार्च 2020 से हजारों प्रवासी मजदूर अपने घर जाने लिए सड़कों पर उतर पड़े. 26 मार्च को अलख श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर कहा कि बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूरों सड़कों पर पैदल चलते हुए हजारों किलोमीटर दूर अपने गृह राज्यों को जा रहे हैं. लिहाजा उन्होंने सरकार के शेल्टर हाउसों में भेज कर भोजन, पानी और दवा मुहैया कराना चाहिए. इसी तरह की एक और याचिका दायर की गई. दोनों याचिकाएं सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास 30 मार्च को आईं. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस बारे में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया. 31 मार्च, 2020 को सरकार की ओर से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल हुई और इसके बाद मामले की सुनवाई हुई. सरकार की ओर से दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में कहा गया कि कोरोना वायरस संक्रमण से निपटने के लिए सरकार ने अस्पतालों को तैयार करने समेत अन्य तैयारियां शुरू कर दी थीं.

इस बीच, 29 मार्च को केंद्र सरकार ने एक निर्देश जारी किया कि प्रवासी मजदूरों को सड़कों पर न जाने दिया जाए. उन्हें राज्य सरकार के शेल्टर हाउसों में रखा जाए और वहीं उन्हें भोजन-पानी वगैरह दिया जाए. केंद्र सरकार ने कहा कि सिर्फ छह लाख प्रवासी मजदूरों को सरकार के आश्रय स्थलों में रखा गया है. और 21 लाख लोगों को भोजन दिया गया है. दूसरे, करोड़ों प्रवासियों का क्या हुआ? इस बारे में सुप्रीम कोर्ट को पूछना चाहिए था लेकिन उसने सरकार से यह सवाल नहीं किया.

लेकिन 31 मार्च सुबह 11 बजे सॉलिसीटर जनरल ने बड़े ही अविश्वसनीय ढंग से यह बयान दिया कि सड़कों पर अब एक भी प्रवासी मजदूर नहीं चल रहा है. सरकार के स्टेटस रिपोर्ट में कहा गया था कि प्रवासी मजदूर फेक न्यूज के जरिये पैदा दहशत की वजह से अपने घरों की ओर रुख कर रहे हैं. यह अचंभित करने वाला दावा था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस बयान को स्वीकार कर लिया. उस पर तुर्रा यह है कि कोर्ट ने इस मामले में सरकार का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार ने सभी प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं. 

इसके बाद सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि 24 घंटे के अंदर प्रशिक्षित काउंसिलर हरेक राहत कैंप और शेल्टर होम का दौरा करेंगे. लेकिन एक महीने के बाद तक इन कैंपों में कोई काउंसिलर नहीं पहुंचा. प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित किसी भी तरह का कोई काउंसिलर लोगों को वहां नहीं दिखा. मामले की सुनवाई 7 अप्रैल तक टाल दी गई. 

इसके बाद इसी याचिका में एक आवेदन लगाया गया, जिसमें अदालत से यह कहा गया कि सरकार होटल, रिसॉर्ट को तात्कालिक तौर पर अपने कब्जे में ले ले ताकि इनमें प्रवासी मजदूरों को ठहराया जा सके. सरकार ने कहा कि वह ऐसा कर रही है और इसके बाद याचिका निपटा दी गई.

आखिर में एक और याचिका के जरिये अतिरिक्त आवेदन देने की वजह से यह मामला 27 अप्रैल, 2020 को सुप्रीम कोर्ट के सामने एक बार फिर आया. अदालत ने याचिका यह कर निपटा दी कि केंद्र सरकार याचिका में दिए गए सुझावों पर गौर करेगी और प्रवासी मजदूरों को 31 मार्च 2020 को जो अंतरिम राहत दी गई है वही अंतिम राहत के तौर पर बनी रहेगी. लेकिन इस ‘अंतरिम राहत’ में इस बात के सिवा और कुछ नहीं कहा गया था कि केंद्र सरकार जो कर रही है उसे वह करते रहना चाहिए. इस तरह प्रवासियों के मामले में कोर्ट की किताब का पहला अध्याय बंद हो गया. 

दो अप्रैल 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने सांसद महुआ मोइत्रा के लिखे पत्र पर संज्ञान लिया. उन्होंने प्रवासी मजदूरों की स्थिति के बारे में अपने आकलन के आधार पर यह पत्र लिखा था. लेकिन कुछ वजहों से 13 अप्रैल, 2020 को याचिका खारिज कर दी गई. यह स्पष्ट नहीं किया गया कि याचिका क्यों खारिज की गई. इस तरह अध्याय दो भी बंद हो गया. 

3 अप्रैल को एक और याचिका दाता की याचिका सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची. यह याचिका हर्ष मंदर ने दायर की थी. अपने कामकाज की वजह से वह जमीनी हालात के बारे में काफी जानते हैं. इस याचिका में इस मानवीय संकट के दौर में प्रवासी मजदूरों को उनकी मजदूरी देने की बात कही गई थी. 7 अप्रैल को केंद्र से इस पर जवाब मांगा गया था. उस दिन यह कह इस मामले को टाल दिया गया कि जब प्रवासी मजदूरों को खाना दिया जा रहा है तो फिर उन्हें पैसे देने की क्या जरूरत है. शायद इस बात की अनदेखी कर दी गई कि गरीब प्रवासियों को भी चाय पीनी पड़ती है. नहाने और कपड़े धोने के लिए उसे साबुन की भी जरूरत होती है और गांवों में रह रहे अपने परिवार के लिए पैसे भेजने पड़ते हैं. 

खैर, यह मामला 21 अप्रैल को सुनवाई के लिए आया. उस दिन सॉलिसीटर जनरल ने दावा किया कि सभी प्रवासियों का खाना दिया जा रहा है. उन्हें राशन मुहैया कराया जा रहा है. हर्ष मंदर ने इसके जवाब में एक शपथपत्र दाखिल की थी, जिसमें एक नागरिक संगठन SWAN की रिपोर्ट नत्थी की गई थी. इस रिपोर्ट में मजदूरों की वास्तविक स्थिति का जमीनी ब्योरा था. इसमें कहा गया था कि बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूरों को बुनियादी सुविधाएं भी नहीं दी जा रही हैं. लेकिन लगता है कि कोर्ट ने इसे जुबानी यह कह कर टाल दिया कि मजदूरों के बारे में इस तरह के निजी अध्ययन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. खास कर वैसे वक्त में जब सरकार बिल्कुल अलग स्थिति का बयान कर रही है. तो इस तरह से कोर्ट ने वही किया जो वह ऐसे मामले करता है. इसने केंद्र सरकार से कहा कि यह वह मामले को देखे और जहां कदम उठाने की जरूरत हो वहां कदम उठाए. इस तरह एक और याचिका निपटा दी गई. इस तरह अध्याय तीन भी बंद हो गया. 

18 अप्रैल, 2020 को जगदीप छोकर ने एक याचिका दायर कर मांग की प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य जाने दिया जाए और इसके लिए सरकार व्यवस्था करे. यह याचिका सुनवाई के लिए 27 अप्रैल 2020 को आई. उस दिन कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि अगर आपके पास प्रवासी मजदूरों की यात्रा का कोई प्रोटोकॉल है तो उसे रिकार्ड पर रखें. इस बीच, 29 अप्रैल को केंद्र सरकार ने सरकार ने प्रवासी मजदूरों को यात्रा की इजाजत दे दी थी. और इस हिसाब से उसने 1 मई, 2020 को इस प्रोटोकॉल में बदलाव कर दिए थे. फिर चार मई को सुप्रीम कोर्ट में यात्रा के लिए पैसे लिए जाने की शिकायत करते हुए एक आवेदन दिया गया. इसमें कहा गया कि मजदूरों से पैसे मांगे जा रहे हैं. लेकिन कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका निपटा दी कि वह यात्रा के लिए लिये जा रहे पैसे की वसूली के मुद्दे पर विचार नहीं कर सकता. और इस तरह सुप्रीम कोर्ट की किताब का चौथा अध्याय भी बंद हो गया. 

अप्रैल तक यह साफ हो गया था कि यात्रा के दौरान बड़ी तादाद में यात्रियों की थकान और भूख से मौतें हुई हैं. 16 मई को अपने गृह राज्य की ओर जा रहे कुछ प्रवासी मजदूरों की ट्रेन से कट कर मौत हो गई. अलख आलोक श्रीवास्तव ने तुरंत एक आवेदन डाल कर इस मामले और ऐसे ही कुछ हादसों के बारे में कोर्ट का ध्यान खींचा. उन्होंने कहा कि कोर्ट इसमें हस्तक्षेप करे और जिलाधिकारियों को निर्देश दे कि जो लोग पैदल चल कर अपने घरों को जा रहे हैं उनके लिए आश्रय और भोजन की व्यवस्था किया जाए ताकि उन्हें पैदल न चलना पड़े. इस सुनवाई के दौरान एक जज ने कहा कि याचिका में जो कहा गया है वह पूरी तरह अखबारों की रिपोर्ट पर आधारित है. अब यह पूछा जा सकता है कि याचिका दाता लॉकडाउन के दौरान क्या करता. क्या वह एक-एक प्रवासी मजदूर के पीछे-पीछे जाकर देखता कि वह पैदल यात्रा कर रहा है या नहीं? एक जज का रुख तो अलग ही था. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट लोगों को पैदल चलने से कैसे रोक सकता है. सॉलिसीटर जनरल ने अपनी संवेदनहीन स्वभाव के मुताबिक ही कहा कि अगर लोग ट्रेन यात्रा के लिए अपनी बारी आने का भी इंतजार नहीं कर सकते तो सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है? एक चीज पूरी तरह नजरअंदाज कर दी गई कि लोग सड़कों पर पैदल चल कर इसलिए अपने घरों की ओर जा रहे थे कि उन्हें खाना नहीं मिल रहा था. वे इसलिए चल रहे थे कि उनके पास ट्रेन के टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे. वे इसलिए पैदल चल रहे थे कि उन्हें इस बात का भरोसा नहीं था कि आखिर यात्रा के लिए ट्रेन में कब बैठ सकेंगे. खैर अलख आलोक श्रीवास्तव की याचिका खारिज कर दी गई और कोर्ट की किताब का पांचवां अध्याय भी बंद हो गया. 

चलिए, अगर ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ का अधिकतम फायदा भी दिया जाए तो माना जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट को शुरू में लगा होगा कि सरकार अपना काम ठीक से कर रही है. लेकिन सात दिनों में सारी स्थिति स्पष्ट हो गई थी. हमें हालात समझने के लिए उन जगहों पर जाने की जरूरत नहीं पड़ी, जहां जहां से मजदूरों का जत्था गुजर रहा था. अगर उन दिनों कोई अखबारों पर ही एक नजर डाल लेता या सोशल मीडिया में ही झांक लेता या उन न्यूज चैनलों को ही देख लेता जिन पर हम सच्चाई जानने के लिए भरोसा नहीं करते तो भी उसे हालात का पता चल जाता. और आज भी जब ट्रेनों का चलना शुरू हो गया तो भी हजारों मजदूर सड़कों पर पैदल चल कर अपने गृह राज्य की ओर जा रहे हैं. इन मजदूरों को लॉकडाउन पीरियड की मजदूरी नहीं दी गई. राज्य सरकारों ने बहुत कम मजदूरों को खाना दिया. आज भी भले ही केंद्र और राज्य सरकारें चाहें कितने भी दावे करें प्रवासी मजदूरों से ट्रेन का पूरा किराया वसूला जा रहा है. अपने घर जाने की यात्रा के क्रम में 200 लोगों की मौत हो चुकी है. यह विश्वास करना कठिन है कि सुप्रीम कोर्ट को इन चीजों के बारे में मालूम नहीं है. 

लॉकडाउन की वजह से आम लोगों और संगठनों का बाहर जाकर यह पता करना मुश्किल हो गया कि हालात क्या हैं. अब हालत यह है कि अगर बाहर निकल कर हालात का जायजा लेने के बाद रिपोर्ट भी लाते हैं तो इसकी अनदेखी की जाती है. इस बारे में राज्य जो कहता है सुप्रीम कोर्ट उसे मान लेता है. 

जब कोर्ट यह समझता है कि उसकी भूमिका कार्यपालिका की सहायता करना है, जब उसे लोगों की वास्तविकता नहीं दिखती और जब वे न्याय करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने में नाकाम साबित होते हैं, खास कर वे अधिकार जो पिछले चालीस साल से कानून और न्यायिक शक्तियों में निहित हैं तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर ये कोर्ट बने किसलिए हैं? 

अंतर-राज्यीय प्रवासी कामगार (रोजगार और सेवा स्थिति नियमन) कानून, 1979 में एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाने वाले प्रवासी मजदूरों के रोजगार के बारे में स्पष्ट प्रावधान हैं. साथ ही इन प्रावधानों में यह भी स्पष्ट है कि उनकी सेवाओं की स्थिति क्या होंगी. इस कानून के मुताबिक उन प्रतिष्ठानों (फैक्ट्री, दुकान आदि) का रजिस्ट्रेशन जरूरी है, जो इन प्रवासी मजदूरों की सेवाएं ले रहे हैं. इस कानून के सेक्शन 6 में कहा गया है कि बगैर रजिस्ट्रेशन के अंतर-राज्यीय श्रमिकों को रोजगार पर नहीं रखा जा सकता. फैक्ट्री, दुकानों आदि को जब तक अपने रजिस्ट्रेशन का सर्टिफिकेट नहीं मिल जाता तब तक वे इस तरह के अंतरराज्यीय प्रवासी मजदूरों को काम पर नहीं रख सकते. सेक्शन आठ के मुताबिक प्रवासी मजदूरों को काम पर रखने वाले कॉन्ट्रेक्टर के पास लाइसेंस होना चाहिए. इस लाइसेंस में मजदूरों के साथ किए गए अनुबंध का जिक्र होता है. साथ ही वे नियम और शर्तें भी होती हैं जिसके तहत मजदूरों को रखा जाता है. 

इस कानून के तहत यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रवासी मजदूरों को काम देने वाले सभी प्रतिष्ठानों का रिकार्ड रखे. हर एक राज्य में काम के लिए प्रवासी मजदूर मुहैया कराने वाले कॉन्ट्रेक्टर और प्रवासी मजदूरों का रिकार्ड रखना भी जरूरी है. 

सरकार के लिए यह संभव होना चाहिए कि वह किसी भी प्रतिष्ठान में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों की पहचान कर सके और यह सुनिश्चित कर सके कि उसे मजदूरी मिल रहा है या नहीं. हां, लेकिन यह तभी संभव है जब इस कानून को पूरी तरह लागू किया जाए.

प्रवासी मजदूरों के हक में सुप्रीम कोर्ट का सिर्फ एक अच्छा फैसला आया है. सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाई कोर्ट के उस फैसले पर स्टे लगा दिया कि राज्य में बाहर से कोई भी मजदूर अंदर नहीं आने दिया जाएगा, जब तक वह ओडिशा के बाहर, अपनी यात्रा की जगह से कोविड-19 निगेटिव न हो, तब तक वह राज्य में प्रवेश नही कर सकता. ऐसी स्थिति में यह संभव नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे लगा कर सही किया. लेकिन यह सवाल किया जा सकता है कि अगर ओडिशा सरकार के इस फैसले को केंद्र सरकार की जगह किसी प्रवासी मजदूर या सिविल सोसाइटी संगठन ने चुनौती दी होती तो क्या सुप्रीम कोर्ट इसी तरह स्थगनादेश जारी करता? 

इतनी सारी सुनवाइयों के दौरान क्या सुप्रीम कोर्ट क्या केंद्र सरकार से एक बार भी यह नहीं पूछना चाहिए था कि उसने लॉकडाउन लागू करने से पहले प्रवासी मजदूरों के लिए कोई योजना क्यों नहीं बनाई? 

क्या सुप्रीम कोर्ट को एक बार भी यह नहीं पूछना चाहिए था कि 24 मार्च तक संक्रमण सीमित था. इसी दिन लॉकडाउन लगा दिया गया था और मजदूरों को यात्रा करने से रोका दिया गया था तो फिर जब 29 अप्रैल तक संक्रमण पूरी तरह फैल चुका था तो मजदूरों को यात्रा करने की इजाजत कैसे दे दी गई? लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल नही पूछा. ऐसा करके उसने लाखों प्रवासी मजदूरों को नीचा दिखाया. उसने संविधान को भी नीचा दिखाया. 

इसकी तुलना में देखें तो 1975 से 1977 में इमरजेंसी के दौर में कुछ उच्च न्यायालय लोगों को अधिकार के प्रति ज्यादा सक्रिय थे. उस दौरान कर्नाटक, बांबे हाई कोर्ट, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात की अदालतों ने अपने फैसलों से उदाहरण कायम किया था. 

हालांकि अभी के मामले में यह कहा जा सकता है कि उच्च न्यायालय कार्यपालिका के सामने झुकने में सुप्रीम कोर्ट के पद चिह्नों पर ही चले. लेकिन कुछ अपवाद भी रहे. 

3 अप्रैल, 2020 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज के अधिकारियों को पूरे राज्य के आश्रय गृहों में जाकर यह पता करने के लिए भेजा कि वहां उनकी स्थिति कैसी है. वे इस बारे में रिपोर्ट दाखिल करें. इस निगरानी की वजह से राज्य सरकार खुद सक्रिय हुई और उसने इस संबंध में पर्याप्त प्रावधान किए. 

12 मई को कर्नाटक हाई कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों की समस्या के बारे में जो कहा वे इस तरह है-

‘’ प्रवासी मजदूरों को घर जाने के लिए ट्रेन किराये का भुगतान महत्वपूर्ण मुद्दा है. 2 मई, 2020 को रेल मंत्रालय ने जो आदेश दिया था उसके मुताबिक श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था करने वाले राज्य ट्रेन का किराया दे. कर्नाटक में राज्य सरकार की नीति के मुताबिक उल्टे उसे ही श्रमिकों से ट्रेन किराया लेना है. कुछ राज्यों ने अपने यहां काम कर रहे श्रमिकों का किराया देना स्वीकार कर लिया है. 

  1. पहली नजर में प्रवासी मजूदरों के संवैधानिक अधिकारों पर विचार करने पर हमें लगता है कि किसी को इस आधार पर अपने गृह राज्य जाने से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके पास किराये के पैसे नहीं हैं. अगर वे किराया देने की स्थिति में नहीं हैं तो इसलिए कि उनका रोजगार छिन गया है. 
  2. केंद्र सरकार रेल मंत्रालय के जरिये इस मामले को देखे. केंद्र सरकार के गृह सचिव ने 11 मई, 2020 को राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिख कर यह खास तौर पर कहा है कि राज्यों को ज्यादा से ज्यादा विशेष ‘श्रमिक’ ट्रेनें चलाने के लिए केंद्र से सहयोग करना चाहिए ताकि प्रवासी मजदूर जल्दी अपने घरों को पहुंच सके. इस पत्र के आखिरी पैराग्राफ में मुख्य सचिवों से यह भी कहा गया है कि सभी विशेष ‘श्रमिक’ ट्रेनों को ठीक तरीके से रिसीव किया जाए ताकि मजदूरों को स्टेशन से तेजी से और बगैर किसी बाधा के उनके घरों तक पहुंचाया जा सके. अगर प्रवासी मजदूर किराया देने में असमर्थ होंगे तो तेज गति से उनके लिए यात्रा की सुविधा मुहैया कराना असंभव होगा. लिहाजा केंद्र सरकार के अलावा कर्नाटक सरकार को भी इस मुद्दे पर तुरंत कदम उठाने चाहिए और किराया न दे पाने वाले मजदूरों की यात्रा के सवाल पर फैसला लेना चाहिए. 
  3. इस मुश्किल घड़ी में केंद्र और राज्य सरकारों को बड़ी संख्या में सार्वजनिक परियोजनाओं के साथ-साथ निजी परियोजनाओं द्वारा प्रवासी मजदूरों की राहत और योगदान की प्रशंसा करनी चाहिए. इन परियोजनाओं ने सभी राज्यों में इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने और अर्थव्यवस्था को सुधारने में मदद दी है. इस वक्त बहुत बड़ी तादाद में प्रवासी मजदूर दिक्कतों का सामना कर रहे हैं. इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को आगे आकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मजदूर जितनी जल्दी हो अपने गृह राज्यों की ओर लौट जाएं. आदर्श स्थिति तो यह होगी कि जो भी प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्य को लौटना चाहे, उसे इस अवसर से वंचित किया जाए. इस वक्त यह ठीक रहेगा कि राज्य सरकार सभी ट्रेड यूनियनों, नियोक्ता संघों और गैर सरकारी संगठनों की एक बैठक बुलाए और देखे कि क्या उनकी ओर से कोई वित्तीय योगदान मिल सकता है? ताकि किराया दे पाने की स्थिति में प्रवासी मजदूरों का ट्रेन किरायों का भुगतान किया जा सके
  4. आखिर में यह मामला 21 मई, 2020 को सुनवाई के लिए आया. संविधान के अनुच्छेद, 14, 19 और 21 के तहत सुनवाई. इसमें अपने गृह राज्य जाने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए ट्रेन किराया चुकाने के मामले में सुनवाई हुई. उस दिन राज्य सरकार ने अपना लिखित जवाब दाखिल किया. 26 मई को मामले की आखिरी सुनवाई सुनिश्चित की गई. एक बार फिर कोर्ट ने पहली ही नजर में यह माना कि मजदूरों की यात्रा के लिए किराया न देना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है. इस मामले में अदालत का रुख देख कर कर्नाटक सरकार ने 22 मई को ऐलान किया कि अपने गृह राज्यों को जाने वाले मजदूरों का ट्रेन किराया वह खुद देगी. 

15 मई, 2020 को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक आदेश में कहा कि जो प्रवासी मजदूर पैदल चल कर अपने गृह राज्यों को जा रहे हैं उनके लिए राज्य सरकार जगह-जगह टेंट लगाए, चेकपोस्ट बनाए ताकि उन्हें सहूलियत हो. इनमें एक डॉक्टर, पीने का पानी, ओआरएस और ग्लूकोज पैकेट होना चाहिए. इन जगहों पर एक एंबुलेंस तैनात होना चाहिए. मोबाइल टॉयलेट और सेनेटरी पैड डिस्पेंसिंग मशीन भी लगाने के आदेश दिए गए. नेशनल हाईवे पर चलने वाले मजदूरों के लिए खाने की व्यवस्था करने के भी आदेश दिए गए. अदालत ने कहा कि इन मजदूरों को नजदीकी शेल्टर होम में पहुंचाने के लिए नेशनल हाईवे अथॉरिटी की बसों और पुलिस पेट्रोलिंग वाहनों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. मजदूरों के बीच हिंदी और तेलुगू में छपे पर्चे बांटने को कहा गया है, जिसमें नजदीकी शेल्टर होम का पता और अलग-अलग जरूरतों के लिए फोन नंबर लिखा हो. 

अदालत ने नोडल अफसर नियुक्त करने के आदेश दिए और कहा कि हर शेल्टर होम पर एक अफसर निगरानी रखे. यहां तक कि गैर सरकारी संगठनों (NGO) की मदद लेने के लिए भी कहा गया ताकि प्रवासी मजदूरों को खाना, दवाई दिया जा सके. अदालत ने यह सुनिश्चित करने को कहा कि ये सुविधाएं हर शेल्टर होम में मौजूद हों. अदालत ने कहा कि उसके इन आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं इस संबंध में 22.5.2020 तक रिपोर्ट दाखिल की जाए.

उसी दिन मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला दिया. इस फैसले का विस्तार से जिक्र जरूरी है 

  1. “पिछले एक महीने के दौरान मीडिया में प्रवासी मजदूरों की त्रासद स्थिति दिखाई जा रही है, उसे देख कर किसी के लिए भी अपने आंसुओं को रोक पाना मुश्किल है. यह मानवीय त्रासदी के सिवा कुछ नहीं है. जब मार्च 2020 के आखिर में लॉकडाउन का ऐलान हुआ उस वक्त लाखों प्रवासी मजदूर पूरे देश में फंसे हुए थे. ज्यादातर मजदूरों का काम छूट गया था. इऩ लोगों को कोई आश्रय नहीं मुहैया कराया गया और न ही पर्याप्त खाना दिया गया. इन मजदूरों ने अच्छा-खासा इंतजार किया. अंत में वे अपने-अपने गृह राज्यों को जाने के लिए सड़कों पर उतरे. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकार प्राप्त सभी संस्थाओं ने इनकी उपेक्षा की. अखबारों में इनकी त्रासदियों की झकझोर देने वाली खबरें छपी. विजुअल मीडिया ने दिखाया कि लाखों मजदूर सड़कों पर चलने के लिए बाध्य किए गए. अपने सिर पर बोझ लादे बच्चों को पैदल चलाते, भले नागरिकों की ओर से दिए गए भोजन पर किसी तरह प्राण रक्षा करते हुए वे चले जा रहे थे. ऐसा इसलिए हुआ कि सरकार ने प्रवासी मजदूरों की कोई मदद नहीं की. खबरों में यह भी आया कि कुछ लोगों की भूख से मौत हो गई. 
  2. इन मजदूरों की सुरक्षा और बेहतरी का जिम्मा सिर्फ उन राज्यों का ही नहीं जहां के ये रहने वाले हैं. यह उन राज्यों की भी जिम्मेदारी है, जहां ये काम करते हैं. भारत एक कल्याणकारी राज्य है और संविधान का अनुच्छेद 21 सर्वोपरि है. इसलिए मजदूरों के लिए सुरक्षा और भोजन मुहैया कराना बिल्कुल जरूरी है. इस अदालत को यह अच्छी तरह पता है कि कोविड-19 न सिर्फ राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय संकट है. लेकिन यह देखना बड़े दुख की बात है कि झुंड के झुंड प्रवासी मजदूर एक साथ अपने घरों को जाने के लिए पैदल ही सड़कों पर निकल पड़े हैं.इस यात्रा के दौरान कईयों की सड़क हादसों में मौत हो गई. सभी राज्यों के सरकारी प्राधिकरणों को इस दौरान इन प्रवासी मजदूरों तक मानवीय सेवाएं पहुंचाना चाहिए था. 
  3. जिन रास्तों से मजदूर गुजर रहे थे, उनमें कई टोल गेट हैं. इनका इस्तेमाल चेकिंग प्वाइंट की तरह होना चाहिए था. इनमें इनके लिए भोजन, शेल्टर और हेल्थकेयर सुविधाएं की व्यवस्था करने की जरूरत थी. लेकिन यह देखना बड़ा दुखदायी है न तो मजदूरों के गृह राज्यों ने ऐसी की व्यवस्था की थी, और न उन राज्यों ने जहां से ये गुजर रहे थे. ये राज्य इन लोगों को भोजन और ठहरने की जगह भी देने में नाकाम रहे. अगर इन्हें यह मदद कहीं दी भी गई, तो वह बिल्कुल नगण्य थी. 
  4. सबसे पहले तो सभी राज्यों में काम करने प्रवासी मजदूरों से संबंधित डेटा इकट्ठा होना चाहिए. मजदूरों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए उन राज्यों को जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए, जहां ये काम करते हैं. इस दिशा में सभी राज्यों से मिल कर काम करने की अपेक्षा है. इन राज्यों से गरीब वर्गों के लोगों की मदद देने की अपेक्षा की जाती है. इस अदालत को यह पता है कि कल केंद्र सरकार ने रेंटल हाउसिंग सुविधा देने के साथ ही राशन कार्ड के बगैर भी राशन देने जैसे राहत भरे कदम उठाए हैं. 
  5. जिन लोगों को इस मामले में प्रतिवादी बनाया गया है उनसे हम इन सवालों के जवाब मांग रहे हैं. 

 

  1. क्या हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों का सरकार कोई डेटा रखती है? 
  2. अगर वह ऐसा करती है कि हर राज्य में और केंद्र शासित प्रदेश में उनकी संख्या कितनी है. वह कहां के रहने के वाले हैं इस बारे में उसके पास क्या जानकारी है? 
  1. आज की तारीख में हर एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में प्रवासी मजदूरों की संख्या क्या है? 
  2. संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों ने अब तक प्रवासी मजदूरों की क्या मदद की है? 
  3. क्या उन प्रवासी मजदूरों को राज्यों की सीमा पार करने दिया जाता है या फिर उन्हें रोका जाता है. अगर उन्हें रोका जाता है तो क्या उनके लिए भोजन, ठहरने की जगह और चिकित्सा सहायता मुहैया कराई जाती है. 
  4. अपने गृह राज्यों की ओर जाते हुए रास्ते में कितने प्रवासी मजदूरों की मौत हुई है? 
  5. जो मजदूर मारे गए वे किन राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के थे? 
  6. अपने गृह राज्यों की ओर जाते हुए मौत के शिकार हुए प्रवासी मजदूरों के परिवारों को राहत और मुआवजा देने के क्या कदम उठाए गए? 
  7. पूरे देश में कितने राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों को बसों या ट्रेन से उनके गृह राज्य पहुंचाया गया. 
  8. जो प्रवासी मजदूर अपने काम करने की जगह वाले राज्यों में रह गए हैं उन्हें उनके गृह राज्यों तक पहुंचाने लिए क्या कदम उठाए गए हैं. 
  9. क्या लोगों का माइग्रेशन कोविड-19 फैलने की एक वजह बना? 
  10. क्या केंद्र सरकार ने संबंधित राज्यों या केंद्रित शासित प्रदेशों को यह निर्देश दिया है कि वे प्रवासी मजदूरों को अपने गृह राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में ही रोजगार के अवसर मुहैया कराए.

इस बारे में केंद्र और राज्य सरकार दोनों को अपना जवाब दाखिल करना होगा. 

इस बीच गुजरात हाई कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों की त्रासदी पर 11.5.2020 को स्वत: संज्ञान लिया और कहा: 

“6. द इंडियन एक्सप्रेस ने एक खबर छापी है. खबर का शीर्षक है- गुजरात में यूपी के लिए ट्रेन चढ़ने के लिए स्टेशन आए प्रवासी मजदूरों को 19 घंटे इंतजार करना पड़ा’. इससे पता चलता है कि इन मजदूरों को काफी कष्ट उठाना पड़ा. वे अपने घर जाने के लिए बेचैन थे. वे देश के अलग-अलग राज्यों से काम करने आए थे और अपने-अपने गृह राज्य जाना चाहते थे. हम राज्य प्रशासन की ओर से उन प्रवासियों को बस या ट्रेन के जरिये उनके घर पहुंचाने के लिए की जा रही कोशिश की प्रशंसा करते हैं लेकिन उन्हें इस तरह कष्ट उठाना पड़ रहा है. 45 डिग्री तापमान वाली इस भीषण गर्मी में उन्हें इस तरह घंटों कष्ट उठाना पड़ रहा है. 

राज्य प्रशासन, प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था करने और प्रक्रिया की कोई योजना लेकर सामने आए जिससे बस या ट्रेन के लिए उन्हें घंटों इस तरह इंतजार न करना पड़े. 

  1. हमने 11 मई, 2020 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी उस खबर पर भी गौर किया, जिसमें कहा गया था कि मजदूरों को उनके गृह राज्य की ओर जाने से रोकने का कहा गया था. इस खबर का शीर्षक था ‘Stop migrant workers walking home, take them to shelters: DGP’.

इस खबर से ऐसा लगता है कि गुजरात के पुलिस महानिदेशक ने अपने राज्य की पुलिस को सड़कों पर चलते हुए अपने गृह राज्यों की ओर जा रहे प्रवासी मजदूरों को रोक कर उन्हें पास के शेल्टर हाउस ले जाने को कहा है. 

हम यह जानना चाहते हैं कि आज की तारीख तक गुजरात में कितने शेल्टर हाउस चल रहे हैं और वे किन जगहों पर हैं. इन शेल्टर होम्स में भोजन और पानी की व्यवस्था होनी चाहिए. खास कर इस भीषण गर्मी को देखते हुए यह सबसे जरूरी है. हर दिन सड़कों पर खास कर राजमार्गों पर छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सैकड़ों मजदूरों का जत्था यात्रा करता दिख रहा है. उनकी दशा दयनीय है. आज वे सबसे अमानवीय और भयावह दौर से गुजर रहे हैं. हालांकि राज्य सरकार सभी जरूरी कदम उठा रही है लेकिन हमारा मानना है कि प्रवासी मजदूरों की दिक्कतों को कम करने कि लिए कुछ और तरीके अपनाने की जरूरत है. 

  1. राज्य सरकार को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए इस वक्त उसका वास्ता सबसे दबे-कुचले, साधनहीन और समाज के कमजोर वर्ग के लोगों से पड़ा है. वे बुरी तरह डरे हुए हैं. उन्हें कोविड-19 का डर नहीं है. उन्हें इस बात का डर है कि कहीं वे भुखमरी के शिकार न हो जाएं.

ऐसे हालात में उन लोगों में विश्वास बहाल करना और उन्हें आश्वस्त करना राज्य का परम कर्तव्य बन जाता है. दबे-कुचले वर्ग के इन लोगों को यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि सरकार हर संभव तरीके से उनका ध्यान रखेगी. इस समय राज्य सरकार के लिए इस नाजुक समस्या को बहुत सावधानी से निपटाना बेहद जरूरी है. उसे लोगों के मन में यह बात बिठानी होगी उनकी पूरी देखभाल की जाएगी.”

यह मामला 14 मई को सुनवाई के लिए आया. उस दिन राज्य सरकार ने दो लंबी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की. इस पर कोर्ट ने फिर से प्रवासी मजदूरों की त्रासदी को सुनवाई के केंद्र में रखा और 12 मई को कर्नाटक हाई कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश को एक बार फिर सामने कर दिया. इस आदेश को दोबारा सामने रखते हुए उसने राज्य सरकार से कार्यवाही करने को कहा. आखिरकार 22 मई को गुजरात हाई कोर्ट ने एक विस्तृत आदेश जारी किया. 143 पेज के इस आदेश में कई निर्देश थे.

इन निर्देशों में कहा गया था कि रेलवे प्रवासियों के लिए एक तरफ का किराया छोड़ दे या फिर राज्य सरकार यह खर्च वहन करे. यह आदेश काफी प्रासंगिक था. इसमें लचर हेल्थकेयर सुविधाओं को लिए राज्य सरकारों को काफी फटकार लगाई गई थी. साथ ही स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने वाले प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल जिस तरह सिर्फ मुनाफे के लिए काम कर रहे थे उसकी भी कड़ी आलोचना की गई थी. अदालत ने इस आदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़े कई निर्देश दिए थे. 

अदालत की तरह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पैदल चल कर हजारों किलोमीटर दूर अपने घरों की ओर जाने वाले प्रवासी मजदूरों के मामले में स्वत: संज्ञान लिया. 

यह जानना महत्वपूर्ण है कि ऐसे वक्त में हाई कोर्ट क्या कर रहे हैं? हाई कोर्ट इस मामले में राज्यो को आईना दिखा रहे हैं, शर्मसार कर रहे हैं, सच्चाई दिखा कर उन्हें मजबूर कर रहे हैं, और राज्य सरकारों से उनकी ज़िम्मेदारी का हिसाब मांग रहे हैं. वे मामलों को निपटा नहीं रहे हैं, बल्कि जवाब मांग रहे हैं. राज्यों से एक्शन लेने की मांग कर रहे हैं. कई बार वे अनिवार्य निर्देश भी जारी कर रहे हैं, ताकि राज्य अपनी ज़िम्मेदारी से न कतराए. इस मामले को लेकर पूरा देश चिंतित है. असल में इस मामले में देश के अलग-अलग हाई कोर्ट जो कर रहे हैं, वह काम देश के सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए था. 

भोजन और राशन 

लॉकडाउन लगने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था सिर्फ प्रवासी मजदूर ही नहीं बल्कि दिहाड़ी पर गुजारा करने वाले अन्य करोड़ों गरीब और गरीबी रेखा से नीचे रखने वाल लोगों को भोजन और पीने के पानी की जरूरत होगी. बड़ी संख्या में लोग रातोरात बेरोजगार हो गए. कईयों को उनकी पहले की मजदूरी भी नहीं मिली. इसी तरह अपना काम करने वाले, मसलन फेरीवालों आदि का भी यही हाल था. इन लोगों की समस्या कैसे सुलझेगी इस बारे में 23 मार्च 2020 के पीएम के लॉकडाउन भाषण में कुछ नहीं कहा गया. इस भाषण की वजह से बड़ी भीड़ राशन की दुकानों की ओर उमड़ पड़ी और संभवत: इससे कुछ हद तक कोरोना वायरस का संक्रमण फैला. 

महाराष्ट्र में की गई एक स्टडी से पता चलता है कि यहां लॉकडाउन के दो महीने के बाद भी 96 फीसदी से अधिक गरीबों को सरकारी राशन नहीं मिला है. इसमें दो समस्याएं थीं. फ्री राशन उन्हीं लोगों को उपलब्ध था जो पहले पैसा देकर राशन खरीद रहे थे. दूसरी समस्या यह कि देश में बड़ी तादाद में लोगों के पास राशन कार्ड ही नहीं है. अगर है भी तो गांव में है. जबकि वे रोजगार शहर में कर रहे हैं. प्रवासी मजदूरों का राशन कार्ड उनके गृह राज्य का होता है, जबकि सच्चाई यह है कि एफसीआई के गोदामों में इतना पर्याप्त अनाज है कि सरकार पूरी आबादी को कई बार खाना खिला सकती है. सरकार को इस समय क्या करना चाहिए? उसे अनाज का स्टॉक रिलीज कर लोगों को फ्री राशन बांटना चाहिए. न सिर्फ लॉकडाउन के दौरान बल्कि इसके बाद के महीनों में भी. भोजन के अधिकार को मौलिक अधिकार के तौर पर लागू करने का यही एक तरीका है. 

निश्चित तौर पर जब ऐसा नहीं हुआ तो सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं. इन याचिकाओं में यह कहा गया कि लोगों को खाना नहीं मिल रहा है. लोगों को मुफ्त भोजन देने के लिए एक याचिका जयराम रमेश की ओर से से दायर की गई. यह याचिका यह कह कर निपटा दी गई कि जयराम रमेश को कोर्ट जाने से पहले सरकार के पास जाना चाहिए था. इस प्रक्रिया की जरूरत क्या थी यह समझ से परे है. सरकार को यह पता था कि करोड़ों लोगों को भोजन और पानी नहीं मिल रहा है. इस बात को उसे जयराम रमेश की ओर से चिट्ठी लिख कर बताने की जरूरत नहीं है. 

एक दूसरी याचिका राहत कार्य में लगे अयोम वेलफेयर ट्रस्ट ने दायर की थी. इस याचिका में इसने मांग की थी कि सरकार को उन्हें भी राशन देना चाहिए जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. उसे पीडीएस का यूनिवर्सलाइजेशन करना चाहिए. यानी पीडीएस के दायरे में हर किसी को लाया जाना चाहिए. 

30 अप्रैल, 2020 को यह याचिका यह कर निपटा दी गई कि यह नीतिगत मामला है और अदालत इसमें कुछ नहीं कर सकती है. सरकार इस मुद्दे पर विचार कर सकती है. तो जहां तक लोगों का भोजन का मामला था, वह सुप्रीम कोर्ट में इस तरह निपटा दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट उन लोगों को भी राशन देने के लिए कह सकता था, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. यह जीवन के अधिकार का सवाल है न कि सिर्फ नीतिगत सवाल बता कर खुद को इससे दूर रखने का. कम से कम सुप्रीम कोर्ट इतना तो कर ही सकता था कि याचिकाओं को लंबित रखता और सरकार पर कदम उठाने के लिए जोर डालता. लेकिन यह काम सुप्रीम कोर्ट ने नहीं किया. यह काम इस देश के उच्च न्यायालयों ने किया. 

कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई 30 मार्च को शुरू कर दी थी. काफी बाद तक वह सुनवाई करता रहा. पहले ही दिन कर्नाटक हाई कोर्ट ने पूछा कि जब आंगनबाड़ी और स्कूल बंद है तो सरकार बच्चों को मिलने वाला भोजन और मिड डे मील कैसे देगी? (उसने यह नहीं पूछा कि सरकार बच्चों को खाना देगी या नहीं? ) इससे सरकार के पास बचने का कोई विकल्प नहीं रहा. उसे भोजन बांटने की योजना को लेकर कोर्ट के सामने आना पड़ा. जब उन लोगों को राशन देने का मामला आया, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है तो कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस मामले में स्वराज अभियान की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया. (2016 7 एससीसी 498). इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सूखे के वक्त राशन के लिए सिर्फ अपना पहचान पत्र (जरूरी नहीं कि यह राशन कार्ड ही हो) दिखाने की जरूरत होती है. कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि यही तर्क मौजूदा परिस्थिति में भी लागू होगा. लिहाजा, राज्य सरकार अगली सुनवाई तक राशन बांटने के इसी पहलू के आधार पर फैसला ले ले.  

7 अप्रैल को जब अगली सुनवाई हुई तो सरकार ने फिर उन लोगों के राशन का सवाल उठाया जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं. राज्य सरकार ने कहा कि कुछ हिस्सों में वह ऐसे लोगों को भोजन का पैकेट दे रही है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपने स्वयंसेवकों से पूछ कर बताएं कि क्या यह काम पूरे राज्य में हो रहा है. 9 अप्रैल को कोर्ट ने फिर राज्य सरकार पर दबाव डाला. कोर्ट ने पाया कि भीख मांगने वाले, ट्रांसजेडर और सेक्स वर्कर जैसे हाशिये पर रहने वाले समुदायों के पास राशन कार्ड नहीं हो सकता. उसने उन लोगों को राशन देने पर जोर दिया जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. कोर्ट ने उन लोगों को फ्री राशन देने को कहा जो इसे खरीद नहीं सकते थे और जिनके पास बीपीएल कार्ड भी नहीं है. 13 अप्रैल को जब कोर्ट ने भी दबाव डाला तो राज्य सरकार ने कहा कि वह लोगों को भोजन देने के मामले में 16 अप्रैल तक कोई समग्र नीति लेकर हाजिर होगी. 

और आखिरकार 16 अप्रैल को सरकार उन लोगों को भोजन देने की एक नीति लेकर आई, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. यह नीति दो भागों में बंटी हुई थी. पहले के मुताबिक जिन लोगों को सरकार ने आश्रय दे रखा है, उन्हें पका हुआ भोजन मिलेगा. और जो लोग अपने घरों में रह रहे हैं उन्हें या भोजन का पैकेट दिया जाएगा या कच्चा भोजन. याचिकादाता के वकील की ओर से एक आपत्ति उठाए जाने पर कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि सरकार की ओर से दिए जाने वाले कच्चे राशन की मात्रा का क्या होगी. साथ ही यह भी कहा कि राज्य सरकार भोजन पकाने के लिए रसोई गैस की भी व्यवस्था सुनिश्चित करे. कोर्ट ने राज्य से यह भी कहा कि यह युद्ध स्तर पर ऐसे लोगों की पहचान करे, जिन्हें भोजन नहीं मिल पा रहा है. और आखिर में कोर्ट ने उन गैर सरकारी संगठनों की तारीफ की जो इस मुश्किल वक्त में नि:स्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं.

24 अप्रैल को राज्य की ओर से हर व्यक्ति को दिए जाने वाले राशन की मात्रा के बारे में विस्तृत जानकारी दी. लेकिन कहा कि उसके लिए मुफ्त गैस सिलेंडर देना मुश्किल होगा. इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार की जबरदस्त खिंचाई की और कहा कि राज्य गरीबों को एक मुफ्त गैस सिलेंडर देने पर विचार करना होगा. इससे पहले सरकार ने कहा था कि उसने अखबारों में विज्ञापन देकर बताया था कि कहां-कहां शेल्टर होम मौजूद हैं, जहां बेघर लोग आश्रय ले सकते हैं. लेकिन कोर्ट ने कहा था कि बेघर लोगों की अखबारों तक पहुंच नहीं भी हो सकती है. इसलिए ऐसे विज्ञापनों का कोई मतलब नहीं है. अब राज्य सरकार ने कहा कि उसने शेल्टर होम की उपलब्धता के बारे में घोषणाएं शुरू करवा दी हैं. गाड़ियों में माइक लगा कर लोगों की इसकी जानकारी दी जा रही है. 

5 मई को कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को सिर्फ मजदूरों के लिए आश्रय की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए, बल्कि ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर्स के लिए भी यह नीति अपनाई जानी चाहिए. इस संबंध में सरकार के सर्कुलर के दायरे में इन्हें भी लाया जाए. बहरहाल अगली दो तारीखों को कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य लेने जाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन के मुद्दों पर विचार किया और इसे मामले को सक्रिय रखा. 

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने राशन कार्ड से वंचित लोगों के लिए भोजन और राशन की सप्लाई सुनिश्चित करने का बड़ा ही मौलिक तरीका अपनाया. 

12 मई को जब यह मामला सुनवाई के लिए कोर्ट के सामने आया तो राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें उसने कहा था कि वह उन लोगों के लिए भोजन देने का निर्देश नहीं दे सकता, जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. यह सरकारों पर छोड़ दिया गया था कि ऐसे लोगों को राशन दिया जाए या नहीं. इसलिए हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की नीतियों को देखा. 29 मार्च,2020 को महाराष्ट्र सरकार ने एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें प्रवासियों, बेघर लोगों के लिए भोजन, आश्रय और पानी मुहैया कराने की बात थी. यह सुविधा उन लोगों को भी दी जानी थी, जिनके पास ये जरूरी चीजें नहीं हैं. यह जिम्मेदारी जिला प्रशासन को सौंपी गई थी. इस नीति में पका हुआ भोजन देने का जिक्र था. भोजन देने के मामले में राशन कार्ड धारक और राशन कार्ड से वंचित लोगों के बीच भेद करने का कोई जिक्र नहीं था. 

लेकिन इस मामले में प्रतिवादी रहा निगम यह दलील लेकर सामने आया कि 31 मार्च, 2020 को सरकार ने एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें सिर्फ राशन कार्ड धारकों को भी राशन देने की मंजूरी दी गई थी. 

लेकिन कोर्ट ने बड़ा ही साहसिक और नायाब तरीका अपनाया. कोर्ट ने कहा कि 31 मार्च, 2020 के सरकारी प्रस्ताव ने 29 मार्च 2020 के सरकारी प्रस्ताव का हवाला नहीं दिया है. और जैसा कि अमूमन होता है अगर किसी प्रस्ताव के ऊपर कोई प्रस्ताव लाया जाता है तो पिछले प्रस्ताव का जिक्र करना जरूरी होता है. इसलिए 31 मार्च, 2020 का प्रस्ताव लाए जाने के बावजूद 29 मार्च 2020 का सरकारी प्रस्ताव मान्य है. इसलिए जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं वे भी मुफ्त भोजन समेत सारे लाभ पाने के हकदार हैं. 

नि:शुल्क जांच 

यह साफ है कि कोविड-19 का पता करने और इसके इलाज के लिए टेस्टिंग बेहद अहम है. सरकारी लेबोरेट्री काफी कम हैं, जहां इसकी जांच मुफ्त होती है. ज्यादातर प्राइवेट लेबोरेट्री हैं, जहां टेस्ट के लिए पैसे देने पड़ते हैं. हां इनमें जांच की कीमत 4,500 रुपये तय की गई है. एक बार जांच साढ़े चार हजार रुपये में होती है. एक शख्स को दो बार जांच करानी पड़ती है. अगर परिवार में चार लोग हैं तो जांच कराने का खर्च 36 हजार रुपये आएगा. गरीब लोगों के लिए इतना खर्च उठाना मुश्किल है. इसलिए इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई. 

8 अप्रैल, 2020 को कोर्ट ने एक आदेश पारित किया. इसमें कहा गया कि चाहे सरकारी अस्पताल हों या प्राइवेट, कोरोना संक्रमण की जांच फ्री होगी. निजी अस्पतालों ने तुरंत श्री मुकुल रोहतगी के जरिये कोर्ट में दखल दिया. केंद्र की ओर से मामले को रखने वाले तुषार मेहता ने प्राइवेट अस्पतालों की ओर से सुझाए संशोधनों का समर्थन किया. यह संशोधन यह था कि प्राइवेट अस्पतालों में यह जांच सिर्फ उन्हीं गरीबों की होगी, जो आयुष्मान भारत स्कीम के तहत आते हैं. दूसरे लोगों के लिए राज्य अपने हिसाब से अलग-अलग इनकम कैटेगरी बना सकता है. भारत में कम से कम पांच करोड़ गरीब लोग इस स्कीम के दायरे में नहीं लिए गए हैं. दूसरी ओर, सरकारी लेबोरेट्रीज के पास पर्याप्त टेस्टिंग किट नहीं हैं. लेकिन गरीब लोगों में कोरोना संक्रमण के लक्षण भी हों तो वे अपना टेस्ट नहीं करा सकते. 

इस बात की कोई वजह नहीं दिखती कि करोड़ों रुपये कमाने वाले प्राइवेट लेबोरेट्रीज को क्यों न चैरिटी करने के लिए कहा जाए. इनमें से कई लेबोरेट्रीज चैरिटिबल अस्पतालों में मौजूद हैं और वे कहते हैं कि उनका उद्देश्यों लोगों के कल्याण के लिए काम करना है. कम से कम कोर्ट तो प्राइवेट अस्पतालों को यह टेस्ट फ्री में करने के लिए कह सकता है और सरकार को निर्देश दे सकता था कि वे टेस्ट का खर्चा इन्हें दें. 

13 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय के आदेश (8 अप्रैल के आदेश में संशोधन) को यहां पढ़ा जा सकता है।

पीएम केयर्स फंड 

लॉकडाउन के ऐलान के तुरंत बाद ही पीएम केयर्स फंड की स्थापना कर दी गई थी. इस संबंध में तीन मुद्दे हैं. पहला यह, कि क्या पीएम केयर्स फंड बनाया जाना चाहिए था? दूसरा, फंड के उत्तरदायित्व और पारदर्शिता से जुड़े मुद्दे स्पष्ट क्यों नहीं हैं? तीसरा, क्या कंपनियों को सीएसआर बेनिफिट सिर्फ पीएम केयर्स फंड के लिए मिलना चाहिए था, सीएम फंड के लिए नहीं?

कंपनी एक्ट, 2013 का सेक्शन 135 कहता है कि किसी वित्त वर्ष में 500 करोड़ रुपये के नेटवर्थ, 1000 करोड़ या इससे ज्यादा के टर्नओवर या 500 करोड़ या इससे ज्यादा का मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को इसका दो फीसदी कंपनीज एक्ट, 2013 के शेड्यूल vii के प्रावधान (1) और (12) में वर्णित गतिविधियों में खर्च करना होगा. ये कल्याण के काम होंगे. 

23 मार्च, 2020 को केंद्र सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर कहा कि कोविड-19 के तहत खर्च किया जाने वाला सीएसआर फंड सीएसआर की गतिविधियों के दायरे में आएगा. 28 मार्च 2020 को कहा गया कि कंपनी मामलों के मंत्रालय ने एक मेमोरेंडम जारी कर कहा है कि पीएम केयर्स फंड में दिया गया दान कंपनी एक्ट, 2013 के शेड्यूल vii के प्रावधान (1) और (12) में वर्णित गतिविधियों के लिए सीएसआर के तहत किया जाने वाला खर्च माना जाएगा. 

 

प्रावधान और 1 और 12 इस तरह हैं

  1. भूख गरीबी और कुपोषण हटाना. बीमारियों की रोकथाम, स्वच्छता समेत स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ावा देना. केंद्र की से ओर से गठित स्वच्छ भारत कोष में योगदान देना और पीने का साफ पानी मुहैया कराना.
  1. राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण समेत आपदा प्रबंधन का काम करना.

10 अप्रैल, 2020 को कंपनी मामलों के मंत्रालय ने FAQ2 में स्पष्ट किया कि ‘मुख्यमंत्री राहत कोष’ या कोविड-19 के लिए ‘राज्य राहत कोष’ कंपनी एक्ट, 2013 के सातवें शेड्यूल में नहीं शामिल किया जाएगा. इसलिए इसमें दिया गया कोई भी फंड सीएसआर खर्च के दायरे में नहीं आएगा. 

अगर प्रावधान (1) शेड्यूल 7 को एक सरसरी निगाह से देखा जाए तो यह साफ हो जाता है कि बीमारियों को रोकने की गतिविधियां समेत दूसरी स्वास्थ्य सेवाएं सीएसआर से जुड़े काम के दायरे में आते हैं. इसलिए कोविड-19 संक्रमण को कम करने कि लिए राज्य राहत कोष में दिया गया योगदान इस प्रावधान के दायरे में ही आएगा.

लिहाजा राज्य राहत कोष या मुख्यमंत्री राहत कोष के जरिये सीएसआर खर्च की अनुमति मिलनी चाहिए. लेकिन केंद्र ने इसकी इजाजत नहीं दी. इससे कॉरपोरेट फंड तो पीएम फंड में जाएंगे लेकिन सीएम फंड में नहीं.

महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी. 5 मई, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से यह कह कर इनकार कर दिया कि इस मुद्दे पर संसद में बहस होनी चाहिए. साथ ही उसने कहा कि किसी भी कंपनी ने इसे चुनौती नहीं दी है. यह सही भी है. आखिर कौन कंपनी इसे चुनौती देने की हिम्मत कर सकता है? यह मामला किसी भी लिहाज से जनहित का मामला है. यह कानून और संविधान की व्याख्या की मांग करता है. सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में उतरना चाहिए था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.

यह सवाल भी उठता है कि जब आपदा के दौरान राहत कार्य की फंडिंग के लिए पहले से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष मौजूद है तो पीएम केयर्स फंड की क्या जरूरत थी. प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में 2200 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हैं. ऐसा लगता है कि पीएम केयर्स फंड को लेकर कोई पारदर्शिता और उत्तरदायित्व नहीं है. एक चीज का प्रावधान है और वह यह कि इसके खातों की ऑडिटिंग. इसे लेकर भी एक और याचिका दायर की गई थी. अमूमन इस तरह के फंड की ऑडिटिंग सीएजी के जरिये होनी होती है और इसकी रिपोर्ट पार्लियामेंट रखे जाने का नियम है. लेकिन पीएम केयर्स फंड में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के सवाल पर दाखिल याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी. सर्वोच्च अदालत ने 13 अप्रैल को इस याचिका कहते हुए खारिज किया कि इसे मामले को ठीक से समझे बिना दाखिल किया गया है. 

दूसरी ओर बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने 13 मई को कहा कि भारत के संघ (केंद्र सरकार) से जिस याचिका में पीएम केयर्स फंड के सीएजी ऑडिट और सार्वजनिक तौर पर पूरे खुलासे की मांग की गई है, उसका जवाब दिया जाए. एक थोड़ा अलग मुद्दे पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट और केरल हाई कोर्ट ने निचली अदालत की उस शर्त को दरकिनार कर दिया जिसमें कहा गया था कि जमानत के लिए एक निश्चित रकम पीएम केयर्स फंड में देनी होगी. वहीं झारखंड हाई कोर्ट ने जमानत के लिए पीएम केयर्स फंड में पैसा देने की शर्त रखी थी. 

निष्कर्ष 

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा के जिस अधिकार का इस्तेमाल करने से बड़े ही कारगर तरीके से इनकार किया है, वह अभी का मामला नहीं है. यह काम कोविड-19 से जुड़े विवादों से पहले से ही शुरू हो गया था. लेकिन इस वक्त यह खुल कर सामने आ गया. सुप्रीम कोर्ट से कोई भी लॉक़ाउन खत्म करने की मांग नहीं कर रहा था, ना ही कोई नागरिक आजादी में की कई कटौतियों को पूरी तरह खत्म करने की मांग कर रहा था. उससे कोई डॉक्टर की भूमिका निभाने की भी मांग नहीं कर रहा था.

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं उन निर्धनतम लोगों के लिए दायर की गई थीं जो सैकड़ों की तादाद में कोविड-19 की वजह से नहीं, बल्कि नौकरी खत्म हो जाने, बिल्कुल भोजन न मिलने और लॉकडाउन की वजह से जीविका के लिए किसी योजना के न होने से मारे जा रहे थे. 

इसमें कोई शक नहीं है कि यह अभूतपूर्व स्थिति थी और सरकार को अपने हिसाब से थोड़ी आजादी की जरूरत थी. लेकिन गरीबों के प्रति अपनी जिम्मदारियों से पूरी तरह पल्ला झाड़ लेना बहुत बड़ा आघात था. 

1975-77 में इमरजेंसी के वक्त देश के उच्च न्यायालयों ने कहीं ज्यादा सक्रियता और साहस दिखाई थी. हालांकि यह सही है कि सभी उच्च न्यायालयों ने ऐसी सक्रियता नहीं दिखाई थी. कईयों ने ऐसे फैसले दिए थे जो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के ढर्रे पर ही थे. 

कश्मीर संकट और एनआरसी/सीएए के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का जो रवैया रहा उससे इस बात के साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिन कैसे होंगे. वैसे, यह भी सही नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट हमेशा से गरीब समर्थक ही रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने हर दशक में कुछ ऐसे फैसले दिए हैं, जिससे इसके कामकाज पर संदेह पैदा होते हैं. चाहे भोपाल का मुद्दा हो या नर्मदा बांध के विस्थापितों का सवाल. या फिर 1990 के दशक में श्रम न्यायशास्त्र मामलों में पल्टी मारने का या ठीक उसके बाद के आपराधिक न्यायशास्त्र के मामले में आनाकानी का. टाडा,पोटा और अफस्पा की संवैधानिकता का मामला हो या एनआरसी पर इसके परमादेश का मामला. फिर चाहे अयोध्या विवाद का मुद्दा हो या हिंदुत्व पर फैसले का सवाल हो, सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर समयसमय पर सवाल उठते रहे हैं

संभवत: कोविड-19 सुप्रीम कोर्ट के इतिहास का सबसे अंधकारमय दौर है. ऐसे वक्त में सुप्रीम कोर्ट ने इस देश के करोड़ों वंचितों और हाशिये के लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से एक ही झटके में पल्ला झाड़ लिया. शायद इस ‘कीर्तिमान’ को तोड़ने में दशकों लग जाएंगे. 

(लेखक बॉम्बे हाई कोर्ट के सीनियर वकील हैं. उन्होंने हाल में कोविड-19 से जुड़े कई मामलों की पैरवी की है. वह पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज यानी पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं) 

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