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जनगणना 2027: सरकार आपका डेटा जुटाने की ज़िम्मेदारी किसे दे रही है?

मोदी सरकार जनगणना 2027 के काम में निजी व्यक्तियों और संगठनों को शामिल करने का दायरा बढ़ा रही है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब व्यक्तिगत डेटा इकट्ठा करने को लेकर लोगों में यह डर बढ़ गया है कि कहीं इसका इस्तेमाल नागरिकता की जांच या चुनावी सूची से नाम हटाने के लिए न किया जाए। भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त ने 16 अक्टूबर को एक नोटिफिकेशन जारी करके ‘जनगणना नियम, 1990’ में संशोधन किया है। इसके तहत अब निजी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों, सोसायटियों और ट्रस्टों के सदस्यों, और ऐसे किसी भी व्यक्ति को जनगणना करने वाला (एन्यूमेरेटर) नियुक्त किया जा सकता है, जिसे राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन “उपयुक्त” समझे।

 

 

इस फैसले का समय इसे और भी चिंताजनक बनाता है। देश में पहले से ही चुनावी सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) का विरोध हो रहा है, क्योंकि लोगों को डर है कि कहीं पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटा न दिए जाएं। वहीं, जनगणना के प्रश्नावली में सामान्य जनसांख्यिकीय जानकारी के अलावा आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट, मोबाइल फोन की डिटेल, बैंक खाते की जानकारी, और माता-पिता की जन्म तिथि व जन्म स्थान जैसी संवेदनशील जानकारियां भी मांगी जा रही हैं।

विस्तृत रिपोर्ट आप यहां, यहां, यहां, यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं।

सरकार का तर्क है कि काम करने वालों की संख्या बढ़ाने से प्रशासनिक कामकाज में आसानी होगी। लेकिन सरकारी कर्मचारियों की कमी का हवाला देकर, नागरिकों की निजी जानकारी इकट्ठा करने के काम में किसी को भी मनमाने ढंग से चुनने की छूट देने के खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डेटा सुरक्षा के भरोसे इस बात की जगह नहीं ले सकते कि स्पष्ट और पारदर्शी नियम हों, जो इस पूरी प्रक्रिया को किसी हथियार की तरह इस्तेमाल होने से रोक सकें। जनगणना एक राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया है, जिसके जरिए सरकार लाखों परिवारों से संवेदनशील जानकारी इकट्ठा करती है। अगर इस जानकारी तक पहुंच एक ऐसी भर्ती प्रक्रिया के जरिए दी जाती है जो पारदर्शी नहीं है और जिसमें पूरी तरह से अधिकारियों की मनमानी चलती है-और अगर इसमें राजनीतिक दखलंदाजी या डेटा के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए कोई ठोस सुरक्षा उपाय नहीं किए जाते हैं-तो यह गंभीर सवाल खड़े करता है कि सरकार आखिर किसे ताकत देना चाहती है और किस मकसद से?

क्या यह संघ परिवार के लिए एक ‘पिछले दरवाजे’ (backdoor) जैसा है?

संशोधित नियमों के अनुसार, सरकारी, स्थानीय निकायों, सहायता प्राप्त या बिना सहायता वाले निजी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों, और सोसायटियों या ट्रस्टों से जुड़े शिक्षकों को जनगणना करने वाला (एन्यूमेरेटर) नियुक्त किया जा सकता है। इसके अलावा, सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों, कंपनियों और अन्य संस्थानों के क्लर्क और अधिकारी भी इसके लिए पात्र हैं। तीसरी श्रेणी में राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन द्वारा “उपयुक्त” माने जाने वाले “किसी भी व्यक्ति” को नियुक्त करने की अनुमति दी गई है।

यह आखिरी प्रावधान विशेष रूप से चिंताजनक है। इसमें नियुक्ति करने वाले अधिकारियों को काफी छूट दी गई है, जबकि अधिसूचना में पात्रता, राजनीतिक निष्पक्षता या स्वतंत्र जांच के लिए कोई स्पष्ट मानदंड नहीं बताए गए हैं।

17 अक्टूबर को, कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह जनगणना में भर्ती प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यकर्ताओं के लिए एक ‘रोजगार योजना’ में बदल रही है। ‘X’ (ट्विटर) पर एक पोस्ट में, रमेश ने 10 से 12 जुलाई, 2026 तक बेलगाम में आयोजित RSS के एक प्रशिक्षण शिविर की ओर ध्यान दिलाया, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि इसका मुख्य फोकस ‘जनगणना 2027’ पर था।

उन्होंने 26 मई को गठित केंद्रीय गृह मंत्रालय की ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर उच्च-स्तरीय समिति’ के गठन और 14 अक्टूबर को भारतीय तथा विदेशी संगठनों से सार्वजनिक सुझाव मांगने के कदम पर भी सवाल उठाए। इन घटनाओं को 16 अक्टूबर की अधिसूचना से जोड़ते हुए, रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार हजारों RSS-BJP कार्यकर्ताओं की भर्ती करने की तैयारी कर रही है, जिसे उन्होंने एक तरह की “रोजगार गारंटी योजना” बताया। उनकी चेतावनी बिल्कुल साफ थी: “SIR (एसआईआर) की तरह ही, जनगणना के आंकड़ों में भी खतरनाक तरीके से हेरफेर किया जाएगा।”

CPI(M) ने भी इसी तरह की चिंताएं जताई हैं। ‘X’ पर जारी एक बयान में, पार्टी नेता एम.ए. बेबी ने चेतावनी दी कि इन संशोधित नियमों के जरिए संघ परिवार से जुड़े लोग जनगणना कार्यबल में शामिल हो सकते हैं, जिससे नागरिकों की निजी जानकारी का राजनीतिक दुरुपयोग होने का खतरा पैदा हो जाएगा। उन्होंने मांग की कि इन संशोधनों को वापस लिया जाए और जनगणना की कार्यप्रणाली पर तुरंत सभी दलों के साथ परामर्श (सर्वदलीय बैठक) किया जाए।

ये आरोप सरकार के काम करने के तरीके में मौजूद एक बुनियादी समस्या को उजागर करते हैं। जब किसी सत्ताधारी दल पर बार-बार यह आरोप लगता रहा हो कि वह अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी संस्थानों का इस्तेमाल कर रहा है, तो भर्ती के अस्पष्ट मानदंडों के जरिए संवेदनशील पारिवारिक जानकारी तक पहुंच बढ़ाना, महज एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं हो सकती। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसे अस्थायी नौकरी मिल रही है; बल्कि असली मुद्दा यह है कि लोगों की पहचान, परिवार, दस्तावेजों और उनकी परिस्थितियों से जुड़ी निजी जानकारियों को इकट्ठा करने की जिम्मेदारी किसे सौंपी जा रही है, और इस बात की क्या गारंटी है कि इस जानकारी का गलत इस्तेमाल नहीं किया जाएगा?

जनगणना के लिए इतनी सारी व्यक्तिगत जानकारी की आवश्यकता क्यों है?

भर्ती के नियमों का विस्तार एक बड़ी समस्या का केवल एक हिस्सा है: परिवारों से मांगी जा रही संवेदनशील जानकारी की बढ़ती मात्रा। जैसा कि पहले चर्चा की गई है, 40 सवालों वाले जनसंख्या गणना प्रश्नावली (questionnaire) में कई ऐसे डेटा फील्ड शामिल हैं जो 2011 की जनगणना में नहीं थे। इनमें राष्ट्रीयता, जीवनसाथी का नाम, माता-पिता का विवरण, स्थायी आवासीय पता, डिजिटल साक्षरता और कोविड-19 टीकाकरण की जगह जैसी जानकारी शामिल है। लोगों से उनके बैंक खातों के बारे में भी पूछा जा रहा है, और यह भी कि क्या उनके पास आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और मोबाइल फोन है।

CPI(M) ने पहले ही इस प्रश्नावली पर आपत्ति जताई थी। 24 अगस्त को रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त को सौंपे गए एक ज्ञापन में, एम.ए. बेबी ने मांग की कि आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट और मोबाइल नंबर, बैंक खाते की जानकारी, धर्म और माता-पिता के जन्मस्थान जैसी जानकारी एकत्र न की जाए। ज्ञापन में यह भी मांग की गई कि जनगणना के डेटा को अन्य डेटाबेस के साथ जोड़ने से रोकने के लिए कड़े सुरक्षा उपाय किए जाएं।

ये ऐसे सवाल हैं जिनसे सरकार बच नहीं सकती। हर अतिरिक्त डेटा फील्ड को इकट्ठा करने की सटीक सांख्यिकीय (statistical) आवश्यकता क्या है? इस तक किसकी पहुंच होगी? इसे कितने समय तक रखा जाएगा? क्या चीज इसे पूरी तरह से अलग उद्देश्यों के लिए बनाए गए अन्य डेटाबेस के साथ जुड़ने से रोकती है?

जनगणना विभाग के एक अधिकारी ने ‘द हिंदू’ को बताया कि गणना करने वालों (enumerators) के मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए इकट्ठा किया गया डेटा एक केंद्रीय सर्वर पर जमा (centralised) किया जाएगा और काम पूरा होने के बाद उनके डिवाइस से हटा दिया जाएगा। अधिकारी ने यह भी दावा किया कि गोपनीयता की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। लेकिन यह आश्वासन मुख्य सवालों का जवाब नहीं देता है। गणना करने वाले के फोन से डेटा हटा देने से यह स्पष्ट नहीं होता कि केंद्रीय डेटाबेस तक किसकी पहुंच हो सकती है, अनधिकृत रूप से डेटा साझा होने से रोकने के लिए क्या सुरक्षा उपाय हैं, या क्या इस जानकारी को अन्य सरकारी रिकॉर्ड के साथ जोड़ा जा सकता है। डेटा का केंद्रीकरण (centralisation) अपने आप में सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

SIR से लेकर जनगणना तक: डेटा को लोगों को बाहर करने (exclusion) का जरिया बनाने का खतरा

इस विवाद को उस राजनीतिक संदर्भ से अलग नहीं किया जा सकता जिसमें यह सब हो रहा है। डेटा इकट्ठा करने की इस पूरी प्रक्रिया की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठाने के भी कारण मौजूद हैं। जून 2026 में ‘द हिंदू’ ने रिपोर्ट दी कि राजस्थान में जनगणना करने वालों को कथित तौर पर निर्देश दिए गए थे कि वे सरकारी योजनाओं से जुड़े कुछ ऐसे जवाबों को दर्ज न करें, जिनसे सरकार की छवि खराब हो सकती है। इन उदाहरणों में खुले में शौच, घरेलू ईंधन के रूप में लकड़ी या गोबर के उपलों का इस्तेमाल, और नल के पानी तक पहुंच जैसी बातें शामिल थीं। अगर सरकारी कर्मचारियों को ऐसे जवाब दर्ज करने से बचने के लिए कहा जा रहा है जिनसे सत्ताधारी सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है, तो जनगणना की विश्वसनीयता पहले ही खतरे में पड़ गई है। एक राष्ट्रीय सांख्यिकीय प्रक्रिया को सरकार के लिए ‘जनसंपर्क’ (PR) का जरिया बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

स्टाफ की कमी का तर्क कोई बहाना नहीं है

सरकार ने व्यावहारिक आधार पर इस विस्तार का बचाव किया है। ‘द हिंदू’ के अनुसार, जनसंख्या गणना के चरण के लिए लगभग 34 लाख लोगों की जरूरत होगी। देश के ज्यादातर हिस्सों में यह प्रक्रिया फरवरी 2027 में होनी है, जबकि चुनाव वाले राज्यों – उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा – में जनगणना 1 दिसंबर 2026 से 4 जनवरी 2027 के बीच होगी। स्कूली परीक्षाएं, विधानसभा चुनाव और चुनावी ड्यूटी में सरकारी शिक्षकों की तैनाती ने प्रशासनिक दबाव को और बढ़ा दिया है।

भारत के पूर्व डिप्टी रजिस्ट्रार जनरल के. नारायणन उन्नी ने ‘द हिंदू’ को बताया कि इस कदम से सरकारी स्कूलों और सरकार से सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों और कर्मचारियों की कमी का पता चलता है। लेकिन प्रशासनिक दबाव के नाम पर, बिना किसी ठोस जवाबदेही के कर्मचारियों की संख्या में मनमाना विस्तार करना सही नहीं ठहराया जा सकता। पहले भी जब मुख्य रूप से सरकारी शिक्षकों, राजस्व अधिकारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों पर निर्भर रहा जाता था, तो उस व्यवस्था में भी अपनी कमियां थीं। फिर भी, भर्ती का दायरा बढ़ाने के इस कदम के साथ यह स्पष्टीकरण भी जरूरी है कि निष्पक्षता, गोपनीयता और जवाबदेही के मानकों को कैसे बनाए रखा जाएगा।

निजी स्कूलों के शिक्षकों की तैनाती से जुड़े कानूनी विवाद इस स्थिति को और जटिल बना देते हैं। ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 16 अक्टूबर को हरियाणा सरकार के उन दो आदेशों पर रोक लगा दी, जिनमें जनगणना ड्यूटी के लिए शिक्षकों का विवरण मांगा गया था। इससे पहले, बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के 500 से ज्यादा निजी (बिना सरकारी सहायता वाले) और अल्पसंख्यक स्कूलों के संगठनों को राहत दी थी। यह राहत उन्हें जनगणना ड्यूटी के लिए मिले नोटिस, नियुक्ति आदेशों और जबरन कार्रवाई के खिलाफ दी गई थी।

फोटो साभार: पीटीआई

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