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अब्दुल शेख नागरिकता केस: गौहाटी हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान निर्वासन पर रोक, राज्य मेंटेनबिलिटी पर आपत्ति उठाएगा

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने 23 मार्च, 2026 को अब्दुल गफार उर्फ अब्दुल शेख द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई की। इस याचिका में चिरांग (2018) के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के एकतरफा फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को देश से निकाले जाने के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा जारी रखी, और साथ ही राज्य सरकार को एक हलफनामा दायर करने की अनुमति दी, जिसमें याचिका की स्वीकार्यता (maintainability) पर शुरुआती आपत्तियां उठाई जा सकें।

जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस सुस्मिता फुकन खाउंड की बेंच ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 24 अप्रैल, 2026 के लिए तय की है। हालांकि सुनवाई मुख्य रूप से प्रक्रियागत पहलुओं तक ही सीमित थी, लेकिन याचिका में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया, कोर्ट में आने में हुई देरी और किसी व्यक्ति कोविदेशीघोषित करने वाले एकतरफा फैसले के कानूनी परिणामों को लेकर गंभीर चुनौतियां उठाई गई हैं। इस मामले में कानूनी सहायतासिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस‘ (CJP) द्वारा दी जा रही है।

गुवाहाटी हाई कोर्ट (GHC) में पिछले मामलों की सुनवाई का विवरण, जिसमें याचिकाकर्ताओं की हिरासत को चुनौती दी गई थी, यहां, यहां और यहां देखा जा सकता है।

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हाई कोर्ट के समक्ष सुनवाई की कार्यवाही

शुरुआत में, याचिकाकर्ता के वकील, एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने यह दलील दी कि यह रिट याचिका स्वीकार्य है और दो मुख्य कारणों से इस पर गुणदोष के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।

पहला, यह तर्क दिया गया कि याचिका दायर करने में हुई देरी का पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया गया है, और यह देरी याचिकाकर्ता की ओर से किसी जानबूझकर की गई निष्क्रियता का परिणाम नहीं है।

दूसरा, इस बात पर जोर दिया गया कि वर्तमान याचिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई अनुमति के तहत दायर की गई है, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देने की स्पष्ट अनुमति दी थी। एडवोकेट दत्ता ने यह भी मांग की कि अदालत फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड मंगवाए, खासकर इस दलील के मद्देनजर कि कार्यवाही बिना किसी शक के आधार बताए शुरू की गई थी।

इस चरण पर, राज्य ने चुनौती के गुणदोष पर कोई बात नहीं की। इसके बजाय, उसने एक हलफनामा दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसमें प्रारंभिक आपत्तियां उठाई जा सकें, विशेष रूप से रिट याचिका की स्वीकार्यता के मुद्दे पर।

बेंच ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

इस चरण में, न्यायालय ने याचिका की स्वीकार्यता या उसके गुणदोष पर कोई निर्णय नहीं दिया है, बल्कि याचिका को बरकरार रखा है और यह सुनिश्चित किया है कि इस बीच कोई भी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

पृष्ठभूमि: ट्रिब्यूनल की राय और उसके बाद की कार्यवाही

यह याचिका 13 जून, 2018 को चिरांग स्थित फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा FT केस संख्या BNGN FT/CHR/220/07 में पारित एकपक्षीय राय को चुनौती देती है। इस राय में याचिकाकर्ता को एक विदेशी घोषित किया गया था, जिसने कथित तौर पर 25 मार्च, 1971 के बाद भारत में प्रवेश किया था।

याचिका के अनुसार:

घोषणा के बाद:

  1. याचिकाकर्ता को 30 अप्रैल, 2019 को हिरासत में लिया गया,
  2. बाद में, कोविडसंबंधी छूटों के कारण उसे 30 अप्रैल, 2021 को रिहा कर दिया गया,
  3. इसके बाद, उसे नियमित रूप से पुलिस थाने में रिपोर्ट करने की आवश्यकता थी, जिसका उसने कथित तौर पर पालन किया।

याचिका में आगे कहा गया है कि:

घटनाओं का यह क्रम ही वर्तमान रिट याचिका की तात्कालिक पृष्ठभूमि तैयार करता है।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और स्वतंत्रता का अनुदान

मुकदमेबाजी में एक महत्वपूर्ण चरण याचिकाकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना है। हाई कोर्ट के समक्ष पिछली कार्यवाही के बाद, याचिकाकर्ता ने एक SLP (विशेष अनुमति याचिका) दायर की, जिसका निपटारा 12 दिसंबर, 2025 को कर दिया गया।

SLP को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह खारिज याचिकाकर्ता को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की राय को चुनौती देने से नहीं रोकेगी। यह स्पष्टीकरण ही वर्तमान कार्यवाही का मुख्य आधार है। याचिका में यह दावा किया गया है कि:

याचिका दायर करने में हुई देरी की वजह

याचिका में 2018 के ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देने में हुई देरी की विस्तृत वजह बताई गई है।

  1. आर्थिक तंगीइसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ता:
  1. हिरासत की अवधिकानूनी उपाय करने की याचिकाकर्ता की क्षमता पर इन बातों का असर पड़ा:
  1. याचिकाकर्ता तक पहुंच होनायाचिका में यह दर्ज है कि:
  1. कानूनी मदद का मिलनाइसमें खास तौर पर यह दलील दी गई है कि:
  1. याचिका तैयार करने में आई व्यावहारिक दिक्कतेंयाचिका को इस तरह तैयार करना पड़ा:

देरी पर कानूनी दलीलऊपर बताई गई बातों के आधार पर, यह तर्क दिया जाता है कि:

ट्रिब्यूनल की कार्यवाही को चुनौती

याचिका में ट्रिब्यूनल की कार्यवाही की वैधता को चुनौती देने के लिए कई आधार उठाए गए हैं।

  1. नोटिस मेंमुख्य आधारोंकी गैरमौजूदगीयह तर्क दिया जाता है कि:

याचिका में तर्क दिया गया है कि ऐसा नोटिस कानून की नजर में अपर्याप्त है और यह ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित करता है।

  1. संदर्भ की वैधतापुलिस द्वारा किए गए संदर्भ को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि:
  1. एकतरफा राय (Ex Parte opinion) – एकतरफा राय को निम्नलिखित के परिणाम के रूप में समझाया गया है:
  1. अपना पक्ष रखने का अवसरयह तर्क दिया जाता है कि:

नागरिकता के दावे का दस्तावेजी आधार

याचिकाकर्ता भारतीय नागरिकता के अपने दावे को स्थापित करने के लिए कई दस्तावेजों पर निर्भर है, जिनमें शामिल हैं:

इन दस्तावेजों पर भारत के भीतर उसकी लंबे समय से मौजूदगी और जुड़ाव को दिखाने के लिए आधार बनाया गया है।

सबूत के बोझ पर कानूनी तर्क

याचिका में विदेशी अधिनियम की धारा 9 के संचालन को संबोधित करते हुए यह प्रस्तुत किया गया है कि:

वर्तमान मामले में:

मांगी गई राहतें

याचिका में निम्नलिखित की मांग की गई है:

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