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विवादास्पद मार्ग (रूट), भारत में धार्मिक जुलूसों में हिंसा भड़काने का आम कारक

भारत का राजनीतिक इतिहास ऐसे धार्मिक जुलूसों से भरा हुआ है जो  सांप्रदायिक संघर्ष, दंगों, अकारण हिंसा, आगजनी, संपत्ति को नुकसान और दंगा प्रभावित इलाकों में निर्दोष नागरिकों की जान जाने का कारण बने। सत्ता में जो भी पार्टी हो, यह सब होता रहा और इसका प्रमुख कारण पेशेवरता का अभाव और प्रदेश के पुलिस बल पर सरकारी प्रभाव रहा है।

उकसावे के रूप में अन्य कारकों के बावजूद, पुलिस, प्रशासन और सरकारों की ऐसे धार्मिक जुलूसों के मार्ग पर नियंत्रण (रेगुलेट करने)  में विफलता ऐसे सांप्रदायिक तनाव और हिंसा का सबसे बड़े कारणों में से एक है। आजादी से पहले भी यह होता था लेकिन तब भी रोकथाम के लिए कदमों पर अमल में सांस्थानिक विस्मृति की भूमिका रही है।

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कहने का मतलब मार्ग (रूट) विवादास्पद विषय है और पुलिस, प्रशासन -प्रभुत्वशाली राजनीतिक समूहों और दबावों के साथ –  मार्ग (रूट) पर नियंत्रण (रेगुलेट करने) से इनकार करता रहा है।

भारतीय दंड संहिता ने इसे पहचाना है। 1860 में बनाई धारा 153 ने दंगा भड़काने के इरादे से उकसावे के लिए छह महीने कि सजा और उस उकसावे के लिए जिसकी दंगे में परिणिति हो, के लिए एक साल कि सजा तय की थी। धारा 188, जिसने एक सरकारी अधिकारी के आदेश का पालन करने से मना करने को अपराध बनाया, में दिए एक उदाहरण ने आज्ञा उल्लंघन के कम से कम एक स्वरूप को दर्शाया: 

‘’धारा 188 सरकारी अधिकारी कि तरफ से पारित आदेश का उल्लंघन:

उदाहरण : एक सक्षम सरकारी अधिकारी ने एक आदेश पारित किया है, जिसमें निर्देश दिया गया है कि धार्मिक जुलूस एक गली से नहीं निकलेगा। कोई जानबूझ कर इस आदेश का उल्लंघन करता है और दंगे के खतरे का कारण बनता है। तो यह इस धारा के तहत अपराध है।’’

इसके अलावा, मौजूदा कानून पर्याप्त रोकथाम कार्रवाई की मांग करता है। 

पुलिस की तरफ से रोकथाम की कार्रवाई के तहत उठाए गए कदमों का विवरण दंड प्रक्रिया संहिता के पाठ ग्यारह में दिया गया है, जहां धारा 144 के तहत प्रदेश सरकार की तरफ से शक्तियां प्राप्त एक जिला दंडाधिकारी, उप विभागीय दंडाधिकारी या किसी और कार्यकारी दंडाधिकारी निषेधाज्ञा जारी कर सकता है और आशंकित खतरों या उपद्रव के मामलों से निबट सकता है। धारा 149 से बाद की धाराओं के तहत एक पुलिस अधिकारी संज्ञेय अपराध घटित होने से रोकने के लिए प्रतिबंधकारी उपाय उठा सकता है। यहाँ कानून पालन कराने वाली एजंसियों को उपलब्ध कुछ उपायों का विश्लेषण किया जा रहा है।

भारतीय दंड संहिता में धार्मिक जुटान को बाधित करने के उद्देश्य से की जाने वाली हरकतों से सम्बद्ध धारा 295 ए और 296 के तहत अपराधों की  परिभाषा भी दी गई है। भारतीय शस्त्र अधिनियम (1959, 2016 में संशोधित) में हथियारों की बिक्री और हस्तांतरण बंदी समेत  सख्त निर्देश हैं (इसे त्रिशूल दीक्षा – त्रिशूल वितरण के संदर्भ में पढ़ें)। इसके साथ, पुलिस अधिनियम, 1861 में धारा 30 के तहत ‘’सार्वजनिक जुटान, जुलूसों और इनके लायसेंसिंग के प्रावधान हैं। विभिन्न राज्यों के पुलिस अधिनियमों (दिल्ली और गुजरात समेत) में ऐसे ही उपाय हैं और इनमें 1950 में संशोधन किया गया है।

आजादी के बाद का हमारा इतिहास क्या है? 

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुंबई दंगों (1922-1993) से लेकर इस लेखिका के देश भर में अलग-अलग राजनीतिक दलों के शासन में हुई हिंसा के अध्ययन और विश्लेषण के अनुसार अधिकांश हिंसा जुलूसधारियों द्वारा जानबूझ कर सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मार्गों को चुनने और पुलिस द्वारा ऐसी मांगों से निबटने में झिझक का रवैया अपनाने से हुई है। मार्गों की अनुमति देने से मना करने में पुलिस की यह झिझक एक तरह से मिलीभगत व साँठ गांठ ही होती है।

ऐसे दंगों के कुछ उदाहरणों पर नजर डालने से उक्त बिन्दु स्पष्ट हो जाएगा। सबरंग पब्लिकेशन्स ने 1998 में न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्ण आयोग कि रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसके साथ इस लेखिका का नोट भी  था। हिंसा के बाद इस लेखिका की जमीनी रेपोर्टिंग से पता चला कि, जैसाकि अन्य मीडिया ने बताया था उसके विपरीत बॉम्बे में फैली हिंसा “7 दिसंबर को गुसाए मुस्लिमों के सड़कों पर उतरने से नहीं शुरू हुई थी बल्कि 6 दिसंबर 1992 की शाम को ही शुरू हो गई थी। इस लेखिका ने दर्ज किया है:

“हिंसा 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दोपहर ढाई बजे जो पहली सांप्रदायिक घटना मुंबई में हुई, वह धारावी में हुई जहां गुसाए मुस्लिमों ने नहीं शिव सेना नेता बाबूराव माने और रामकृष्ण केणी  के नेतृत्व में शिवसैनिकों के उकसावे की थी। स्थानीय पुलिस ने शिव सैनिकों को 200-300 लोगों कि साइकिल रैली निकालने की अनुमति दी थी। रैली धारावी के कई संवेदनशील, मुस्लिम बहुल इलाकों से निकली और काला किल्ला पर समाप्त हुई, जहां एक सभा हुई जिसे स्थानीय शिव सेना कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया। इस सभा में भड़काऊ भाषण दिए गए। (पृष्ठ 7, 94 और 197) 

“इसके अलावा धारावी को जुलाई 1992 से दिसंबर 1992 के बीच  स्थानीय भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना की तरफ से राम पादुका पूजन कार्यकर्ता और चौक सभाओं जैसे कार्यक्रमों से सुलगाए रखा। दो मुस्लिम संगठनों,  तनजीम-अल्लाह-ओ-अकबर और दलित मुस्लिम सुरक्षा संघ ने भी कर सेव से पहले की अवधि में सभाएं की थीं। 

पुलिस मूक दर्शक बनी रही। राज्य सरकार अनुपस्थित। 

आइए, उससे भी पीछे चलते हैं। 

शोलापुर 1967

धार्मिक जुलूसों से कैसे सांप्रदायिक आग, दंगे भड़काए जाते हैं और जानें जाती हैं, महाराष्ट्र में शोलापुर इसका एक उदाहरण पेश करता है । जैसाकि “शोलापुर में 17 सितंबर 1967 को सांप्रदायिक उपद्रव पर जांच आयोग — जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रघुबर दयाल ने कि थी और आयोग में करनाल बीएच जैदी, मध्य प्रदेश और सेवनिवृत अधिकारी श्री एमएम फिलिप शामिल थे — ने पाया था कि सांप्रदायिक दंगे 1925 और 1927 में ‘रथ जुलूसों’ के अवसर पर, 1927 और 1966 में गणपति विसर्जन के दौरान  भड़के थे और 1939 में आर्य समाज सत्याग्रह के एक जुलूस के दौरान आपत्तिजनक नारेबाजी से छुरेबाज़ी के 18 वाकये हुए थे। अन्य सामूहिक छुरेबाज़ी कि घटनाएं अगस्त 1947 में हुई हैं पर वह विभाजन की हिंसा और शरणार्थी संकट से उपजी थीं।

भिवंडी, जलगांव और महाड, 1970

मुंबई से केवल 37 किलोमीटर दूरी पर स्थित पावरलूम नगरी भिवंडी में 7 मई 1970 को व्यापक पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा फैली जिसके नतीजतन 78 जानें गईं। इनमें 59 मुस्लिम थे, 17 हिन्दू और दो जिनकी शिनाख्त नहीं हो सकी थी। भिवंडी, जलगांव और महाड में मई 1970 में दंगों की जांच के लिए मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश डीपी मदान के एक सदस्यीय जांच आयोग ने कहा कि यह दंगे सीधे तौर पर एक विशाल शिव जयंती रैली का नतीजा थे जिसमें 10,000 लोग लाठियों से लैस थे और रैली के लिए निजामपुर जुम्मा मस्जिद से गुजरने वाले मार्ग पर जोर देना था। भिवंडी दंगों की तर्ज पर ही 8 मई को जलगांव और महाड में दंगे हुए, जबकि इन दो शहरों और भिवंडी में कोई समानता नहीं है। जलगांव में 42 मुस्लिम और एक हिन्दू की मौत हुई जबकि महाड में सौभाग्य से किसी की जान नहीं गई। 

न्यायमूर्ति मदान ने पाया कि 1963 भिवंडी के सांप्रदायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण वर्ष था जब हिंदुओं ने जुलूस निकालने शुरू किए और वह लोग मस्जिद के पास से गुजरते समय भी संगीत बंद नहीं करते थे। 1964 वह वर्ष था जब शिव जयंती जुलूसों ने मस्जिदों के बाहर रुकना और भड़काऊ व मुस्लिम विरोधी नारेबाजी करना तथा गुलाल फेंकना  शुरू किया। संयोग से यही वह वर्ष था जब भारतीय जन संघ, भाजपा के पूर्व संस्करण, ने भिवंडी में अपनी शाखा खोली। उन्होंने पाया कि 1965 में इस तरह के उकसावों में उछाल आया, जब पहली-पहली बार कोई गैर मुस्लिम जुलूस निजामपुर जुम्मा मस्जिद से होकर गुजरा। आश्चर्य नहीं कि 1967 में भिवंडी ने पहला सांप्रदायिक दंगा देखा, जो तब हुआ जब शिव जयंती जुलूस निजामपुर जुम्मा मस्जिद से गुजर रहा था। 

1969 में शिव जयंती उत्सव समिति समाप्त हो गई जब 15 जन संघ सदस्य, एक शिव सेना सदस्य और तीन अस्थिर राजनीतिक लाइन के सदस्य समिति से निकल गए और एक नया संगठन राष्ट्रीय उत्सव मण्डल बनाया, जिसने 1970 के जुलूसों का मंच तैयार किया। न्यायमूर्ति मदान ने पाया, “भिवंडी उपद्रव का तात्कालिक अथवा आसन्न कारण शिव जयंती जुलूस में शामिल लोगों का जानबूझकर दुर्व्यवहार करना था, जो भिवंडी में 7 मई 1970 को निकाला गया था, मुस्लिमों को उकसाने के लिए और यह भी तथ्य है कि राष्ट्रीय उत्सव मण्डल के इशारे और उकसावे पर जुलूस में शामिल ज्यादातर लोग गाँवों से थे और लाठियाँ लेकर चल रहे थे। लठियों पर भगवा झंडे और बैनर लगाए हुए थे बॉम्बे पुलिस अधिनियम 1950 की धार 37(1) के तहत हथियारों पर प्रतिबंध को धत्ता बताने के लिए और इसलिए कि यदि मुस्लिमों ने कोई समस्या जुलूस वालों के उकसावे में आकर या वैसे ही पैदा की तो प्रदर्शनकारी हथियारबंद रहें।

जमशेदपुर 1979 

1978 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ/विश्व हिन्दू परिषद ने जोर डाला कि पारंपरिक राम नवमी जुलूस मुस्लिम बहुल साबिरनगर से निकलेगा। सांप्रदायिक समस्या उत्पन्न होने की आशंका देखते हुए अधिकारियों ने उन्हें ऐसा मार्ग सुझाया जिसमें साबिरनगर नहीं आता था, पर जुलूस के आयोजक अपनी मांग पर अड़े रहे। सुझाए गए कई वैकल्पिक मार्ग उन्होंने ठुकरा दिए, जबकि साबिरनगर न तो सबसे सीधा, न खुला या सुविधाजनक मार्ग था चूंकि इसमें एक कच्चे रास्ते और निजी स्वामित्व वाले खेतों से गुजरना होता था। जब अधिकारी नहीं माने तो आरएसएस/वीएचपी ने विरोध किया, सरकार को ब्लैकमेल करने व प्रशासन पर दबाव डालने के लिए पूरा एक साल जुलूस न निकालने की धमकी दी।

आखिरकार, कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार (केंद्र और बिहार राज्य में गठबंधन सरकार, भाजपा दोनों में सदस्य थी) झुकी और 1979 में स्थानीय प्रशासन पर दबाव डालकर राम नवमी जुलूस साबिरनगर से गुजरने की अनुमति दिलाई गई। एक “समझौता” किया गया, इस वायदे पर कि मुख्य जुलूस सामान्य मार्ग और हाइवे पर चलेगा और एक छोटा “प्रतीकात्मक जुलूस” साबिरनगर से गुजरेगा जिसमें स्थानीय बुजुर्ग मुस्लिम भी होंगे और फिर यह जुलूस हाइवे पर मुख्य जुलूस में मिल जाएगा।

जब यह “प्रतीकात्मक जुलूस” बुजुर्ग मुस्लिमों और पुलिस की छोटी टुकड़ी के साथ जा रहा था तो 15000 के करीब लोगों वाला मुख्य जुलूस भी अपना लाइसेंसी मार्ग छोड़कर “प्रतीकात्मक जुलूस” के पीछे आ गया और खेतों से होते हुए साबिरनगर में प्रवेश कर गया। साबिरनगर मस्जिद पहुँचने पर भाजपा विधायक दीनानाथ पांडे ने जुलूस रोक दिया और जुलूस को आगे बढ़ने के बजाय जिद करने लगे कि उन्हें वहाँ रुकने का अधिकार है। वह वहाँ मुस्लिम विरोधी भड़काऊ भाषण देने लगे।

घबराहट फैली और पथराव हुआ जोकि अपरिहार्य ही था, जिसके बाद 15000 जुलूसधारियों ने तोडफोड की और दंगा भड़का। हिंसा समूचे जमशेदनगर में फैली जिसकी परिणिती 108 मौतों — 79 मुस्लिम, 25 हिन्दू और 4 जिनकी शिनाख्त नहीं हो पाई – में हुई। व्यापक लूटमार, संपत्तियों को नुकसान, आगजनी और दंगे हुए। चूंकि केंद्र साबिरनगर था, मुस्लिमों को जानमाल का ज्यादा नुकसान हुआ। 

पटना उच्च न्यायालय के सेवनिवृत न्यायाधीश जितेंद्र नारायण के नेतृत्व में एक जांच आयोग ने पाया कि आरएसएस और दीनानाथ पांडे मुख्य रूप से जिम्मेदार थे। 

कोटा, 1989

एक शहर जिसने 1947 में दंगे नहीं देखे थे, और अगले पाँच दशकों तक भी नहीं देखे थे, 1989 ने लक्षित जुलूसों की दंगे भड़काने में क्षमता साबित की। इस अवसर पर और राजस्थान के इस शांत नखलिस्तान में भगवान गणेश के विसर्जन के लिए अनंत चतुर्दशी जुलूस का इस्तेमाल सांप्रदायिक आग सुलगाने के लिए हुआ। 14 सितंबर 1989 को जुलूस जानबूझकर मुस्लिम मोहल्ले से निकाल गया और सबसे बड़ी मस्जिद के सामने रोका गया, ताकि जुलूस में शामिल लोग सांप्रदायिक नारेबाजी कर सकें और मुस्लिमों को अपशब्द कह सकें। जाहिर  है, नारेबाजी सामने से भी हुई और टकराव, पहले पथराव और फिर हथियारों के साथ हमलों में बदल गया। दिन ढलने के साथ 16 मुस्लिम और 4 हिन्दू मारे जा चुके थे, सैकड़ों मुस्लिम फेरीवालों, कारोबारियों का माल, दुकानें और मुस्लिम इलाकों में घर जला दिए गए। इस मानव निर्मित आपदा का कारण स्पष्ट रूप से “कोटा 1989 दंगों के एक सदस्यीय जांच आयोग”, राजस्थान उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश श्री एसएन भार्गव  (रिपोर्ट प्रस्तुत करते समय वह सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे) ने बताया था:

“53…. इसमें 20 लोग मारे गए थे जिनमें से 16 मुस्लिम थे और 4 हिन्दू॥ जैसाकि दर्ज प्रमाणों से जाहिर है, समस्या जुलूसधारियों के  आपतिजनक और भड़काऊ नारेबाजी और मुस्लिमों के उसके प्रत्युत्तर से शुरू हुई.. प्रस्तुत प्रमाण के आधार पर, मैं मानता हूँ कि जुलूस में शामिल लोगों ने आपतिजनक और भड़काऊ नारेबाजी शुरू की थी और इसी के जवाब में मुस्लिम समुदाय ने भी जवाबी नारेबाजी की।’’

भागलपुर, 1989

इस बार एक रामशिला जुलूस था 24 ऑक्टोबर 1989 का जो अधिकृत मार्ग छोड़कर  एक मुस्लिम बहुल इलाके ततारपुर से गुजरा। रामशिला जुलूस अपने आप में भड़काऊ और विजयी अंदाज वाले थे, इन जुलूसों में पुजारियों द्वारा पवित्र अग्नि में तपाकर तैयार की गई ईंटें (शिला) ले जाई जाती थीं जो अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस (वास्तविक विध्वंस तीन साल बाद 1992 में हुआ) के बाद निर्मित किए जाने वाले राम मंदिर के लिए इस्तेमाल होने वाली थीं।

पटना उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश राम नंदन प्रसाद, न्यायाधीश राम चंद्र प्रसाद और न्यायाधीश एस शमसूल हसन वाले जांच आयोग ने पाया कि हालांकि भागलपुर में रामशिला जुलूसों को लेकर तनाव की स्थिति 1989 से एक साल पहले से बन रही थी लेकिन प्रशासन व पुलिस ने इस तरफ आँखें मूँद ली थीं। आयोग ने दर्ज किया कि 1989 के जुलूस के ततारपुर से गुजरने का कोई आवेदन नहीं था और जुलूस की जो अनुमति आयोजकों को दी गई थी उसमें ततारपुर का कोई जिक्र नहीं था (पारा 578)। इसके बावजूद “हजारों अराजक तत्वों की भीड़” को पुलिस ने अधिकृत मार्ग छोड़कर ततारपुर में प्रवेश करने दिया और रक्षविहीन मुस्लिम आबादी के खिलाफ उत्पात मचाने दिया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट के पारा 567 में दर्ज किया, “भागलपुर और आसपास के मुस्लिमों को हमलावरों की भीड़ के जिला पुलिस के गठजोड़ के गुस्से का शिकार होना पड़ा।” और यह भी कि “यह 900 से ज्यादा लाशों और 900 से ज्यादा हथकड़ियों और जंजीरों में लोगों से भी नुमाया होता है।” जांच आयोग ने पाया कि, “दंगा भड़कने से एक साल पहले पर्याप्त संकेत थे.. जिला प्रशासन, जैसाकि हमने कहा है, आपराधिक  स्मृतिलोप, उदासीनता और प्रत्यक्ष सांप्रदायिक पक्षपात, दंगे का पूर्वाभास कर पाने में विफलता का दोषी है। जिला प्रशासन में निष्पक्षता की कमी ने भी समस्या को बढ़ाया।” (पारा 570)। 

1989 में भागलपुर में इस हिंसा ने तीन दशक पहले 900 जानें (मुस्लिमों की) लीं, लेकिन ऐसे आक्रामक संगठनों को घनी और विविध आबादी वाले इलाकों से गुजरने की “अनुमति” या “लाइसेन्स” देने की राज्यों की उदार विरासत बनी हुई है। इस तथ्य से कि ऐसी चीजें उत्सवों (हिन्दू और मुस्लिम) के समय तनाव बढ़ा देती हैं, सरकारों को कोई फरक नहीं पड़ता। 2022 से राम नवमी और हनुमान जयंती, जो मुस्लिमों के व्रत के महीने रमजान में पड़ते हैं, के जुलूसों को खुले हथियार और कानफाडू म्यूजिक सिस्टम और अल्पसंख्यक समाज का अपमान करने वाले भड़काऊ और आपत्तिजनक गीतों वाले डीजे के साथ मस्जिदों के सामने गाने-बजाने की अनुमति दी जाती है। आज, 1970, 1980, 1990 के दशकों की शिथिल मिलीभगत के मुकाबले राज्यसत्ता अधिकतर मूक दर्शक या विचारधारात्मक पक्षपात से प्रभावित पुलिस के साथ सक्रिय आक्रमणकारी बन चुकी है। 

धार्मिक जुलूसों पर कानून क्या कहता है? 

( www.cjp.org.in पर एक लेख से – जो सीजेपी की जनहित याचिका में अदालत से धार्मिक जुलूसों के लिए कानून के अमल संबंधी निर्देश दिए जाने के अनुरोध का हिस्सा है।)

गृह मंत्रालय और पंजाब पुलिस के दिशानिर्देश : जनवरी 2019 और 2018 में, गृह मंत्रालय ने “हथियारों और आग्नेय शस्त्रों के अवैध इस्तेमाल पर अंकुश लगाने के लिए” विस्तृत निर्देश ( एड्वाइज़री)  जारी किए क्योंकि यह भारतीय शस्त्र अधिनियम (1959 जो 2016 में संशोधित किया गया) का उल्लंघन था। यह निर्देश स्पष्ट कहते हैं कि :

“एक बार फिर अनुरोध किया जाता है कि शादियों में, सार्वजनिक स्थानों, धार्मिक स्थलों/जुलूसों, पार्टियों, राजनीतिक रैलियों आदि में हर्ष फायरिंग में संलिप्त लोगों के खिलाफ शस्त्र अधिनियम, 1959, शस्त्र नियम, 2016 के और भारतीय दंड संहिता व दंड प्रक्रिया संहिता के संबंधित प्रावधानों के अनुसार कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए ताकि ऐसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सके। इसके अलावा ऐसे लोगों के लायसेंस या ऐसे कोई भी लायसेन्स जो शस्त्र अधिनियम, 1959, शस्त्र नियम, 2016 के प्रावधानों का उल्लंघन करें, कानून के तहत रद्द करना चाहिए।’’

पंजाब पुलिस दिशानिर्देश 2018 

2018 में पंजाब पुलिस ने “जुलूसों/सभाओं/विरोध प्रदर्शनों/ धरनों/ मार्च आदि के आयोजन व अंजाम देने संबंधी” नियमावली जारी की। इसमें 19 स्पष्ट निर्देश हैं कि सभी तरह के जुलूसों से पुलिस अधिकारियों को कैसे निबटना चाहिए कि यह अराजक या हिंसा में ने परिवर्तित हों। हथियारों और लाठियों लेकर चलने पर कानूनी प्रतिबंध के अलावा दिशानिर्देशों का जोर इस बात पर भी था कि समूची जुलूस यात्रा का विडिओ  बनाया जाए और आयोजक कानूनी व्यवहार और संचालन सुनिश्चित करने का वचन दें। महत्वपूर्ण यह है कि आयोजकों को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि “जुलूस या सभा के स्थल पर ऐसी कोई भड़काऊ भाषणबाज़ी या गैरकानूनी गतिविधि नहीं कि जाएगी जिससे इलाके में तनाव पैदा हो या विभिन्न समुदायों, जातियों, धर्मों आदि के लोगों में मतभेद या आपसी नफरत का माहौल पैदा हो सकें।

जैसाकि अप्रैल 2022 में ऐसी कई घटनाओं के आख्यान से स्पष्ट है, इन सभी पूर्व शर्तों का उल्लंघन किया गया। घटनाएं दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में हुई।

कानून क्या कहता है 

पुलिस की तरफ से उठाए जाने वाले प्रतिबंधात्मक कदम विस्तार से दंड प्रक्रिया संहिता में खंड ग्यारह में बताए गए हैं, जहां धारा 144 एक जिला दंडाधिकारी, उप विभागीय दंडाधिकारी, या राज्य सरकार की ओर से अधिकृत अन्य किसी भी कार्यकारी दंडाधिकारी को आशंकित खतरे या गड़बड़ी को रोकने व उससे निबटने के लिए आदेश जारी करने में सक्षम बनाती है। धारा 149 के बाद वाली धाराएं संज्ञेय अपराध घटने से रोकने के लिए एक पुलिस अधिकारी की तरफ से उठाए जाने वाले कदमों का ब्यौरा देती हैं। यहाँ कानून पालन कराने वाली एजंसियों को उपलब्ध कुछ उपायों का विश्लेषण किया जा रहा है।

भारतीय दंड संहिता में धार्मिक जुटान को बाधित करने के उद्देश्य से की हरकतों से सम्बद्ध धारा 295 ए और 296 के तहत अपराधों की  परिभाषा भी दी गई है। भारतीय शस्त्र अधिनियम (1959, 2016 में संशोधित) में हथियारों की बिक्री और हस्तांतरण बंदी समेत  सख्त निर्देश हैं (इसे त्रिशूल दीक्षा – त्रिशूल वितरण के संदर्भ में पढ़ें)। इसके साथ, पुलिस अधिनियम, 1861 में धारा 30 के तहत ‘’सार्वजनिक जुटान, जुलूसों और इनके लायसेंसिंग के प्रावधान हैं। विभिन्न राज्यों के पुलिस अधिनियमों (दिल्ली और गुजरात समेत) में ऐसे ही उपाय हैं और इनमें 1950 में संशोधन किया गया है।

न्यायिक सिद्धांत 

 प्रवीण तोगड़िया विरुद्ध कर्नाटक प्रदेश (2002) 4 एससीसी 684, उच्चतम न्यायालय ने उस प्रशासनिक आदेश को बरकरार रखा जो एक ऐसे जमावड़े को रोकने के लिए जारी किया गया था जो हिंसक हो सकता था। तेलंगाना उच्च न्यायालय ने इस साल राम नवमी जुलूस के लिए अनुमति के संदर्भ में जोर देकर कहा कि पुलिस की तरफ से लगाई गई शर्तों का सख्ती से पालन हो और एकल/स्वतंत्र जुलूसों पर रोक लगाई।