दो दशकों से भी ज्यादा समय से, ‘सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (CJP) नागरिकता, संवैधानिक अधिकारों, लोकतांत्रिक भागीदारी और राज्य की जवाबदेही के मेल पर लगातार काम कर रहा है। चाहे सांप्रदायिक हिंसा, हिरासत, विस्थापन, प्रवासी अधिकारों, NRC की कार्यवाही, नागरिकता के दस्तावेजों, मतदाताओं को बाहर करने, या कमजोर समुदायों को कानूनी मदद देने के मामले हों, CJP का काम हमेशा एक बुनियादी संवैधानिक सवाल से जुड़ा रहा है कि राज्य किसे मान्यता देता है, और किन शर्तों पर?
‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन‘ (SIR) से जुड़ी मौजूदा चिंताओं के उभरने से बहुत पहले ही, CJP पहचान के दस्तावेजों, नागरिकता की जांच और लोगों को बाहर करने वाली प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़े सवालों में गहराई से शामिल था। हमारा पहला गहन और लगातार जारी दखल पूर्वोत्तर राज्य असम में था, जहां एक अजीब तरह की, लोगों को बाहर करने वाली और विदेशियों से नफरत करने वाली राजनीति ने ऐसी नीतियां और काम तय किए, जिन्होंने मिलकर असली भारतीयों को ‘नागरिकता के दस्तावेज साबित करने‘ के दलदल में फंसा दिया। CJP की 2025 तक की लगातार जारी यात्रा और प्रयास के बारे में यहां पढ़ें।
इसके बाद, दो साल बाद, 2019-2020 में, CAA-NRC पर हुई बहसों से पैदा हुए डर भरे समय के दौरान, CJP ने कई राज्यों में बड़े पैमाने पर दस्तावेज बनाने और जागरूकता फैलाने के अभियान चलाए। इन अभियानों ने समुदायों को कानूनी प्रक्रियाओं को समझने, रिकॉर्ड सुरक्षित रखने, खोए हुए दस्तावेज हासिल करने और डर से फैली गलत जानकारियों का सामना करने में मदद की। संगठन का दखल लगातार इस बात पर केंद्रित रहा कि कमजोर आबादी– खासकर अल्पसंख्यक, प्रवासी, महिलाएं, आदिवासी, पूर्व अधिसूचित जनजातियां (DNTs), अनौपचारिक मजदूर और आर्थिक रूप से पिछड़े समूह–प्रक्रिया से जुड़ी रुकावटों के कारण संवैधानिक दायरे से बाहर न धकेल दिए जाएं।
विस्तृत रिपोर्ट यहां, यहां, यहां और यहां पढ़ी जा सकती हैं।
इसी जुड़ाव के इतिहास के आधार पर, CJP ने ‘वोट फॉर डेमोक्रेसी‘ (VFD) के साथ मिलकर महाराष्ट्र में SIR से जुड़ी जागरूकता और प्रशिक्षण सत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला शुरू किया। 2025 में, बिहार राज्य विधानसभा चुनावों के साथ, भारतीयों के एक बड़े हिस्से को एक अवास्तविक ‘नागरिकता जांच‘ की शर्त लगाकर, वोट देने के अधिकार से वंचित करने की राज्य की सबसे ताजा कोशिशें शुरू हुईं। SIR की यह प्रक्रिया, जो बाद में बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात और उत्तर प्रदेश तक पहुंची, उसने वैधानिक कानूनों (जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951), संवैधानिक मिसालों (अनुच्छेद 14, 15 और 21) और उचित प्रक्रिया तथा प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों की अवहेलना की है। दुख की बात है कि इस SIR प्रक्रिया से पहले, भारत के चुनाव आयोग (ECI) जैसे संवैधानिक निकाय की स्वायत्तता और निष्ठा में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली है; इसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324-326 के तहत चुनाव प्रक्रिया की निष्ठा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘वोट फॉर डेमोक्रेसी‘ (VFD)- विशेषज्ञों द्वारा निर्देशित नागरिकों का एक मंच– ने अप्रैल–जून 2024 के संसदीय चुनावों के दौरान निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों में आई इस गिरावट का विश्लेषण किया है और इसे उजागर किया है। VFD की रिपोर्टें आप यहां, यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं।
इन प्रशिक्षणों का उद्देश्य कभी भी किसी जल्दबाजी में किए गए और परेशानी पैदा करने वाली SIR प्रक्रिया को वैधता देना या उसका समर्थन करना नहीं था। वास्तव में, CJP और VFD का रुख हमेशा स्पष्ट रहा है: मौजूदा SIR मॉडल –जिसे कई राज्यों में लागू किया गया है– गंभीर संवैधानिक चिंताएं पैदा करता है, ऐसा इसलिए है क्योंकि जिस तरह से यह आम नागरिकों पर ‘सबूत पेश करने का बोझ‘ डालता है, उससे लोगों के बहिष्कार और उनके मताधिकार से वंचित होने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन जाती हैं। इसलिए, इन प्रशिक्षणों का उद्देश्य केवल नियमों का पालन करना भर नहीं था, बल्कि इनका उद्देश्य सुरक्षा प्रदान करना था।
जैसा कि SIR पर CJP-VFD की पुस्तिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है, इन प्रशिक्षणों का उद्देश्य “पूरी तरह से आपको अपने अधिकारों की रक्षा करने और इस असंवैधानिक बाधा से निपटने के लिए आवश्यक साधन (tools) उपलब्ध कराना है, न कि इस बाधा को वैधता प्रदान करना।“
यह पुस्तिका आप यहां और यहां पढ़ सकते हैं।
ऐसे समय में जब विभिन्न समुदायों के बीच भय, गलत सूचनाएं और भ्रम तेजी से फैल रहे थे, इन प्रशिक्षणों के माध्यम से एक बेहद महत्वपूर्ण संदेश देने का प्रयास किया गया, घबराहट से उन व्यवस्थाओं को पनपने में मदद मिलती है जो लोगों का बहिष्कार करती हैं। जानकारी, तैयारी और सामूहिक एकजुटता– और उसके बाद किए गए पुरजोर दखल व कार्रवाई– ही हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करते हैं।
महाराष्ट्र में आयोजित प्रशिक्षण
पिछले कुछ महीनों में, CJP ने महाराष्ट्र में SIR पर केंद्रित तीन प्रमुख प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए:
- 21 मार्च: बॉम्बे कैथोलिक सभा के साथ ट्रेनिंग सेशन
- 16 अप्रैल: एक कम्युनिटी–बेस्ड ऑर्गनाइज़ेशन (CBO), अग्रिपाड़ा, दक्षिण मुंबई के साथ संयुक्त जागरूकता और ट्रेनिंग सेशन
- 30 अप्रैल: जन हक संघर्ष समिति के साथ कम्युनिटी ट्रेनिंग प्रोग्राम
ये कोई रूटीन सेमिनार या टेक्निकल वर्कशॉप नहीं थे। ये ऐसी जगहें बन गईं जहां डर, अनिश्चितता और असल जिंदगी के अनुभव खुलकर सामने आए।
इसमें शामिल होने वालों में कम्युनिटी ऑर्गनाइजर, महिलाओं के समूह, प्रवासी मजदूर, सामाजिक कार्यकर्ता, अल्पसंख्यक संगठन, छात्र, धार्मिक नेता, स्थानीय वॉलंटियर, आवास अधिकारों के पैरोकार, DNT प्रतिनिधि, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता और आम नागरिक शामिल थे। ये सभी इस बात को लेकर चिंतित थे कि SIR-शैली की प्रक्रिया उनकी चुनावी सूची में बने रहने की क्षमता पर कैसे असर डाल सकते हैं।
तीनों कार्यक्रमों में, एक चौंकाने वाली सच्चाई बार–बार सामने आई: कई लोगों के लिए, यह डर कोई काल्पनिक चीज नहीं था। यह बहुत ही निजी था। यह विचार कि दशकों पुराने दस्तावेज अचानक एक वोटर के तौर पर किसी की वैधता –और उसके बाद एक नागरिक के तौर पर– तय कर सकते हैं, उन चिंताओं को जगाता है जिनकी जड़ें गरीबी, विस्थापन, पलायन, अशिक्षा, लैंगिक भेदभाव और पीढ़ियों से जमा हुए नौकरशाही की उपेक्षा में थीं।
दरअसल, मार्च 2026 की शुरुआत में महाराष्ट्र के CEO, चोक्कलिंगम के साथ एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल की बैठक, जिसमें CJP एक अहम हिस्सा था, काफी कुछ साफ करने वाली थी। अधिकारी ने साफ तौर पर कहा कि 2003 के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जाएगा, लेकिन यह भी माना कि ECI, दिल्ली द्वारा ‘अभी तक कोई नए दिशानिर्देश जारी नहीं किए गए हैं‘। इस बात पर जोर देते हुए कि मौजूदा प्रक्रिया यह तय करने के लिए होगा कि चुनावी सूची में ‘केवल भारतीय‘ ही शामिल हों, चोक्कलिंगम ने भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 में किए गए संशोधनों के बारे में बताया। ये संशोधन a) 1987 से पहले जन्मे लोगों, b) 1987 (1 जुलाई) और 2004 के बीच जन्मे लोगों, और c) उस तारीख के बाद जन्मे लोगों के बीच इस आधार पर फर्क करते हैं कि भारतीय नागरिकता ‘साबित करने‘ के लिए किस तरह के दस्तावेजी सबूतों की जरूरत होगी। a) के लिए, भारत में जन्म लेना ही काफी सबूत था; b) के लिए, भारत में खुद के जन्म के अलावा, यह साबित करना जरूरी था कि माता–पिता में से कम से कम एक भारतीय हो; और c) के लिए, यह साबित करना जरूरी था कि न तो मां और न ही पिता कोई ‘अवैध प्रवासी’ थे।
जन हक संघर्ष समिति के साथ सामुदायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम
जन हक संघर्ष समिति के साथ सामुदायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम (1)
एक सामुदायिक–आधारित संगठन (CBO), एग्रीपाड़ा, दक्षिण मुंबई के साथ संयुक्त जागरूकता और प्रशिक्षण सत्र
बिहार और पश्चिम बंगाल का अनुभव: ये प्रशिक्षण क्यों जरूरी हो गए
महाराष्ट्र के सत्र सीधे तौर पर CJP और VFD टीमों द्वारा उन राज्यों में दर्ज किए गए व्यापक जमीनी अनुभवों पर आधारित थे, जहाx SIR से जुड़े प्रक्रियाओं ने पहले ही गंभीर समस्याएं पैदा कर दी थीं। इनमें उत्तर प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु शामिल हैं। इस बीच, असम में अब तक केवल मतदाता सूचियों का SIR नहीं बल्कि विशेष संशोधन (SR) हुआ है।
बिहार और पश्चिम बंगाल से मिली ग्राउंड रिपोर्टों से भ्रम, बड़े पैमाने पर चिंता, मनमाने नोटिस, तकनीकी विसंगतियां, दस्तावेजीकरण में बाधाएं और प्रशासनिक अस्पष्टता के पैटर्न सामने आए। इन निष्कर्षों के परिणामस्वरूप अंततः एक विस्तृत पुस्तिका प्रकाशित हुई, जिसका शीर्षक था: Inside the Special Intensive Revision (SIR): Deadly Deadlines, Mechanical Disenfranchisement, and the Ground Reality of Claims and Objections Period & SIR Notices/Hearings.
इस पुस्तिका में खोजी विश्लेषण, जमीनी दस्तावेजीकरण, कानूनी मार्गदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण सामग्री का संग्रह था। इसमें SIR प्रक्रिया की संरचना, चुनावी अधिकारियों की भूमिकाएं, पुरानी मतदाता सूचियों का महत्व, नोटिस और सुनवाई की कार्यप्रणाली, अपील तंत्र, स्वीकार्य दस्तावेज, और उन तरीकों के बारे में बताया गया था जिनके माध्यम से जमीन पर लोगों को सूची से बाहर करने का काम किया जा रहा था।
सबसे अहम बात यह है कि इसमें यह दर्ज किया गया था कि मौजूदा SIR ढांचा, पहले के चुनावी संशोधन प्रक्रियाओं से कितना अलग और नाटकीय बदलाव वाला था।
उदाहरण के लिए, 2003 की SIR प्रक्रिया लगभग छह महीनों तक चली थी, यह मौलिक दस्तावेजों के रूप में मौजूदा मतदाता सूचियों और EPIC कार्डों पर निर्भर थी और इसमें घर–घर जाकर सत्यापन करने की सुविधा पर जोर दिया गया था। गणना करने वालों से यह अपेक्षा नहीं की जाती थी कि वे नागरिकता पर फैसला सुनाने वालों (adjudicators) के रूप में काम करें। इस बार, 2025-2026 में, जब ECI एक विशिष्टतावादी शासन की हथियारबंद (यानी असंवैधानिक) शाखा की तरह काम कर रहा है, तो नागरिकता पर जल्दबाजी में और मनमाने ढंग से फैसले सुनाना आम बात हो गई है।
इसलिए, मौजूदा मॉडल ने चुनावी सत्यापन को एक ऐसी प्रक्रिया में बदल दिया है, जिसमें समय की कमी, मशीनी जांच–पड़ताल, अपारदर्शी सॉफ्टवेयर सिस्टम और पिछली तारीखों के दस्तावेजों का बोझ शामिल है। CJP और VFD की फील्ड रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया है कि कैसे सॉफ्टवेयर से होने वाली गलतियां –जैसे कि वर्तनी में अंतर, ट्रांसलिट्रेशन में अंतर, उम्र के अंतर की गणना और डेटा–एंट्री में विसंगतियां– बड़ी संख्या में “बेमेल” या “संदिग्ध” प्रविष्टियां पैदा करती हैं।
इसलिए, महाराष्ट्र में दी गई ट्रेनिंग किसी अटकल पर आधारित नहीं थी, बल्कि उन दस्तावेजों में दर्ज अनुभवों पर आधारित थी जो पहले से ही दूसरी जगहों पर सामने आ रहे थे।
जब गरीबों से उनके अस्तित्व का सबूत मांगा जाता है, तो क्या होता है?
CJP द्वारा महाराष्ट्र में आयोजित ट्रेनिंग का एक बड़ा हिस्सा प्रतिभागियों को उन विभिन्न प्रकार के दस्तावेजों को समझने में मदद करने पर केंद्रित था, जिन पर SIR से संबंधित सत्यापन प्रक्रियाओं के दौरान भरोसा किया जा सकता है। उन दस्तावेजों तक पहुंचने के तरीके –जो स्थानीय अधिकारियों के पास मौजूद और उपलब्ध हो सकते हैं– और उन मतदाताओं/नागरिकों के इतिहास और संबंधों को समझना और उनका पता लगाना जो आधार दस्तावेज (2002-2004 के बीच की मतदाता सूची) में उपलब्ध और सत्यापित करने योग्य हैं– इन सभी बातों को भी विस्तार से साझा किया गया। पूरे भारत में –विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में– कई मोर्चों पर हस्तक्षेप करने के CJP के अनुभवों ने नौकरशाही के विभिन्न स्तरों से दस्तावेज प्राप्त करने का एक समृद्ध ज्ञान–भंडार तैयार किया है और इसे व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है। ट्रेनिंग के दौरान बार–बार एक अहम बात पर जोर दिया गया: लोग अक्सर घबरा जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी एक “एकदम सही” दस्तावेज के न होने पर वे अपने–आप अयोग्य घोषित हो जाएंगे। हालांकि, इंडिकेटिव लिस्ट स्वयं यह दर्शाती है कि पहचान और पात्रता को दस्तावेजी साक्ष्य के कई रूपों के माध्यम से स्थापित किया जा सकता है।
प्रतिभागियों को हैंडबुक में दिए गए स्वीकार्य और सहायक दस्तावेज़ों की सूची, साथ ही बाद में हुए न्यायिक हस्तक्षेपों के बारे में सावधानीपूर्वक और विस्तार से समझाया गया। इनमें शामिल हैं: सरकारी कर्मचारियों या पेंशनभोगियों को जारी किए गए पहचान पत्र या पेंशन भुगतान आदेश; 1 जुलाई, 1987 से पहले सरकारी अधिकारियों, बैंकों, डाकघरों, LIC या PSUs द्वारा जारी किए गए पहचान पत्र या प्रमाण पत्र; जन्म प्रमाण पत्र; पासपोर्ट; मैट्रिक या शैक्षिक प्रमाण पत्र; स्थायी निवास प्रमाण पत्र; वन अधिकार प्रमाण पत्र; OBC, SC या ST जाति प्रमाण पत्र; NRC रिकॉर्ड (जहां उपलब्ध हों); राज्य या स्थानीय अधिकारियों द्वारा तैयार किए गए पारिवारिक रजिस्टर; जमीन या मकान आवंटन प्रमाण पत्र; आधार कार्ड; और कक्षा 10 के प्रवेश पत्र या उत्तीर्ण प्रमाण पत्र।
पूरी ट्रेनिंग के दौरान, प्रशिक्षकों ने बार–बार इस बात पर जोर दिया कि इन दस्तावेजों में से कोई एक भी दस्तावेज –जब उनके साथ अतिरिक्त दस्तावेज़ और पहचान संबंधी जानकारी में समानता मौजूद हो– तो वह किसी व्यक्ति की पहचान और देश के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे के भीतर उसके निरंतर अस्तित्व को स्थापित करने में मदद कर सकता है। इसलिए, इन सत्रों में व्यावहारिक रणनीतियों पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया: दस्तावेजों को कालक्रम के अनुसार कैसे व्यवस्थित करें, पुराने रिकॉर्ड कैसे निकालें, फोटोकॉपी और रसीदों को कैसे सुरक्षित रखें और जहां मूल दस्तावेज उपलब्ध न हों, वहां उनके बदले में दूसरे सहायक कागज़ातों की पहचान कैसे करें।
फिर भी, जैसा कि प्रशिक्षण के दौरान हुई चर्चाओं से पता चला, दस्तावेजों से जुड़ी जमीनी हकीकत अक्सर सरकारी सूचियों में बताई गई बातों से कहीं ज्यादा पेचीदा है। आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए, दस्तावेज महज़ घर की अलमारियों में सुरक्षित रखे हुए नहीं होते, जो अधिकारियों के सामने पेश किए जाने का इंतजार कर रहे हों। इसके बजाय, दस्तावेजों का इतिहास गरीबी, पलायन, पर्यावरणीय आपदाओं, विस्थापन, लैंगिक भेदभाव और दशकों से चली आ रही सरकारी उपेक्षा के कारण टुकड़ों में बंटा हुआ है। कई प्रतिभागियों ने बताया कि उनके समुदायों में बच्चों का जन्म घर पर ही होता था और उनका कभी भी औपचारिक रूप से पंजीकरण नहीं कराया जाता था। कुछ अन्य लोगों ने सूखे के कारण हुए पलायन, बाढ़, तोड़–फोड़, आग लगने या बार–बार घर बदलने के दौरान अपने कागजात खो जाने की बात कही। कई बुजुर्ग प्रतिभागियों ने बताया कि जिन स्कूलों में वे पढ़े थे, वे अब मौजूद ही नहीं हैं; ऐसे में आज के समय में स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र या मार्कशीट हासिल करना लगभग नामुमकिन हो गया है।
महिलाओं ने बार–बार उन दस्तावेजी विसंगतियों के बारे में चिंता जताई, जो कम उम्र (18 या 21 साल से पहले) में शादी होने पर उपनाम में बदलाव, वर्तनी में अंतर और घर बदलने के कारण पैदा होती हैं। कुछ ऐसी महिलाओं ने, जिनकी शादी कम उम्र में हो गई थी, बताया कि उन्होंने पहली बार अपने पति के घर से ही वोट डाला था, जिससे उनके मायके वालों के साथ उनका कोई भी औपचारिक चुनावी जुड़ाव नहीं रह गया। अब इसकी वजह से अपने माता–पिता के रिकॉर्ड के साथ दस्तावेजी निरंतरता को जोड़ पाना बेहद मुश्किल हो गया है, हालांकि यह नामुमकिन नहीं है।
इसी तरह, डीनोटिफाइड और घुमंतू जनजातियों के लोग (DNTs), प्रवासी मजदूरों और दिहाड़ी मजदूरों ने बताया कि जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र या डुप्लीकेट रिकॉर्ड हासिल करने के लिए भी अक्सर उन्हें सरकारी दफ्तरों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं– और ऐसा करने में उन्हें अपनी रोज की जरूरी कमाई गंवानी पड़ती है, जो कई लोगों के लिए मुमकिन नहीं होता। बेघर लोगों, किराएदारों, अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों और लगातार एक जगह से दूसरी जगह आते–जाते रहने वाले लोगों के लिए, किसी एक स्थिर पते के आधार पर दस्तावेज बनवाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
इसलिए, प्रशिक्षणों ने दस्तावेजीकरण–प्रधान सत्यापन प्रक्रियाओं के मूल में निहित एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को उजागर किया जहां एक ओर राज्य लगातार बहुस्तरीय दस्तावेजी प्रमाण की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर लाखों लोग ऐतिहासिक रूप से औपचारिक दस्तावेजीकरण प्रणालियों से ही हाशिये पर रहे हैं। इस संदर्भ में, सत्रों का उद्देश्य न केवल यह समझाना था कि कौन से दस्तावेज सहायक हो सकते हैं, बल्कि उन गहरी संरचनात्मक असमानताओं का सामूहिक रूप से सामना करना भी था जो यह निर्धारित करती हैं कि कौन दस्तावेजों को सुरक्षित रख सकता है, कौन प्रशासनिक प्रणालियों में दिखाई देता है और कौन बहिष्कार के प्रति संवेदनशील बना रहता है।
दस्तावेज ही सब कुछ तय करते हैं: समुदायों का डर जो वे प्रशिक्षणों में लेकर आए
महाराष्ट्र सत्रों का सबसे प्रभावशाली पहलू यह था कि लोगों ने अपने दस्तावेजी इतिहास की नाजुक स्थित के बारे में खुलकर बात की। बार–बार, प्रतिभागियों ने ऐसी चिंताएं उठाईं जिनसे नौकरशाही की अपेक्षाओं और वास्तविक जीवन की वास्तविकताओं के बीच भारी अंतर उजागर हुआ।
जन्म प्रमाण पत्र गुम होने की समस्या: शायद सबसे अधिक बार उठाई जाने वाली चिंता जन्म प्रमाण पत्रों से संबंधित थी।
पुरानी पीढ़ी के बड़े हिस्से, विशेष रूप से ग्रामीण, श्रमिक वर्ग और गरीब समुदायों से, घर पर पैदा हुए थे और कभी भी औपचारिक रूप से नागरिक अधिकारियों के पास पंजीकृत नहीं हुए थे। दशकों तक संस्थागत जन्म या तो दुर्गम, महंगे या सांस्कृतिक रूप से असामान्य थे। महिला प्रतिभागियों ने बार–बार बताया कि उनके पास या उनके भाई–बहनों के पास जन्म के कोई रिकॉर्ड नहीं हैं, क्योंकि जन्म अस्पतालों के बजाय स्थानीय दाइयों की सहायता से होते थे।
आंकड़े खुद बताते हैं कि यह इतनी बड़ी समस्या क्यों बनी हुई है। भारत में जन्म पंजीकरण अपेक्षाकृत हाल ही में व्यापक हुआ है। यहां तक कि आधिकारिक आंकड़े भी पंजीकरण कवरेज में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अंतराल दिखाते हैं।
कई प्रतिभागियों के लिए, दशकों पुराने जन्म रिकॉर्ड के अब मौजूद होने की अचानक उम्मीद ने गहरी चिंता पैदा कर दी।
महाराष्ट्र का सूखा, पलायन और नुकसान का इतिहास: प्रतिभागियों ने यह भी बताया कि कैसे पर्यावरणीय और आर्थिक संकटों ने बार–बार पारिवारिक रिकॉर्ड नष्ट कर दिए।
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कई समुदायों ने विनाशकारी सूखे का सामना किया था, जिससे पलायन, संकटग्रस्त विस्थापन और बार–बार घर खाली करने के लिए मजबूर होना पड़ा। अन्य लोगों ने बाढ़, चक्रवात, आग या दीर्घकालिक आवास अस्थिरता के दौरान दस्तावेज खोने की बात कही। कुछ प्रतिभागियों ने सुनामी के दौरान या शहरी पुनर्विकास और अनौपचारिक बस्तियों के विध्वंस से जुड़े जबरन विस्थापन के दौरान खोए हुए रिकॉर्ड का उल्लेख किया। पलायन और अनिश्चित श्रम के चक्रों से जूझ रहे गरीब परिवारों के लिए, दशकों तक नाजुक कागजी रिकॉर्ड को संरक्षित करना अक्सर असंभव था।
लेकिन वर्तमान एसआईआर–शैली की अपेक्षाएं स्थिर घरों, निरंतर कागजी कार्रवाई, औपचारिक संस्थागत पहुंच और निर्बाध दस्तावेजी इतिहास को मानकर चलती हैं।
जब स्कूल का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है: एक और प्रमुख मुद्दा जो बार–बार सामने आया, वह था स्कूल रिकॉर्ड तक पहुंच की समस्या। कई पुराने सरकारी स्कूल, ग्रामीण स्कूल और अनौपचारिक शैक्षणिक संस्थान अब अपने मूल स्वरूप में मौजूद नहीं हैं। इमारतें ध्वस्त हो गईं, रिकॉर्ड गायब हो गए, प्रशासन बदल गया, या अभिलेखागारों का डिजिटलीकरण कभी नहीं हुआ।
कई प्रतिभागियों ने बताया कि भले ही उन्हें पता हो कि उन्होंने कभी किसी विशेष विद्यालय में पढ़ाई की थी, लेकिन आज विद्यालय छोड़ने का प्रमाण पत्र या मार्कशीट प्राप्त करना लगभग असंभव हो गया है क्योंकि या तो वह संस्थान बंद हो गया है या अभिलेख वर्षों पहले नष्ट हो गए हैं।
गरीब परिवारों के उन व्यक्तियों के लिए जिन्होंने रुक–रुक कर पढ़ाई की या काम शुरू करने के लिए जल्दी ही पढ़ाई छोड़ दी, शैक्षिक दस्तावेज अक्सर बिखर गए या मुश्किल होते हैं। फिर भी इन्हीं रिकॉर्ड को पहचान के महत्वपूर्ण चिन्ह के रूप में देखा जा रहा है।
अधिसूचित जनजातियों और हाशिए पर पड़े समुदायों पर अदृश्य बोझ: प्रशिक्षणों में अधिसूचित और डीनोटिफाइड जनजातियों (डीएनटी) से संबंधित विशिष्ट चिंताओं को भी उजागर किया गया, जिनका स्थिर बस्तियों, शिक्षा प्रणालियों और औपचारिक राज्य मान्यता से बहिष्कार का इतिहास उनकी मौजूदा कमजोरियों को प्रभावित करता रहता है।
प्रतिभागियों ने बताया कि कई डीएनटी समुदाय आज भी संरचनात्मक रूप से दस्तावेजों की कमी का सामना कर रहे हैं, क्योंकि उनकी कई पीढ़ियाँ औपचारिक प्रशासनिक ढांचे से बाहर रहकर जीवन बिताती रही हैं। जाति प्रमाणपत्र, निवास संबंधी रिकॉर्ड या पुराने दस्तावेज़ हासिल करने के लिए अक्सर दूर-दराज़ के सरकारी दफ्तरों के बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं।
दिहाड़ी मजदूरों के लिए, सरकारी दफ्तर का हर दौरा एक दिन की कमाई का नुकसान होता है। प्रशिक्षणों में बार–बार इस बात पर जोर दिया गया कि दस्तावेजीकरण का बोझ सामाजिक रूप से कभी भी समान नहीं होता। इसका सबसे ज्याजा प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है जो पहले से ही अनिश्चित जीवनयापन कर रहे हैं।
महिलाएं और दस्तावेज़ीकरण में बाधा: चर्चाओं के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक महिलाओं के अनुभव उभर कर सामने आए। विभिन्न समुदायों और धर्मों की महिलाओं ने बताया कि कैसे विवाह अक्सर दस्तावेजीकरण की निरंतरता को बाधित करता है। विवाह के बाद उपनाम में परिवर्तन के कारण अक्सर विभिन्न पहचान दस्तावेजों में विसंगतियां पैदा हो जाती हैं।
कई बुज़ुर्ग महिलाओं ने बताया कि उनकी शादी 18 साल की उम्र से पहले ही हो गई थी और उन्होंने पहली बार अपने मायके के बजाय अपने पति के घर से वोट डाला था। इसकी वजह से, दशकों बाद अपने माता–पिता के रिकॉर्ड के साथ दस्तावेजी जुड़ाव साबित करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
राशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर ID, शैक्षिक प्रमाण पत्र और शादी से जुड़े रिकॉर्ड में नाम की वर्तनी में छोटे–मोटे अंतर होने से सत्यापन का काम और भी पेचीदा हो जाता है। महाराष्ट्र में हुई ट्रेनिंग में इन लैंगिक दस्तावेजी वास्तविकताओं पर खास ध्यान दिया गया, क्योंकि अक्सर महिलाओं से यह “साबित करने” की उम्मीद की जाती है कि पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे की वजह से नाम, पते और घरों में आए बदलावों के बावजूद उनकी पहचान बनी हुई है।
चुनावी समीक्षा को नागरिकता की निगरानी का जरिया नहीं बनाया जा सकता
पूरे सत्र के दौरान, CJP और VFD ने बार–बार एक अहम संवैधानिक सिद्धांत पर जोर दिया: चुनावी समीक्षा को उन नागरिकों के खिलाफ शक पैदा करने वाले तंत्र में नहीं बदला जा सकता, जिन्हें पहले से ही वोट देने का अधिकार मिला हुआ है।
हैंडबुक में खुद यह बात कही गई है कि मौजूदा SIR ढांचा लंबे समय से चली आ रही लोकतांत्रिक मान्यताओं को उलट देता है; यह पंजीकृत मतदाताओं को तब तक संदिग्ध मानता है, जब तक वे दस्तावेजी सबूतों के जरिए बार–बार अपनी पात्रता साबित न कर दें।
यह बात खासकर इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि लाखों लोग जो अभी चुनावी सूचियों में शामिल हैं, वे दशकों से कई चुनावों में वोट डाल चुके हैं।
इसलिए, ट्रेनिंग में अधिकारों के प्रति जागरूकता पर खास जोर दिया गया:
- नोटिस को समझना,
- दस्तावेजों को व्यवस्थित करना,
- रसीदों को संभालकर रखना,
- लिखित आदेशों की मांग करना,
- किसी सहयोगी के साथ सुनवाई में शामिल होना,
- अपील दायर करना,
- मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने का विरोध करना,
- और प्रक्रिया से जुड़े उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण करना।
प्रतिभागियों को यह भी सिखाया गया कि पुरानी चुनावी सूचियों को कैसे खोजा जाए– जिनमें 2002–2004 की सूचियां भी शामिल हैं, जिन्हें SIR प्रक्रियाओं के तहत अब “पुराना डेटा” (legacy data) माना जाने लगा है। इन सत्रों में बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs), चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (EROs), सहायक चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (AEROs) के कामकाज, अपील की प्रक्रियाओं और प्रक्रिया से जुड़ी सुरक्षा–उपायों के महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया।
CJP टीम ने अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों और सामुदायिक संगठनों (CBOs) को सामूहिक रूप से संगठित होने और राज्य चुनाव आयोग के कार्यालयों के समक्ष अपनी चिंताओं को उठाने के लिए प्रशिक्षित किया और प्रोत्साहित किया। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि विभिन्न हितधारकों – जैसे असली मतदाता (चाहे वे दूसरे राज्यों से आए प्रवासी हों, महिलाएं हों, अल्पसंख्यक हों, DNTs हों या विस्थापित लोग हों) – की खास चिंताओं और आशंकाओं का समाधान, राज्य चुनाव आयोग (SEC) जैसे आमतौर पर अपारदर्शी माने जाने वाले संस्थान द्वारा आसानी से किया जा सके।
महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) को CJP का ज्ञापन
इन ट्रेनिंग सत्रों के साथ–साथ, CJP और VFD ने औपचारिक रूप से महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग और महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी से संपर्क किया। उन्होंने एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर, संभावित रूप से वोट के अधिकार से वंचित किए जाने और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी (procedural opacity) से जुड़ी चिंताओं को उनके समक्ष उठाया। ज्ञापन में अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया:
- सुलभ और खोजने योग्य मतदाता सूचियां,
- ठीक से प्रशिक्षित कर्मचारी,
- बहुभाषी सहायता प्रणालियां,
- एल्गोरिद्मिक बहिष्कार से सुरक्षा,
- सार्वजनिक पारदर्शिता,
- संशोधित मतदाता सूचियों के मसौदे और अंतिम सूचियों का सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट (इसे ECI की अपनी 2023 की ‘मतदाता सूचियों पर दिशानिर्देशों की पुस्तिका‘ में एक अनिवार्य और स्वस्थ आवश्यकता के रूप में उल्लेखित किया गया है);
- और मनमाने ढंग से नाम हटाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय।
अहम बात यह है कि ज्ञापन में इस बात पर जोर दिया गया कि मतदाता सूची के संशोधन से डर पैदा होने के बजाय वह कम होना चाहिए। इसमें चेतावनी दी गई कि जब बिना पर्याप्त सहायता ढांचे के दस्तावेजीकरण का बोझ डाला जाता है, तो सबसे पहले वे लोग प्रभावित होते हैं जो पहले से ही हाशिए पर धकेले जा चुके हैं: अल्पसंख्यक, प्रवासी, किराएदार, महिलाएं, अनौपचारिक क्षेत्र के कामगार, DNT (डिनोटिफाइड और घुमंतू जनजातियां) और आर्थिक रूप से कमजोर आबादी।
दस्तावेजीकरण से परे: सामूहिक विश्वास का निर्माण
महाराष्ट्र में हुए इन प्रशिक्षणों की खासियत यह थी कि उन्होंने दस्तावेजीकरण को केवल एक तकनीकी कागजी कार्रवाई के रूप में नहीं देखा। उन्होंने दस्तावेजीकरण को गरिमा, स्मृति, वर्ग, जाति, प्रवासन, लिंग और अस्तित्व से गहराई से जुड़ा हुआ माना।
कई प्रतिभागियों के लिए, ये सत्र ऐसे मंच बन गए जहां लोगों को यह एहसास हुआ कि वे व्यक्तिगत रूप से “असफल” नहीं हो रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि उनके दस्तावेज गायब हैं या उनमें कोई विसंगति है। बल्कि, उनके अनुभव उन ढांचागत वास्तविकताओं को दर्शाते थे, जिनका सामना पूरे भारत में लाखों लोग कर रहे हैं।
इसलिए, इन प्रशिक्षणों में लगातार एकजुटता और सामूहिक बचाव पर जोर दिया गया:
- बुज़ुर्गों को उनके रिकॉर्ड (दस्तावेज) वापस पाने में मदद करना,
- नाम में विसंगति का सामना कर रही महिलाओं की सहायता करना,
- सुनवाई में शामिल न हो पाने वाले प्रवासी कामगारों का समर्थन करना,
- दिहाड़ी मजदूरों को दस्तावेजीकरण की प्रक्रियाओं में मार्गदर्शन देना,
- और यह सुनिश्चित करना कि कमजोर समुदायों को नौकरशाही के दबाव का अकेले सामना न करना पड़े।
ऐसे समय में जब प्रशासनिक प्रक्रियाओं से डर और उपेक्षा (अदृश्यता) पैदा होने का जोखिम बढ़ता जा रहा है, इन सत्रों ने संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी में लोगों का विश्वास बहाल करने का प्रयास किया।
डर के खिलाफ एक लोकतांत्रिक हस्तक्षेप
आखिरकार, CJP द्वारा पूरे महाराष्ट्र में आयोजित SIR ट्रेनिंग सिर्फ कानूनी जागरूकता कार्यक्रम नहीं थे। वे डर के खिलाफ लोकतांत्रिक हस्तक्षेप थे।
उन्होंने लोगों को यह याद दिलाने की कोशिश की कि वोट देने का अधिकार कोई ऐसा एहसान नहीं है जो बदलते नौकरशाही तंत्र द्वारा किसी शर्त पर दिया जाता हो। यह एक संवैधानिक गारंटी है, जिसकी जड़ें सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के वादे में हैं। उन्होंने एक कड़वी सच्चाई को भी उजागर करने की कोशिश की: जब लोकतांत्रिक भागीदारी दशकों तक फैले हुए एकदम सही दस्तावेजों के इतिहास पर निर्भर हो जाती है, तो किसी का बाहर रह जाना महज़ एक संयोग नहीं रह जाता। यह एक ढांचागत समस्या बन जाती है।
ठीक इसी वजह से, इन ट्रेनिंग में इस बात पर जोर दिया गया कि लोगों की प्रतिक्रिया घबराहट से नहीं, बल्कि तैयारी से तय होनी चाहिए। क्योंकि हर “गायब दस्तावेज,” “गलत नाम,” या “उपलब्ध न हो रहे पुराने रिकॉर्ड” के पीछे सिर्फ कागजों की कोई समस्या नहीं होती, बल्कि एक ऐसा मानवीय इतिहास होता है जो गरीबी, पलायन, पितृसत्ता, विस्थापन, आपदा और संस्थागत उपेक्षा से गढ़ा गया होता है।
और CJP की महाराष्ट्र ट्रेनिंग का मकसद इन्हीं इतिहासों को चर्चा के केंद्र में लाना था– ताकि लोकतंत्र महज़ एक तकनीकी सत्यापन (mechanical verification) का अभ्यास बनकर न रह जाए, बल्कि संवैधानिक समावेश, मानवीय गरिमा और सामूहिक अधिकारों पर आधारित रहे।
Related:
Inside the SIR: A voter roll exercise turning into a test of survival
Demystifying the SIR Notice: A systemic hurdle, not a final verdict
CJP Assam: A journey without parallel, evolving & expanding rights jurisprudence

